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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

१६२ नारदीयपुराणम्

कपालध्वजहीनं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गुरूणां यज्ञकतूंणां धम्मिष्ठानां तथैव च ॥३८॥ श्रोत्रियाणां द्विजानां तु हृत्वा हेमैवमाचरेत् । कृतानुतापो देहे च संपूर्ण लेपयेद् घृतम् ॥४०॥ करीषच्छादितो दग्धःस्तेयपापाद्विमुच्यते । ब्रह्मस्वं क्षत्रियो हृत्वा पश्चात्तापमवाप्य च ॥४१॥ पुनर्ददाति तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे । तत्र सांतपनं कृत्वा द्वादशाहोपवासतः ॥४२॥ शुद्धिमाप्नोति देवर्षे ह्यन्यथा पतितो भवेत् । रत्नासनमनुष्यस्त्रीधेनुभूम्यादिकेषु च ॥४३॥ सुवर्णसदृशेष्वे षु प्रायश्चित्तार्द्धमुच्यते । त्रसरेणुसमं हेम हृत्वा कुर्यात्समाहितः ॥४४॥ प्राणायामद्वयं सम्यक् तेन शुद्ध्यति मानवः । प्राणायामत्रयं कुर्याद्धृत्वा निष्कप्रमाणकम् ॥४५॥ प्राणायामांश्च चत्वारो राजसर्षपमात्रके । गौरसर्षपमानं तु हृत्वा हेम विचक्षणः ॥४६॥ स्नात्वा च विधिवज्जप्याद्गायत्र्यष्टसहस्रकम् । यवमात्रसुवर्णस्य स्तेयाच्छुद्धो भवेद्द्विजः ॥४७॥ आसायं प्रातरारभ्य जप्त्वा वै वेदमातरम् । हेमकृष्णलमात्रं तु हृत्वा सांतपनं चरेत् ॥४८॥ माषप्रमाणे हेम्नस्तु प्रायश्चित्तं निगद्यते । गोमूत्रपक्वयवभुग्वर्षेणैकेन शुद्ध्यति ॥४६॥ संपूर्णस्य सुवर्णस्य स्तेयं कृत्वा मुनीश्वर । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥५०॥ सुवर्णमानान्न्यूने तु रजतस्तेयकर्मणि । कुर्यात्सांतपनं सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥५१॥ दशनिष्कांतपर्यन्तमूर्ध्वं निष्कचतुष्टयात् । हृत्वा च रजतं विद्वान्कुर्याच्चांद्रायणं मुने ॥५२॥ दशादिशतनिष्कांतं यः स्तेयी रजतस्य तु । चांद्रायणद्वयं तस्य प्रोक्तं पापविशोधकम् ॥५३॥ शतादूर्ध्वं सहस्रांतं प्रोक्तं चांद्रायणत्रयम् । सहस्रादधिकस्तेये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥५४॥

ब्राह्मण का धन चुरा लेने पर बारह वर्ष तक पूर्व की भांति ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिए, केवल कपाल ध्वज नहीं धारण करना चाहिए ॥३७-३८॥ गुरु, यज्ञकर्त्ता, धर्मिष्ठ, श्रोत्रिय और द्विजों का सुवर्ण चुराने से इस प्रकार प्रायश्चित्त किया जाता है कि पहले अपने पाप पर पश्चात्ताप करे और अपने शरीर पर घी का लेप कर करसी की आग में जल कर मर जाय। इस प्रकार वह चोरी के पाप से छूट जाता है। क्षत्रिय यदि ब्राह्मण के धन को चुरा कर पुनः पश्चात्ताप करे और उसी ब्राह्मण को लौटा दे तब उसको जो प्रायश्चित्त करना पड़ता है उसको मुझसे सुनो ॥३९-४१॥ इस दशा में बारह दिन तक उपवासकर सान्तपन करे तभी वह शुद्ध हो सकता है देवर्षि ! अन्यथा वह पतित कहा जाता है । रत्नासन, मनुष्य, स्त्री, धेनु, और भूमि आदि का चुराना सुवर्णस्तेय के समान ही माना जाता है, परन्तु इसके लिए सुवर्णस्तेय का आधा प्रायश्चित्त कहा गया है। त्रसरेणु के बराबर सोना चुरा लेने पर एकाग्र हो दो प्राणायाम करे तभी वह मनुष्य भली भाँति शुद्ध होता है । निष्क परिमित सोना चुराने पर तीन प्राणायाम करे । राजसर्षप मात्र सोना चुराने पर चार प्राणायाम करे । विज्ञ व्यक्ति गौर सर्षप परिमित सोना चुरा लेने पर विधिवूर्वक स्नान कर आठ हजार गायत्री का जप करे ॥४२-४६॥ यव मात्र सोना चुराने पर द्विज प्रातः काल से लेकर सायङ्काल वेदमाता गायत्री का जप करने पर शुद्ध होता है । कृष्णल (गुंजा) मात्र सोना चुराने पर सान्तपन व्रत करे । माष प्रमाण सुवर्ण की चोरी करने पर प्रायश्चित्त कहा गया है कि वह व्यक्ति एक वर्ष तक गोमूत्र में यव पकाकर खाय तभी वह शुद्ध होता है ॥४७-४६॥ मुनीश्वर ! सम्पूर्ण सुवर्ण के चुराने पर सावधान हो बारह वर्ष तक ब्रह्महत्या व्रत करे । सुवर्णमान से कम चाँदी के चुराने पर विधिवत् सान्तपन व्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। मुने ! चार निष्क (१६ माशे का परिमाण) से दश निष्क तक चाँदी की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करे । दश निष्क से लेकर सौ निष्क तक की चाँदी जो चुराता है उसके पापों का संशोधन दो चान्द्रायण व्रत करने से ही होता है ॥५०-५२॥ सौ निष्क से अधिक हजार निष्क तक चुराने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। हजार निष्क से अधिक चुराने पर ब्रह्महत्या व्रत करना पड़ता है । कोईम्,

