बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः १८५ त्रिरात्रोपोषणाच्छुद्धयेत्पञ्चगव्याशनाद्विज । स्नानदानजपादौ च भोजनादौ च नारद ॥८६॥ एषामन्यतमस्यापि शब्दं यः शृणुयाद्वदेत् । उद्गमेद्भुक्तमन्नंतत्स्नात्वा चोपवसेत्तथा ॥८७॥ द्वितीयेऽह्नि घृतं प्राश्य शुद्धिमाप्नोति नारद । व्रतादिमध्ये यद्येषा शृणुयाद्ध्वनिमप्युत ॥८८॥ अष्टोत्तरसहस्रं तु जपेद्वै वेदमातरम् । पापानामधिकं पापं द्विजदैवतनिन्दनम् ॥८६॥ न दृष्ट्वा निष्कृतिस्तस्य सर्वशास्त्रेषु नारद । महापातकतुल्यानि यानि प्रोक्तानि सूरिभिः ॥६०॥ प्रायश्चित्तं तु तेषां च कुर्यादेवं यथाविधि । प्रायश्चित्तानि यः कुर्यान्नारायणपरायणः ॥६१॥ तस्य पापानि नश्यंति ह्यन्यथा पतितो भवेत् । यस्तु रागादिनिर्मुक्तो ह्यनुतापसमन्वितः ॥६२॥ सर्वभूतदयायुक्तो विष्णुस्मरणतत्परः । महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः ॥६३॥ विमुक्त एव पापेभ्यो ज्ञेयो विष्णुपरो यतः । नारायणमनाद्यंतं विश्ववाकारमनामयम् ॥६४॥ यस्तु संस्मरते मर्त्यः स मुक्तः पापकोटिभिः । स्मृतो वा पूजितो वापि ध्यातः प्रणमितोऽपि वा ॥६५॥ नाशयत्येव पापानि विष्णुर्हृद्गमनः सताम् । संपर्कद्विदि वा मोहाद्यस्तु पुजयते हरिम् ॥६६॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्रयाति हरेः पदम् । सकृत्संस्मरणाद्विष्णोर्नश्यंति क्लेशसंचयाः ॥६७॥ स्वर्गादिभोगप्राप्तिस्तु तस्य विप्रानुमीयते । मानुषं दुर्लभं जन्म प्राप्यते यैर्मुनीश्वर ॥६८॥ तत्रापि हरिभक्तिस्तु दुर्लंभा परिकीर्त्तिता । तस्मात्तडिल्लतालोलं मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ॥६९॥ हरिं संपूजयेद्भक्त्या पशुपाशविमोचनम् । सर्वेऽन्तराया नश्यंति मनःशुद्धिश्च जायते ॥१००॥ तक उपवास करने से शुद्ध होता है अथवा पंचगव्यका पान करे ॥८३-८५३॥ नारद ! स्नान, दान, जप अथवा भोजन आदि के समय यदि इनमें से किसी का शब्द सुन ले या स्वयं इनसे बातचीत करे तो वही व्यक्ति खाया हुआ अन्न उगल दे और स्नान कर उस दिन उपवास करे । नारद ! दूसरे दिन संविधि घृतप्राशन करने पर वह शुद्ध होता है । व्रत आदि के मध्यकाल में यदि इनकी बोली भी सुन ले तो एक हजार आठ बार वेद माता गायत्री का जप करे ॥८६-८८३॥ द्विज और देवताओं की निन्दा सब पापों से बढ़ कर पाप है । नारद ! सब शास्त्रों में इसका कोई प्रायश्चित्त नहीं लिखा है । महापापों के बराबर जो पाप कहे गये हैं उनके लिए इस प्रकार का प्रायश्चित्त विधिपूर्वक करना चाहिए जो व्यक्ति नारायण का स्मरण करता हुआ प्रायश्चित्त करता है उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, अन्यथा वह पतित हो रहता है । जो राग आदि से मुक्त हो पश्चात्ताप करता और सब प्राणियों पर दया भाव रखकर विष्णु के स्मरण में लगा रहता है, वह महापातकी हो चाहे सब पापों से युक्त क्यों न हो, उसको सब पापों से मुक्त समझना चाहिए । क्योंकि वह विष्णु का सेवक है ॥८९-६३३॥ जो मनुष्य, अनन्त, विश्वरूप निर्विकार नारायण का स्मरण करता है वह अपने करोड़ों पापों से मुक्त हो जाता है । भगवान् विष्णु के स्मरण, पूजा, ध्यान प्रणाम से सज्जनों के हृदय में निवास करने वाले भगवान् उसके पापों को नष्ट कर देते हैं । जो साहचर्य या मोह वश भी भगवान् की पूजा करता है वह भी सब पापों से मुक्त हो विष्णु- लोक को चला जाता है । भगवान् का एक बार भी स्मरण करने से सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं ॥६४-६७॥ विप्र ! स्वर्ग आदि भोग-प्राप्ति का तो अनुमान ही किया जा सकता है । मुनीश्वर ! पहले तो मानुष जन्म पाना ही दुर्लभ है, मानव जीवन में हरि भक्ति का पाना और दुर्लभ है । इसलिए विद्युत् के समान चंचल मानुष शरीर पाकर पशु-पाश से विमुक्त करने वाले भगवान् का भक्ति पूर्वक स्मरण करना चाहिए । ऐसा करने से सब प्रकार की बाधायें दूर हो जातीं हैं और हृदय शुद्ध हो जाता है । जनार्दन की पूजा करने पर परम