बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकत्रिंशोऽध्यायः नारद उवाच कथितो भवता सम्यग्वर्णाश्रमविधिर्मुने । इदानीं श्रोतुमिच्छामि यममार्गं सुदुर्गमम् ॥१॥ सनक उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यममार्गं सुदुर्गमम् । सुखदं पुण्यशीलानां पापिनां भयदायकम् ॥२॥ षडशीतिसहस्राणि योजनानि मुनीश्वर । यममार्गस्य विस्तारः कथितः पूर्वसूरिभिः ॥३॥ ये नरा दानशीलास्तु ते यांति सुखिनो द्विज । धर्मशून्या नरा यांति दुःखेन भृशमर्दिताः ॥४॥ अतिभीता विवस्त्राश्च शुष्ककंठौष्ठतालुकाः । क्रंदंतो विस्वरं दीनाः पापिनो यांति तत्पथि ॥५॥ हन्यमाना यमभटैः प्रतोदायैस्तथायुधैः । इतस्ततः प्रधावंतो यांति दुःखेन तत्पथि ॥६॥ क्वचित्पंकः क्वचिद्वह्निः क्वचित्संतप्तसैकतम् । क्वचिद्वै दावरूपेण तीक्ष्णधाराः शिलाः क्वचित् ॥७॥ क्वचित्कंटकवृक्षाश्च दुःखारोहशिला नगाः । गाढांधकाराश्च गुहाः कंटकावरणं महत् ॥८॥ वप्राग्रारोहणं चैव कन्दरस्य प्रवेशनम् । शर्कराश्च तथा लोष्टाःसूचीतुल्याश्च कंटकाः ॥६॥ शैवालं च क्वचिन्मार्गे क्वचित्कीचकपंक्तयः । क्वचिद्व्याघ्राश्च गर्जते वर्धते च क्वचिज्ज्वराः ॥१०॥ अध्याय ३१ यमदूतों के कृत्य का वर्णन नारद बोले--मुने ! आपने वर्णाश्रम विधि का वर्णन भली भाँति कर दिया । अब मैं अत्यंत दुर्गम यम, मार्ग का वर्णन सुनना चाहता हूँ ।।१।। सनक बोले - विप्र ! सुनो, मैं उस दुर्गम यम मार्ग का वर्णन कर रहा हूँ जो पुण्य शील जनों के लिए सुखद और पापियों के लिए भयदायक है । मुनीश्वर ! पूर्व आचार्यों ने यम मार्ग का विस्तार छियासी हजार योजन बतलाया है ॥२-३॥ द्विज ! जो दानशील हैं वे व्यक्ति सुखपूर्वक उस मार्ग से चले जाते हैं । परन्तु जो धार्मिक नहीं हैं वे उस मार्ग पर बड़ी पीड़ा और कष्ट से जाते हैं । पापी लोग उस पथ पर चलते समय भय- त्रस्त हो जाते, उनके वस्त्र गिर जाते, कण्ठ, ओठ और तालू सूख जाते हैं । वे दीन करुण स्वर से रोते चिल्लाते हैं । उस पथ पर चलते समय यमदूत कोड़े और शस्त्रों से मारते हैं । वे इधर उधर भागते और बड़े कष्ट से चलते हैं ॥४-६॥ उस मार्ग में कहीं तो कीचड़ है, कहीं अग्नि, कहीं जलती हुई बालुका और कहीं तीखी धार वालो शिलायें शस्त्र के रूप में सीधी खड़ी हैं । कहीं कांटेदार वृक्ष, कहीं ऐसे पहाड़ हैं जिनकी चट्टानों पर पैर रखकर चलना अत्यन्त कष्टकर है । कहीं बड़ी बड़ी गुफायें हैं जिनमें सदा अन्धकार रहता और जो कांटों से ढंकी रहती है ॥७-८॥ वहाँ ऊँची ऊँची चोटियों पर चढ़ना पड़ता तो कभी कन्दराओं में घुसना पड़ता है । कहीं छोटी-छोटी कंकड़ियाँ, ढेले, कहीं सुई के समान काँटे तो कहीं मार्ग में सेवार और बाँसों की पाँत खड़ी रहती हैं । कहीं बाघ गुर्रारि तो कहीं