त्रिंशोऽध्यायः १८३ कांस्यपित्तलमुख्येषु ह्ययस्कांते तथैव च । सहस्रनिष्कमाने तु पराकं परिकीर्तितम् ॥५५॥ प्रायश्चित्तं तु रत्नानां स्तेये रजतवत्स्मृतम् । गुरुतल्पगतानां च प्रायश्चित्तमुदीर्यते ॥५६॥ अज्ञानान्मातरं गत्वा तत्सपत्नीमथापि वा । स्वयमेव स्वमुष्कं तु च्छित्त्वापापमुदीरयन् ॥५७॥ हस्ते गृहीत्वा मुष्कं तु गच्छेद्वै नैर्ऋतीं दिशम् । गच्छन्मार्गे सुखं दुःखं न कदाचिद्विचारयेत् ॥५८॥ अपश्यन्गच्छतो गच्छेत्प्राणान्तं यः स शुद्ध्यति । महत्प्रपतनं वापि कुर्यात्पापमुदाहरन् ॥५९॥ स्ववर्णोत्तमवर्णस्त्रीगमने त्वविचारतः । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥६०॥ अमत्याभ्यासतो गच्छेत्सवणीं चोत्तमां तथा । कारीषाग्निना दग्धः शुद्धिं याति द्विजोत्तम ॥६१॥ रेतःसेकात्पूर्वमेव निवृत्तो यदि मातरि । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्रेतःसेकेऽग्निदाहनम् ॥६२॥ सवर्णोत्तमवर्णासु निवृत्तो वीर्यसेचनात् । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यान्नवब्दान्विष्णुतत्परः ॥६३॥ वैश्यायां पितृपत्न्यां तु षडब्दं व्रतमाचरेत् । गत्वा शूद्रां गुरोर्भार्यां त्रिवर्षं व्रतमाचरेत् ॥६४॥ मातृष्वसारं च पितृष्वसारमाचार्यभार्यां श्वशुरस्य पत्नीम् । ॥६५॥ पितृव्यभार्यामथ मातुलीनीं पुत्रीं च गच्छेदयदि काममुग्धः दिनद्वये ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्यथाविधि । एकस्मिन्नेव दिवसे बहुवारं त्रैवार्षिकम् ॥६६॥ एकं वारं गते ह्यब्दं व्रतं कृत्वा विशुद्ध्यति । दिनत्रये गते वह्निदग्धः शुध्येत नान्यथा ॥६७॥ चांडालीं पुक्कसीं चैव स्नुषां च भगिनीं तथा । मित्रस्त्रियं शिष्यपत्नीं यस्तु वै कामतो व्रजेत् ॥६८॥ ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात्स षडब्दं मुनीश्वर । अकामतो व्रजेद्यस्तु सोऽब्दकृच्छ्रं समाचरेत् ॥६९॥ महापातकिसंसर्गे प्रायश्चित्तं निगद्यते । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥७०॥ पित्तल और अयस्कान्त आदि की यदि हजार निष्क मात्रा में चोरी की जाय तो उस चोर को पराक व्रत करना चाहिए । रत्नों की चोरी में भी चाँदी की चोरी के समान ही प्रायश्चित्त कहा गया है ॥५३-५६॥ गुरुतल्प गमन का प्रायश्चित्त कह रहा हूँ सुनो । अनजाने माता या माता की सौत से मैथुन करने वाला व्यक्ति स्वयं अपने पापों की घोषणा करते हुए अपने अण्डकोश को काट दे । अविचार अज्ञानवश अपने वर्ण से उत्तम वर्ण वाली स्त्री से संभोग करने पर बारह वर्ष तक सावधानी से ब्रह्म हत्या व्रत करना चाहिए ॥५७-६०॥ द्विजोत्तम । अविवेक और अभ्यास के कारण यदि सवर्णा या उत्तम वर्ण की कन्या से सम्भोग करे तो वह करसी की आग में जल कर ही शुद्ध हो सकता है । मातृयोनि में वीर्य पात करने के पूर्व ही यदि मैथुन त्याग कर दे तब तो वह ब्रह्म हत्या व्रत करे और वीर्य पात करने पर तो अग्नि में भस्म हो जाना ही प्रायश्चित्त है । सवर्ण अथवा उत्तम वर्ण में वीर्य पात करने के पूर्व ही मैथुन से हट जाने पर नव वर्ष तक भगवान् की पूजा में एकनिष्ठ हो ब्रह्महत्या व्रत करे ॥६१-६३॥ पिता की वैश्या पत्नी से व्यभिचार करने पर छह वर्ष तक व्रत पालन करे और गुरु की शूद्र भार्या से भोग करने पर तीन वर्ष तक, मौसी, फुआ, आचार्य-भार्या, श्वशुर की स्त्री, चाचा की स्त्री, मामी और पुत्री से यदि कामविह्वल होकर दो दिन मैथुन कर दे तो यथा विधि ब्रह्महत्या व्रत करे । एक ही दिन कई बार संभोग करने पर तीन वर्ष तक और एक बार करने पर एक वर्ष तक व्रत करे तभी वह शुद्ध हो सकता है । तीन दिन मैथुन करने पर केवल अग्नि में भस्म होने पर ही शुद्धि हो सकती है, अन्यथा नहीं ॥६४-६७॥ मुनीश्वर ! चाण्डाली, पुक्कसी पुत्रवधू, बहिन, मित्रस्त्री, शिष्यपत्नी से जो काम-भावना से भोग करता है वह छह वर्ष तक ब्रह्म-हत्या व्रत करे, जो अकामभाव से ऐसा करे, वह एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे ॥६८-६९॥ अब महापापी की संगति से जो-जो पाप लगते हैं उनके लिए प्रायश्चित्त कह रहा हूँ । प्रायश्चित्त करने से मनुष्य का आत्मा शुद्ध होता है और वह सब कर्म फलों का अधिकारी होता है । जिसका उपर्युक्त चार प्रकार के २५ नारदीयपुराण

१६४ नारदीयपुराणम् यस्य येन भवेत्संगो ब्रह्महादिचतुर्ष्वपि । तत्तद्व्रतं स निर्वर्त्य शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥७१॥ अज्ञानात्पंचरात्रं तु संगमेभिः करोति यः । कायकृच्छ्रं चरेत्सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥७२॥ द्वादशाहे तु संसर्गे महासांतपनं स्मृतम् । संगंकृत्वाऽर्द्धमासं तु द्वादशाहमुपावसेत् ॥७३॥ पराको माससंसर्गे चांद्रमासत्रये स्मृतम् । कृत्वा संगं तु षण्मासं चरेच्चान्द्रायणद्वयम् ॥७४॥ किंचिन्न्यूनाब्दसंगे तु षण्मासव्रतमाचरेत् । एतच्च त्रिगुणं प्रोक्तं ज्ञातात्संगे यथाक्रमम् ॥७५॥ मंडूकं नकुलं काकं वराहं मूषकं तथा । मार्जाराजाविकं श्वानं हत्वा कुक्कुटकं तथा ॥७६॥ कृच्छ्राद्धं माचरेद्विप्रोऽतिकृच्छ्रं चाश्वहा चरेत् । तप्तकृच्छ्रं करिवधे पराकं गोवधे स्मृतम् ॥