बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ नारदीयपुराणम् यस्य येन भवेत्संगो ब्रह्महादिचतुर्ष्वपि । तत्तद्व्रतं स निर्वर्त्य शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥७१॥ अज्ञानात्पंचरात्रं तु संगमेभिः करोति यः । कायकृच्छ्रं चरेत्सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥७२॥ द्वादशाहे तु संसर्गे महासांतपनं स्मृतम् । संगंकृत्वाऽर्द्धमासं तु द्वादशाहमुपावसेत् ॥७३॥ पराको माससंसर्गे चांद्रमासत्रये स्मृतम् । कृत्वा संगं तु षण्मासं चरेच्चान्द्रायणद्वयम् ॥७४॥ किंचिन्न्यूनाब्दसंगे तु षण्मासव्रतमाचरेत् । एतच्च त्रिगुणं प्रोक्तं ज्ञातात्संगे यथाक्रमम् ॥७५॥ मंडूकं नकुलं काकं वराहं मूषकं तथा । मार्जाराजाविकं श्वानं हत्वा कुक्कुटकं तथा ॥७६॥ कृच्छ्राद्धं माचरेद्विप्रोऽतिकृच्छ्रं चाश्वहा चरेत् । तप्तकृच्छ्रं करिवधे पराकं गोवधे स्मृतम् ॥७७॥ कामतो गोवधे नैव शुद्धिर्दृष्टा मनीषिभिः । पानं शय्यासनाद्येषु पुष्पमूलफलेषु च ॥७८॥ भक्ष्यभोज्यापहारेषु पंचगव्यविशोधनम् । शुष्ककाष्ठतृणानां च द्रुमाणां च गुडस्य च ॥७९॥ चर्मवस्त्राभिषाणां च त्रिरात्रं स्वादभोजनम् । टिट्टिभं चक्रवाकं च हंसं कारंडवं तथा ॥८०॥ उलूकं सारसं चैव कपोतं जलपादकम् । शुकं चाषं बलाकं च शिशुमारं च कच्छपम् ॥८१॥ एतेष्वन्यतमं हत्वा द्वादशाहमभोजनम् । प्राजापत्यव्रतं कुर्याद्रैतोविण्मूत्रभोजने ॥८२॥ चांद्रायणत्रयं प्रोक्तं शूद्रोच्छिष्टस्य भोजने । रजस्वलां च चांडालं महापातकिनं तथा ॥८३॥ सूतिकां पतितं चैव उच्छिष्टं रजकादिकम् । स्पृष्ट्वा सचैलं स्नायीत घृतं संप्राश्येत्तथा ॥८४॥ गायत्रीं च विशुद्धात्मा जपेदष्टशतं द्विज । एतेष्वन्यतमं स्पृष्ट्वा अज्ञानाद्यदि भोजने ॥८५॥ महापापियों में किसी से संसर्ग हो जाता है उसकी उसी महापाप के अनुकूल व्रत करने से शुद्धि होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। जो अज्ञान वश पाँच रात्रि तक इनमें से किसी के साथ रहता है वह कायकृच्छ्रव्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। बारह दिन की संगति में तो महासान्तपन व्रत करना ही उचित माना गया है। आधे महीने तक संगति करने से बारह दिन तक उपवास करना चाहिए। एक महीने तक साथ रहने पर पराक व्रत और तीन महीने के संसर्ग में चान्द्रायण व्रत करना श्रेयस्कर कहा जाता है। छह महीने के साहचर्य में दो चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥६९-७४॥ एक वर्ष से कुछ कम समय तक साथ रहने से षण्मास व्रत करना चाहिए। जान बूझकर संगति करने पर क्रमशः इनका तिगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ऐसा शास्त्रकारों का कहना है ॥७५॥ मेढक, नेवला, कौआ, सूअर, चूहा, बिल्ली, बकरी, भेड़, कुत्ता और मुर्गा इतने जीवों की हत्या करने पर ब्राह्मण को अर्द्ध कृच्छ्र करना चाहिए। अश्व वध करने वाले को अति कृच्छ्र व्रत करना चाहिए। हाथी के वध में तप्तकृच्छ्र और गोवध में पराक व्रत कहा गया है। मनीषियों ने जान बूझकर गोहत्या करने वालों पर किसी प्रकार का प्रायश्चित नहीं बतलाया है ॥७६-७७॥ पीने योग्य वस्तु रस, शरबत आदि, खटिया, आसन और फल फूल मूल अथवा भक्ष्य भोज्य आदि के चुरा लेने पर पंचगव्य से शुद्धि कही गई है। सूखी लकड़ी, तृण, वृक्ष, गुड़, चमड़ा वस्त्र और मांस को चुरा लेने पर तीन रात तक उपवास करना चाहिए। टिटिहिरी, चक्रवाक, हंस, कारंडव, उल्लू, सारस, कपोत, जलपादक (एक प्रकार का हंस), सुग्गा, चाष, बगुला, शिशुमार, कछुआ इनमें से किसी की हत्या करने पर बारह दिन तक भोजन नहीं करना चाहिए। वीर्य, विष्ठा और मूत्र भोजन करने पर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥७८-८२॥ शूद्र का जूठा भोजन करने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत का विधान है। रजस्वला स्त्री, चाण्डाल, महापापी सूतिका (जच्चा) पतित, जूठा भोजन, धोबी आदि छू जाने पर सचैल (वस्त्र- सहित) स्नान करने और घृत प्राशन भी करे। द्विज ! इस प्रकार विशुद्ध हो आठ सौ गायत्री का जप करे। यदि इनमें से किसी को छू कर अनजाने अज्ञान वश भोजन कर ले तो द्विज ! वह व्यक्ति तीन रात