भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१६६ नारदीयपुराणम् परं मोक्षं लभेच्चैव पूजिते तु जनार्दने। धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषाथर्ाः सनातनाः ॥१०१॥ हरिपूजापराणां तु सिध्यन्ति नात्र संशयः। पुत्रदारगृहक्षेत्रधनधान्याभिधावतीम् ॥१०२॥ लब्ध्वेमां मानुषीं वृत्तिं रे रे दर्पं तु मा वृथाः। सन्त्यज्य कामं क्रोधं च लोभं मोहं मदं तथा ॥१०३॥ परापवादं निन्दां च भजध्वं भक्तितो हरिम्। व्यापारान्सकलांस्त्यक्त्वा पूजयध्वं जनार्दनम् ॥१०४॥ निकटा एव दृश्यंते कृतांतनगरद्रुमाः। यावन्नायाति मरणं यावन्नायाति वै जरा ॥१०५॥ यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावदेवार्चयेद्धरिम्। धीमान्न कुर्याद्विश्वासं शरीरेऽस्मिन्विनश्वरे ॥१०६॥ नित्यं सन्निहितो मृत्युः संपदत्यंतचंचला। आसन्नमरणो देहस्तस्माद्दपं विमुंचत ॥१०७॥ संयोगा विप्रयोगांताः सर्वं च क्षणभंगुरम्। एतज्ज्ञात्वा महाभाग पूजयस्व जनार्दनम् ॥१०८॥ आशया व्यथते चैव मोक्षस्त्वत्यंतदुर्लभः। भक्त्या यजति यो विष्णुं महापातकवानपि ॥१०६॥ सोऽपि याति परं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति। सर्वतीर्थानि यज्ञाश्च सांगा वेदाश्च सत्तम ॥११०॥ नारायणर्चनस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम्। किं वै वेदैर्मखैः शास्त्रैः किं वा तीर्थनिषेवणैः ॥१११॥ विष्णुभक्तिविहीनानां किं तपोभिर्व्रतैरपि ॥११२॥ यजंति ये विष्णुमनंतमूर्त्ति निरीक्ष्य चाकारगतं वरेण्यम्। ॥११३॥ वेदांतवेद्यं भवरोगवैद्यं ते यांति मर्त्याः पदमच्युतस्य अनादिमात्मानमनंतशक्तिमाधारभूतं जगतः सुरेड्यम्। ॥११४॥ ज्योतिःस्वरूपं परमच्युताख्यं स्मृत्वा समभ्येति नरः सखायम् इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे प्रायश्चित्तविधिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥

मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये सनातन पुरुषार्थ हैं जो हरि भक्तों को निःसन्देह प्राप्त हो जाते हैं ॥६८-१०११/२॥ अरे मनुष्यो ! पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र, धनधान्य आदि की ओर दौड़ने वालो मानवीय वृत्ति को पाकर तुम व्यर्थ में दर्प मत करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, पर-निन्दा, अपवाद को छोड़कर भक्ति पूर्वक हरि का स्मरण करो। सब व्यापारों को छोड़कर जनार्दन की पूजा करो, देखो, यमपुरी के वृक्ष समीप दिखाई दे रहे हैं अर्थात् मृत्यु अत्यन्त सन्निकट है। जब तक मृत्यु निकट नहीं आयी, बुढ़ापा गला नहीं पकड़तो, जब तक इन्द्रियाँ शिथिल नहीं होतीं तब तक ही भगवान् की पूजा कर लो। इस संसार में बुद्धिमान् कभी भी इस भंगुर शरीर पर विश्वास नहीं करते ॥१०२-१०६॥ मृत्यु सर्वदा निकट रहती है, यह लौकिक संपत्ति अत्यन्त चंचल है, यह शरीर मृत्यु के अति निकट है, इसलिए दर्प को छोड़ो। महाभाग ! संयोग का अवसान वियोग में होता है, सारे पदार्थ क्षणभंगुर हैं, यह जानकर जनार्दन की पूजा करो। यह संसार आशा से ही व्यथा पा रहा है, मोक्ष तो अत्यन्त दुर्लभ है परन्तु जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु की पूजा करता है, वह महा पापी हो क्यों न हो—वह परम स्थान को प्राप्त कर लेता है जहाँ जाकर उसको कोई शोक नहीं रह जाता। महाभाग ! सारे तीर्थ, यज्ञ, अंग सहित वेद-ये सभी विष्णु पूजन की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है ॥१०७-११०१/२॥ उनके वेदाध्ययन, शास्त्र, तीर्थ-सेवन, तप और व्रत से क्या लाभ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं। जो अनन्त मूर्ति, वरेण्य, वेदान्त- वेद्य, सांसारिक रोगों के एक मात्र वैद्य विष्णु की मूर्ति को देखकर उनको पूजा करते हैं, वे मनुष्य उस अच्युत हरि के लोक को चले जाते हैं। मनुष्य अनादि, परमात्मा, अनंत शक्तिशाली संसार के आधारभूत, देवपूज्य, ज्योतिः स्वरूप, परम और अच्युत नामक भगवान् का स्मरण करता है वह उनका मित्र बन जाता है ॥१११-११४॥ श्रीमन्नारदीयमहापुराण में प्रायश्चित्त विधि नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३०॥