७७॥ कामतो गोवधे नैव शुद्धिर्दृष्टा मनीषिभिः । पानं शय्यासनाद्येषु पुष्पमूलफलेषु च ॥७८॥ भक्ष्यभोज्यापहारेषु पंचगव्यविशोधनम् । शुष्ककाष्ठतृणानां च द्रुमाणां च गुडस्य च ॥७९॥ चर्मवस्त्राभिषाणां च त्रिरात्रं स्वादभोजनम् । टिट्टिभं चक्रवाकं च हंसं कारंडवं तथा ॥८०॥ उलूकं सारसं चैव कपोतं जलपादकम् । शुकं चाषं बलाकं च शिशुमारं च कच्छपम् ॥८१॥ एतेष्वन्यतमं हत्वा द्वादशाहमभोजनम् । प्राजापत्यव्रतं कुर्याद्रैतोविण्मूत्रभोजने ॥८२॥ चांद्रायणत्रयं प्रोक्तं शूद्रोच्छिष्टस्य भोजने । रजस्वलां च चांडालं महापातकिनं तथा ॥८३॥ सूतिकां पतितं चैव उच्छिष्टं रजकादिकम् । स्पृष्ट्वा सचैलं स्नायीत घृतं संप्राश्येत्तथा ॥८४॥ गायत्रीं च विशुद्धात्मा जपेदष्टशतं द्विज । एतेष्वन्यतमं स्पृष्ट्वा अज्ञानाद्यदि भोजने ॥८५॥ महापापियों में किसी से संसर्ग हो जाता है उसकी उसी महापाप के अनुकूल व्रत करने से शुद्धि होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। जो अज्ञान वश पाँच रात्रि तक इनमें से किसी के साथ रहता है वह कायकृच्छ्रव्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। बारह दिन की संगति में तो महासान्तपन व्रत करना ही उचित माना गया है। आधे महीने तक संगति करने से बारह दिन तक उपवास करना चाहिए। एक महीने तक साथ रहने पर पराक व्रत और तीन महीने के संसर्ग में चान्द्रायण व्रत करना श्रेयस्कर कहा जाता है। छह महीने के साहचर्य में दो चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥६९-७४॥ एक वर्ष से कुछ कम समय तक साथ रहने से षण्मास व्रत करना चाहिए। जान बूझकर संगति करने पर क्रमशः इनका तिगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ऐसा शास्त्रकारों का कहना है ॥७५॥ मेढक, नेवला, कौआ, सूअर, चूहा, बिल्ली, बकरी, भेड़, कुत्ता और मुर्गा इतने जीवों की हत्या करने पर ब्राह्मण को अर्द्ध कृच्छ्र करना चाहिए। अश्व वध करने वाले को अति कृच्छ्र व्रत करना चाहिए। हाथी के वध में तप्तकृच्छ्र और गोवध में पराक व्रत कहा गया है। मनीषियों ने जान बूझकर गोहत्या करने वालों पर किसी प्रकार का प्रायश्चित नहीं बतलाया है ॥७६-७७॥ पीने योग्य वस्तु रस, शरबत आदि, खटिया, आसन और फल फूल मूल अथवा भक्ष्य भोज्य आदि के चुरा लेने पर पंचगव्य से शुद्धि कही गई है। सूखी लकड़ी, तृण, वृक्ष, गुड़, चमड़ा वस्त्र और मांस को चुरा लेने पर तीन रात तक उपवास करना चाहिए। टिटिहिरी, चक्रवाक, हंस, कारंडव, उल्लू, सारस, कपोत, जलपादक (एक प्रकार का हंस), सुग्गा, चाष, बगुला, शिशुमार, कछुआ इनमें से किसी की हत्या करने पर बारह दिन तक भोजन नहीं करना चाहिए। वीर्य, विष्ठा और मूत्र भोजन करने पर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥७८-८२॥ शूद्र का जूठा भोजन करने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत का विधान है। रजस्वला स्त्री, चाण्डाल, महापापी सूतिका (जच्चा) पतित, जूठा भोजन, धोबी आदि छू जाने पर सचैल (वस्त्र- सहित) स्नान करने और घृत प्राशन भी करे। द्विज ! इस प्रकार विशुद्ध हो आठ सौ गायत्री का जप करे। यदि इनमें से किसी को छू कर अनजाने अज्ञान वश भोजन कर ले तो द्विज ! वह व्यक्ति तीन रात

त्रिंशोऽध्यायः १८५ त्रिरात्रोपोषणाच्छुद्धयेत्पञ्चगव्याशनाद्विज । स्नानदानजपादौ च भोजनादौ च नारद ॥८६॥ एषामन्यतमस्यापि शब्दं यः शृणुयाद्वदेत् । उद्गमेद्भुक्तमन्नंतत्स्नात्वा चोपवसेत्तथा ॥८७॥ द्वितीयेऽह्नि घृतं प्राश्य शुद्धिमाप्नोति नारद । व्रतादिमध्ये यद्येषा शृणुयाद्ध्वनिमप्युत ॥८८॥ अष्टोत्तरसहस्रं तु जपेद्वै वेदमातरम् । पापानामधिकं पापं द्विजदैवतनिन्दनम् ॥८६॥ न दृष्ट्वा निष्कृतिस्तस्य सर्वशास्त्रेषु नारद । महापातकतुल्यानि यानि प्रोक्तानि सूरिभिः ॥६०॥ प्रायश्चित्तं तु तेषां च कुर्यादेवं यथाविधि । प्रायश्चित्तानि यः कुर्यान्नारायणपरायणः ॥६१॥ तस्य पापानि नश्यंति ह्यन्यथा पतितो भवेत् । यस्तु रागादिनिर्मुक्तो ह्यनुतापसमन्वितः ॥६२॥ सर्वभूतदयायुक्तो विष्णुस्मरणतत्परः । महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः ॥६३॥ विमुक्त एव पापेभ्यो ज्ञेयो विष्णुपरो यतः । नारायणमनाद्यंतं विश्ववाकारमनामयम् ॥६४॥ यस्तु संस्मरते मर्त्यः स मुक्तः पापकोटिभिः । स्मृतो वा पूजितो वापि ध्यातः प्रणमितोऽपि वा ॥६५॥ नाशयत्येव पापानि विष्णुर्हृद्गमनः सताम् । संपर्कद्विदि वा मोहाद्यस्तु पुजयते हरिम् ॥६६॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्रयाति हरेः पदम् । सकृत्संस्मरणाद्विष्णोर्नश्यंति क्लेशसंचयाः ॥६७॥ स्वर्गादिभोगप्राप्तिस्तु तस्य विप्रानुमीयते । मानुषं दुर्लभं जन्म प्राप्यते यैर्मुनीश्वर ॥६८॥ तत्रापि हरिभक्तिस्तु दुर्लंभा परिकीर्त्तिता । तस्मात्तडिल्लतालोलं मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ॥६९॥ हरिं संपूजयेद्भक्त्या पशुपाशविमोचनम् । सर्वेऽन्तराया नश्यंति मनःशुद्धिश्च जायते ॥१००॥ तक उपवास करने से शुद्ध होता है अथवा पंचगव्यका पान करे ॥८३-८५३॥ नारद ! स्नान, दान, जप अथवा भोजन आदि के समय यदि इनमें से किसी का शब्द सुन ले या स्वयं इनसे बातचीत करे तो वही व्यक्ति खाया हुआ अन्न उगल दे और स्नान कर उस दिन उपवास करे । नारद ! दूसरे दिन संविधि घृतप्राशन करने पर वह शुद्ध होता है । व्रत आदि के मध्यकाल में यदि इनकी बोली भी सुन ले तो एक हजार आठ बार वेद माता गायत्री का जप करे ॥८६-८८३॥ द्विज और देवताओं की निन्दा सब पापों से बढ़ कर पाप है । नारद ! सब शास्त्रों में इसका कोई प्रायश्चित्त नहीं लिखा है । महापापों के बराबर जो पाप कहे गये हैं उनके लिए इस प्रकार का प्रायश्चित्त विधिपूर्वक करना चाहिए जो व्यक्ति नारायण का स्मरण करता हुआ प्रायश्चित्त करता है उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, अन्यथा वह पतित हो रहता है । जो राग आदि से मुक्त हो पश्चात्ताप करता और सब प्राणियों पर दया भाव रखकर विष्णु के स्मरण में लगा रहता है, वह महापातकी हो चाहे सब पापों से युक्त क्यों न हो, उसको सब पापों से मुक्त समझना चाहिए । क्योंकि वह विष्णु का सेवक है ॥८९-६३३॥ जो मनुष्य, अनन्त, विश्वरूप निर्विकार नारायण का स्मरण करता है वह अपने करोड़ों पापों से मुक्त हो जाता है । भगवान् विष्णु के स्मरण, पूजा, ध्यान प्रणाम से सज्जनों के हृदय में निवास करने वाले भगवान् उसके पापों को नष्ट कर देते हैं । जो साहचर्य या मोह वश भी भगवान् की पूजा करता है वह भी सब पापों से मुक्त हो विष्णु- लोक को चला जाता है । भगवान् का एक बार भी स्मरण करने से सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं ॥६४-६७॥ विप्र ! स्वर्ग आदि भोग-प्राप्ति का तो अनुमान ही किया जा सकता है । मुनीश्वर ! पहले तो मानुष जन्म पाना ही दुर्लभ है, मानव जीवन में हरि भक्ति का पाना और दुर्लभ है । इसलिए विद्युत् के समान चंचल मानुष शरीर पाकर पशु-पाश से विमुक्त करने वाले भगवान् का भक्ति पूर्वक स्मरण करना चाहिए । ऐसा करने से सब प्रकार की बाधायें दूर हो जातीं हैं और हृदय शुद्ध हो जाता है । जनार्दन की पूजा करने पर परम

१६६ नारदीयपुराणम् परं मोक्षं लभेच्चैव पूजिते तु जनार्दने। धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषाथर्ाः सनातनाः ॥१०१॥ हरिपूजापराणां तु सिध्यन्ति नात्र संशयः। पुत्रदारगृहक्षेत्रधनधान्याभिधावतीम् ॥१०२॥ लब्ध्वेमां मानुषीं वृत्तिं रे रे दर्पं तु मा वृथाः। सन्त्यज्य कामं क्रोधं च लोभं मोहं मदं तथा ॥१०३॥ परापवादं निन्दां च भजध्वं भक्तितो हरिम्। व्यापारान्सकलांस्त्यक्त्वा पूजयध्वं जनार्दनम् ॥१०४॥ निकटा एव दृश्यंते कृतांतनगरद्रुमाः। यावन्नायाति मरणं यावन्नायाति वै जरा ॥१०५॥ यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावदेवार्चयेद्धरिम्। धीमान्न कुर्याद्विश्वासं शरीरेऽस्मिन्विनश्वरे ॥१०६॥ नित्यं सन्निहितो मृत्युः संपदत्यंतचंचला। आसन्नमरणो देहस्तस्माद्दपं विमुंचत ॥१०७॥ संयोगा विप्रयोगांताः सर्वं च क्षणभंगुरम्। एतज्ज्ञात्वा महाभाग पूजयस्व जनार्दनम् ॥१०८॥ आशया व्यथते चैव मोक्षस्त्वत्यंतदुर्लभः। भक्त्या यजति यो विष्णुं महापातकवानपि ॥१०६॥ सोऽपि याति परं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति। सर्वतीर्थानि यज्ञाश्च सांगा वेदाश्च सत्तम ॥११०॥ नारायणर्चनस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम्। किं वै वेदैर्मखैः शास्त्रैः किं वा तीर्थनिषेवणैः ॥१११॥ विष्णुभक्तिविहीनानां किं तपोभिर्व्रतैरपि ॥११२॥ यजंति ये विष्णुमनंतमूर्त्ति निरीक्ष्य चाकारगतं वरेण्यम्। ॥११३॥ वेदांतवेद्यं भवरोगवैद्यं ते यांति मर्त्याः पदमच्युतस्य अनादिमात्मानमनंतशक्तिमाधारभूतं जगतः सुरेड्यम्। ॥११४॥ ज्योतिःस्वरूपं परमच्युताख्यं स्मृत्वा समभ्येति नरः सखायम् इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे प्रायश्चित्तविधिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥

मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये सनातन पुरुषार्थ हैं जो हरि भक्तों को निःसन्देह प्राप्त हो जाते हैं ॥६८-१०११/२॥ अरे मनुष्यो ! पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र, धनधान्य आदि की ओर दौड़ने वालो मानवीय वृत्ति को पाकर तुम व्यर्थ में दर्प मत करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, पर-निन्दा, अपवाद को छोड़कर भक्ति पूर्वक हरि का स्मरण करो। सब व्यापारों को छोड़कर जनार्दन की पूजा करो, देखो, यमपुरी के वृक्ष समीप दिखाई दे रहे हैं अर्थात् मृत्यु अत्यन्त सन्निकट है। जब तक मृत्यु निकट नहीं आयी, बुढ़ापा गला नहीं पकड़तो, जब तक इन्द्रियाँ शिथिल नहीं होतीं तब तक ही भगवान् की पूजा कर लो। इस संसार में बुद्धिमान् कभी भी इस भंगुर शरीर पर विश्वास नहीं करते ॥१०२-१०६॥ मृत्यु सर्वदा निकट रहती है, यह लौकिक संपत्ति अत्यन्त चंचल है, यह शरीर मृत्यु के अति निकट है, इसलिए दर्प को छोड़ो। महाभाग ! संयोग का अवसान वियोग में होता है, सारे पदार्थ क्षणभंगुर हैं, यह जानकर जनार्दन की पूजा करो। यह संसार आशा से ही व्यथा पा रहा है, मोक्ष तो अत्यन्त दुर्लभ है परन्तु जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु की पूजा करता है, वह महा पापी हो क्यों न हो—वह परम स्थान को प्राप्त कर लेता है जहाँ जाकर उसको कोई शोक नहीं रह जाता। महाभाग ! सारे तीर्थ, यज्ञ, अंग सहित वेद-ये सभी विष्णु पूजन की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है ॥१०७-११०१/२॥ उनके वेदाध्ययन, शास्त्र, तीर्थ-सेवन, तप और व्रत से क्या लाभ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं। जो अनन्त मूर्ति, वरेण्य, वेदान्त- वेद्य, सांसारिक रोगों के एक मात्र वैद्य विष्णु की मूर्ति को देखकर उनको पूजा करते हैं, वे मनुष्य उस अच्युत हरि के लोक को चले जाते हैं। मनुष्य अनादि, परमात्मा, अनंत शक्तिशाली संसार के आधारभूत, देवपूज्य, ज्योतिः स्वरूप, परम और अच्युत नामक भगवान् का स्मरण करता है वह उनका मित्र बन जाता है ॥१११-११४॥ श्रीमन्नारदीयमहापुराण में प्रायश्चित्त विधि नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३०॥

एकत्रिंशोऽध्यायः नारद उवाच कथितो भवता सम्यग्वर्णाश्रमविधिर्मुने । इदानीं श्रोतुमिच्छामि यममार्गं सुदुर्गमम् ॥१॥ सनक उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यममार्गं सुदुर्गमम् । सुखदं पुण्यशीलानां पापिनां भयदायकम् ॥२॥ षडशीतिसहस्राणि योजनानि मुनीश्वर । यममार्गस्य विस्तारः कथितः पूर्वसूरिभिः ॥३॥ ये नरा दानशीलास्तु ते यांति सुखिनो द्विज । धर्मशून्या नरा यांति दुःखेन भृशमर्दिताः ॥४॥ अतिभीता विवस्त्राश्च शुष्ककंठौष्ठतालुकाः । क्रंदंतो विस्वरं दीनाः पापिनो यांति तत्पथि ॥५॥ हन्यमाना यमभटैः प्रतोदायैस्तथायुधैः । इतस्ततः प्रधावंतो यांति दुःखेन तत्पथि ॥६॥ क्वचित्पंकः क्वचिद्वह्निः क्वचित्संतप्तसैकतम् । क्वचिद्वै दावरूपेण तीक्ष्णधाराः शिलाः क्वचित् ॥७॥ क्वचित्कंटकवृक्षाश्च दुःखारोहशिला नगाः । गाढांधकाराश्च गुहाः कंटकावरणं महत् ॥८॥ वप्राग्रारोहणं चैव कन्दरस्य प्रवेशनम् । शर्कराश्च तथा लोष्टाःसूचीतुल्याश्च कंटकाः ॥६॥ शैवालं च क्वचिन्मार्गे क्वचित्कीचकपंक्तयः । क्वचिद्व्याघ्राश्च गर्जते वर्धते च क्वचिज्ज्वराः ॥१०॥ अध्याय ३१ यमदूतों के कृत्य का वर्णन नारद बोले--मुने ! आपने वर्णाश्रम विधि का वर्णन भली भाँति कर दिया । अब मैं अत्यंत दुर्गम यम, मार्ग का वर्णन सुनना चाहता हूँ ।।१।। सनक बोले - विप्र ! सुनो, मैं उस दुर्गम यम मार्ग का वर्णन कर रहा हूँ जो पुण्य शील जनों के लिए सुखद और पापियों के लिए भयदायक है । मुनीश्वर ! पूर्व आचार्यों ने यम मार्ग का विस्तार छियासी हजार योजन बतलाया है ॥२-३॥ द्विज ! जो दानशील हैं वे व्यक्ति सुखपूर्वक उस मार्ग से चले जाते हैं । परन्तु जो धार्मिक नहीं हैं वे उस मार्ग पर बड़ी पीड़ा और कष्ट से जाते हैं । पापी लोग उस पथ पर चलते समय भय- त्रस्त हो जाते, उनके वस्त्र गिर जाते, कण्ठ, ओठ और तालू सूख जाते हैं । वे दीन करुण स्वर से रोते चिल्लाते हैं । उस पथ पर चलते समय यमदूत कोड़े और शस्त्रों से मारते हैं । वे इधर उधर भागते और बड़े कष्ट से चलते हैं ॥४-६॥ उस मार्ग में कहीं तो कीचड़ है, कहीं अग्नि, कहीं जलती हुई बालुका और कहीं तीखी धार वालो शिलायें शस्त्र के रूप में सीधी खड़ी हैं । कहीं कांटेदार वृक्ष, कहीं ऐसे पहाड़ हैं जिनकी चट्टानों पर पैर रखकर चलना अत्यन्त कष्टकर है । कहीं बड़ी बड़ी गुफायें हैं जिनमें सदा अन्धकार रहता और जो कांटों से ढंकी रहती है ॥७-८॥ वहाँ ऊँची ऊँची चोटियों पर चढ़ना पड़ता तो कभी कन्दराओं में घुसना पड़ता है । कहीं छोटी-छोटी कंकड़ियाँ, ढेले, कहीं सुई के समान काँटे तो कहीं मार्ग में सेवार और बाँसों की पाँत खड़ी रहती हैं । कहीं बाघ गुर्रारि तो कहीं

१६८ नारदीयपुराणम् एवं बहुविधक्लेशाः पापिनो यांति नारद । क्रोशंतश्च रुदन्तश्च ग्लायंतश्चैव पापिनः ॥११॥ पाशेन यंत्रिताः केचित्कृष्यमाणास्तथांकुशः । शस्त्रास्त्रैस्ताड्यमानीश्च पृष्ठतो यांति पापिनः ॥१२॥ नासाग्रपाशकृष्टाश्च केचिदंत्रैश्च बंधिताः । वहंतश्चायसां भारं शिश्नाग्रेण प्रयांति वै ॥१३॥ अयोभारद्वये केचिन्नासाग्रेण तथापरे । कर्णाभ्यां च तथा केचिद्वहंतो यांति पापिनः ॥१४॥ केचिच्च स्खलिता यांति ताड्यमानास्तथापरे । अयथोच्छ्वसिताः केचित्केचिदाच्छन्नलोचनाः ॥१५॥ छायाजलविहीने तु पथि यात्यतिदुःखिताः । शोचन्तः स्वानि कर्माणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च ॥१६॥ ये तु नारद धर्मिष्ठा दानशोला सुबुद्धयः । अतीव सुखसंपन्नास्ते यांति धर्ममंदिरम् ॥१७॥ अन्नदास्तु मुनिश्रेष्ठ भुंजतः स्वादु यांति वै । नीरदा यांति सुखिनः पिबंतः क्षीरमुत्तमम् । तक्रदा दधिदाश्चैव तत्तद्भोगं लभंति वै । घृतदा मधुदाश्चैव क्षीरदाश्च द्विजोत्तम ॥१८॥ सुधापानं प्रकुर्वंतो यांति वै धर्ममंदिरम् । शाकदाः पायसं भुंजन्दीपदो ज्वलयन्दिशः ॥१९॥ वस्त्रदो मुनिशार्दूल याति दिव्याम्बरावृतः । पुराकरप्रदो याति स्तूयमानोऽमरैः पथि ॥२०॥ गोदानेन नरो याति सर्वसौख्यसमन्वितः । भूमिदो गृहदश्चैव विमाने सर्वसंपदि ॥२१॥ अप्सरोगणसंकीर्णे क्रीडन्त्याति वृवालयम् । हयदो यानदश्चापि गजदश्च द्विजोत्तम ॥२२॥ धर्मालयं विमानेन याति भोगान्वितेन वै । अनडुहो मुनिश्रेष्ठ यानारूढः प्रयाति वै ॥२३॥ फलदः पुष्पदाश्चापि याति संतोषसंयुतः । ताम्बूलदो नरो याति प्रहृष्टो धर्ममंदिरम् ॥२४॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषां कृतवान्यो नरोत्तमः । स याति परितुष्टात्मा पूज्यमानो दिविस्थतैः ॥२५॥ ज्वर का हो प्रकोप बढ़ता रहता है । नारद ! इस प्रकार पापी भाँति भाँति के क्लेश पाते हैं, वे कभी रोते कभी चिल्लाते और मलिन मुख रहते हैं । कोई पाश में बँधे रहते तो किसी को अंकुश से पकड़ कर यमदूत खींचते हैं । कोई पापी शस्त्रास्त्रों से आहत होते हुए पीठ के बल जाते हैं । किसी पापी का नासाग्र पाश में बाँधकर खींचा जाता तो कोई आन्त्र जाल अँतड़ी या रस्सी से बँधा है । कोई अपने लिंग के अग्रभाग से लोहे का भार ढो रहा है तो कोई नाक के अग्रभाग पर दोनों ओर लोहे का भार लटकाये जा रहा है तो कोई पापी कानों से ही लौह भार ढोते हुए चल रहा है । कोई मार्ग में गिर पड़ते हैं तो दूसरे पीटे जाते हैं, कितने पीड़ा के कारण हाँफ रहे हैं, तो कितने अपनी आखों को ढके हुए जा रहे हैं । उस छाया और जल से शून्य मार्ग पर अपने ज्ञान या अज्ञानवश किये हुए कर्मों पर पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर पापी चलते हैं ॥११-१६॥ नारद ! जो दानशील, धर्मिष्ठ और सज्जन हैं वे तो अत्यन्त सुखपूर्वक यम-मन्दिर को जाते हैं । मुनिश्रेष्ठ ! अन्न दान करने वाले स्वादिष्ट भोजन करते हुए और जल दान करने वाले उत्तम क्षीर पान करते हुए जाते हैं । तक्र (छाछ) और दही का दान करने वाला छाछ पीते और दही खाते जाते हैं । द्विजोत्तम ! घी, मधु और क्षीर का दान करने वाले सुधापान करते हुए यमपुरी को जाते हैं । शाक दान करने वाले खीर खाते हुए और दीप दान करने वाले अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं ॥१७-१९॥ मुनिशार्दूल ! वस्त्र दान करने वाले दिव्य वस्त्र पहनकर जाते हैं । पुर और खान का दान करने वाले व्यक्ति को देवतागण यम-पथ में स्तुति करते हुए लिवा जाते हैं ॥२०॥ गोदान करने वाला मनुष्य सब सुखों का भोग करता हुआ जाता है। भूमिदान और गृहदान करने वाला सब सुख सामग्रियों से भरे विमान पर आरूढ़ हो अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करता हुआ जाता है । द्विजोत्तम ! घोड़ा, सवारी या हाथी का दान करने वाला सब भोगों से परिपूर्ण विमान से यम-नगर को जाता है । बैल का दान करने वाला यान पर आरूढ़ होकर जाता है ॥२१-२३॥ फल और फूल का दान करने वाला सन्तोष पूर्वक उस पथ पर जाता है । तांबूल का दान करने वाला नर प्रसन्नता पूर्वक धर्ममन्दिर को जाता है ॥२४॥ जिस व्यक्ति ने माता पिता की सेवा की वह संतुष्टात्मा देवों से पूज्यमान हो यम-मन्दिर

एकविंशोऽध्यायः १६६ शुश्रूषां कुरुते यस्तु यतीनां व्रतचारिणाम् । द्विज्याग्र्यब्राह्मणानां च स यात्यति सुखान्वितः ॥२६॥ सर्वभूतदयायुक्तः पूज्यमानोऽमरैर्द्विजः । सर्वभोगान्वितेनासौ विमानेन प्रयाति च ॥२७॥ विद्यादानरतो याति पूज्यमानोऽब्जसूनुभिः । पुराणपाठको याति स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२८॥ एवं धर्मपरा यांति सुखं धर्मस्य मंदिरम् । यमश्चतुर्मुखो भूत्वा शंखचक्रगदासिभृत् ॥२९॥ पुण्यकर्मरतं सम्यक्स्नेहान्मित्रमिवार्चति । भो भो बुद्धिमतां श्रेष्ठ नरकक्लेशभीरवः ॥३०॥ युष्माभिः साधितं पुण्यमत्रामुत्रसुखावहम् । मनुष्यजन्म यः प्राप्य सुकृतं न करोति च ॥३१॥ स एव पापिनां श्रेष्ठ आत्मघातं करोति च । अनित्यं प्राप्य मानुष्यं नित्यं यस्तु न साधयेत् ॥३२॥ स याति नरकं घोरं कोऽन्यस्तस्मादचेतनः । शरीरं यातनारूपं मलाद्यैः परिदूषितम् ॥३३॥ तस्मिन्यो याति विश्वासं तं विद्यादात्मघातकम् । सर्वेषु प्राणिनः श्रेष्ठास्तेषु वै बुद्धिजीविनः ॥३४॥ बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणास्तथा । ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ॥३५॥ कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः । ब्रह्मवादिष्वपि तथा श्रेष्ठो निर्मम उच्यते ॥३६॥ एतेभ्योऽपि परो ज्ञेयो नित्यं ध्यानपरायणः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥३७॥ सर्वत्र पूज्यते जंतुर्धर्मवान्नात्र संशयः । गच्छ स्वपुण्यैर्मत्स्थानं सर्वभोगसमन्वितम् ॥३८॥ अस्ति चेद्दुष्कृतं किंचित्पश्चादत्रैव भोक्ष्यसे । एवं यमस्तमभ्यर्च्य प्रापयित्वा च सद्गतिम् ॥३९॥ आहूय पापिनश्चैव कालदंडेन तर्जयेत् । प्रलयांबुदनिर्घोषो ह्यंजनाद्रिसमप्रभः ॥४०॥ को जाता है ॥२५॥ जो व्रती यतियों और उत्तम ब्राह्मणों की शुश्रूषा करता है, वह अत्यन्त सुखपूर्वक जाता है ॥२६॥ जो द्विज सब प्राणियों पर दया दृष्टि रखता है वह देवों से पूजित हो सब सुख सामग्रियों से पूर्ण विमान पर आरूढ़ होकर जाता है ॥२७॥ विद्या दान करने वाला व्यक्ति ब्रह्मा से पूज्यमान होकर जाता है, पुराण का पाठ करने वाला व्यक्ति जब चलता है तो मुनीश्वर उसकी स्तुति करते चलते हैं ॥२८॥ इस प्रकार धार्मिक जन सुखपूर्वक धर्म मन्दिर को जाते हैं । वहाँ यमराज चतुर्मुख का रूप धारण कर हाथ में शंख, चक्र, गदा और तलवार लेकर पुण्यकर्मों में रुचि रखने वाले उन महापुरुषों की भली-भाँति प्रेम पूर्वक मित्र के समान सम्मान करते हैं । वे कहते हैं कि हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! तुम लोग नरक के भय से पुण्य कर्मों को किया है इसीलिए वे कर्म दोनों लोकों के लिए सुखदायक सिद्ध हुए ॥२९-३०॥ जो मानव जन्म पाकर भी शुभ कर्म नहीं करता है वही महान् पापी है, वह आत्म-हनन करता है । जो इस अनित्य मानुष योनि को पाकर नित्य तत्त्व (धर्म), की साधना नहीं करता वह घोर नरक में जाता हैं । उससे बढ़कर चेतनाहीन कौन हो सकता है ? ॥३१-३२॥ यह शरीर यातना की मूर्ति है, मल आदि से दूषित है ऐसे शरीर पर जो विश्वास करता अर्थात् इसको नित्य और सुख का साधन समझता है उसको आत्मघातक समझना चाहिए । सारी सृष्टि में प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ है, बुद्धिजीवियों (चेतन) में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में ब्राह्मण, ब्राह्मणों में विद्वान् और विद्वानों में कृतबुद्धि (विवेकी), कृत बुद्धियों में कर्त्ता और कर्त्ताओं (कर्मपरायणों) में ब्रह्मवादी और ब्रह्मवादियों में निर्मम व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है ॥३३-३६॥ इनसे भी नित्य धर्मपरायण व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है । इसलिए सब प्रकार से धर्म संग्रह करना चाहिए। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि धर्मवान् व्यक्ति सर्वत्र पूजित होता है । इसलिए अपने पुण्य से उपार्जित मेरे पुण्य स्थान पर जाओ, जहाँ सारे ऐश्वर्य भरे पड़े हैं ॥३७-३८॥ यदि कोई दुष्कृत होगा तो उसको भी पुण्य भोग के अनन्तर यहीं भोगना पड़ेगा । इस प्रकार पुण्यात्माओं की पूजाकर उनको सब गति दे देने के पश्चात महाराज यम पापियों को बुलाकर अपने कालदण्ड से तर्जन करते हैं । उस समय यम प्रलय कालीन मेघ के समान गर्जन करने लगते हैं । उनका आकार अंजन (नील) गिरि के

२०० नारदीयपुराणम् नारद उवाच विद्युत्प्रभायुधैर्भीमो द्वात्रिंशद्भुजसंयुतः । योजनत्रयविस्तारो रक्ताक्षो दीर्घनासिकः ॥४१॥ दंष्ट्राकरालवदनो वापीतुल्यांगलोचनः । मृत्युज्वरादिभिर्मुख्यैश्चित्रगुप्तोऽपि भीषणः ॥४२॥ सर्वे दूताश्च गर्जंति यमतुल्यविभीषणाः । ततो ब्रवीति तान्सर्वांकंपमानांश्च पापिनः ॥४३॥ शोचन्तः स्वानि कर्माणि चित्रगुप्तो यमाज्ञया । भो भो पापा दुराचारा अहङ्कारप्रदूषिताः ॥४४॥ किमर्थमर्जितं पापं ह्युष्माभिरविवेकिभिः । कामक्रोधादिदृप्तेन मदेन तु चेतसा ॥४५॥ यद्यत्पापतरं तत्किमर्थं अर्जितं जनाः । कुर्वन्तः पुनः यूयं पापाख्यं च बहुविधाः ॥४६॥ तथैव यातना भोग्याः किं वृथा ह्यतिदुःखिताः । भृत्यमित्रकलत्रार्थं दुष्कृतं चरितं यथा ॥४७॥ तथा कर्मवशात्प्राप्ता यूयमत्रातिदुःखिताः । युष्माभिः पोषिता ये तु पुत्राद्या अन्यतो गताः ॥४८॥ युष्माकमेव तत्पापं प्राप्तं किं दुःखकारणम् । यथा कृतानि पापानि युष्माभिः सुखहनि वै ॥४९॥ तथा प्राप्तानि दुःखानि किमर्थमिह दुःखिताः । विचारयध्वं यूयं तु युष्माभिश्चार्जितं पुरा ॥५०॥ यमः करिष्यते दंडमिति किं न विचारितम् । दरिद्रेऽपि च मूर्खे न पंडिते वा धियान्विते ॥५१॥ कांदिशीके च वीरे च समवर्ती यमः स्मृतः । चित्रगुप्तेरितं वाक्यं श्रुत्वा ते पापिनस्तदा ॥५२॥ शोचंतः स्वानि कर्माणि तूष्णीं तिष्ठंति भीषिताः । यमाज्ञाकारिणः क्रूराश्चंडा दूता भयानकाः ॥५३॥ चंडालाद्याः प्रसङ्ग्यातान्रौरवेषु क्षिपंति च । स्वदुष्कर्मफलं ते तु भुक्त्वांते पापशेषतः ॥५४॥ महीतलं च संप्राप्य भवंति स्थावरादयः । भगवन्संशयो जातो मच्चेतसि दयानिधे ॥५५॥ समान हो जाता है। अपनी बत्तीस भुजाओं में विद्युत् के समान चमकने वाले अस्त्रों को धारण करने से महा भयंकर जान पड़ते हैं। उनकी काया तीन योजन विस्तृत सी जान पड़ती है। उनकी लाल-लाल आँखे, बड़ी लंबी नाक, भयानक दाढ़ी वाला भयानक मुख और बावली के समान आंखें बड़ी ही भयंकर जान पड़ती है। मृत्यु-ज्वर और घातक रोगों और भीषण आकृति वाले लिपिक चित्रगुप्त के साथ वो और डरावने हो जाते हैं ॥४१-४२॥ यम के समान भयंकर सब यमदूत घोर गर्जन करने लगते हैं इसके अनन्तर यम का आदेश पाकर चित्रगुप्त अपने पाप कर्मों पर अनुताप करने वाले उन पापियों से, जो भय से कांपते रहते हैं, कहता है कि— अरे पापियो! दुराचारियो! अहंकार में पड़कर तुम अविवेकियों ने क्यों पाप किया? काम, क्रोध आदि के वश में होकर गर्वोन्मत्त तुम पापियों ने पापकर्म क्यों किये? अत्यन्त प्रसन्न हो-हो कर तुम लोगों ने जैसे बहुत से पाप किये हैं वैसी ही यातनायें तुमको भोगनी पड़ेंगी। अब क्यों व्यर्थ दुःखी हो रहे हो? ॥४३-४६॥ जिस प्रकार सेवक, मित्र और स्त्री के लिए तुम लोगों ने दुष्कर्म किए हैं, उसी प्रकार कर्मवश वहां दुःख भोगने के लिए आये हुए हो देखो, जिन पुत्र आदि को तुम लोगों ने पालन किया वे तो तुम्हें छोड़कर चले गए। अब उन पापों को तुम लोगों को ही भोगना है। इसमें दुःख करने की क्या आवश्यकता है ॥४७-४८½॥ तुम लोगों ने जैसे अत्यन्त घोर पापों को किया है वैसे ही दुःख अब प्राप्त हुए हैं, तो अब यहां दुःखी क्यों हो रहे हो? विचारो तो सही, पहले जिस समय पाप कर्म किये उस समय 'यम इसका दंड अवश्य देगें' इसका विचार क्या नहीं किया? यम दरिद्र, मूर्ख, पंडित, धनी, भय-भीत कायर और वीर सबके प्रति समान न्याय करते हैं ॥४९-५१½॥ उस समय चित्र गुप्त की उन बातों को सुनकर के पापी अपने पाप-कर्मों पर अनुताप करते हुए भयभीत हो चुप चाप बैठे रहते हैं ॥५२½॥ यम के आज्ञापालक, क्रूर, भयानक चण्ड, चाण्डाल आदि दूत उन पापियों को पकड़कर बलात् नरक कुण्डों में फेंक देते हैं। वहाँ अपने पापों को वे भलीभांति भोगते और कुछ शेष रह जाने पर इस भूतल पर आकर स्थावर आदि योनियों में जन्म लेते हैं ॥५३-५४½॥

एकोनत्रिंशोऽध्यायः २०१ नारद उवाच त्वं समर्थोऽसि तच्छेत्तुं यतो नो ह्यग्रजो भवान् । धर्माश्च विविधाः प्रोक्ताः पापान्यापि बहूनि च ॥५६॥ चिरभोज्यं फलं तेषामुक्तं बहुविदा त्वया । दिनांते ब्रह्मणः प्रोक्तो नाशो लोकत्रयस्य वै ॥५७॥ परार्द्धद्वितयांते तु ब्रह्माण्डस्यापि संक्षयः । ग्रामदानादिपुण्यानां त्वयैव विधिनंदन ॥५८॥ कल्पकोटिसहस्रेषु महांन्भोग उदाहृतः । सर्वेषामेव लोकानां विनाशः प्राकृते लये ॥५६॥ एकः शिष्यत एवेति त्वया प्रोक्तं जनार्दनः । एष मे संशयो जातस्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति ॥६०॥ पुण्यपापोपभोगानां समाप्तिर्नास्य संप्लवे । सनक उवाच ॥६१॥ साधु साधु महाप्राज्ञ गुह्याद्गुह्यतमं त्विदम् पृष्टं तत्तेऽभिधास्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । नारायणोऽक्षरोऽनंतः परं ज्योतिः सनातनः ॥६२॥ विशुद्धो निर्गुणो नित्यो मायामोहविवर्जितः । निर्गुणोऽपि परानन्दो गुणवानिव भाति यः ॥६३॥ ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैस्तु भेदवानिव लक्ष्यते । गुणोपाधिकभेदेषु त्रिष्वेतेषु सनातन ॥६४॥ संयोज्य मायामखिलं जगत्कार्यं करोति च । ब्रह्मारूपेण सृजति विष्णुरूपेण पाति च ॥६५॥ अंते च रुद्ररूपेण सर्वमत्तीति निश्चितम् । प्रलयांते समुत्थाय ब्रह्मारूपी जनार्दनः ॥६६॥ चराचरात्मकं विश्वं यथापूर्वमकल्पयत् । स्थावराद्याश्च विप्रेन्द्र यत्र यत्र व्यवस्थिता ॥६७॥ ब्रह्मा तत्तज्जगत्सर्वं यथापूर्वं करोति वै । तस्मात्कृतानां पापानां पुण्यानां चैव सत्तम् ॥६८॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मणां ह्यक्षयं फलम् । नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥६६॥ नारद ने कहा—भगवन् ! दयानिधे ! मेरे मन में सन्देह हो रहा है । आप ही उसको दूर करने में समर्थ हैं, क्योंकि आप हमारे अग्रज हैं । बहुज्ञ आपने बहुविध धर्म, बहुत से पाप और उनके चिर काल तक भोगने के योग्य फलों को कहा और यह भी बताया कि ब्रह्मा के दिन के अन्त में तीनों लोकों का नाश हो जाता है ॥५५-५७॥ दो परार्द्ध के बीत जाने पर ब्रह्माण्ड का भी नाश हो जाता है । विधिनन्दन ! आपने अभी ग्राम दान आदि पुण्य कर्मों का करोड़ों कल्पों तक महान् भोग कहा, फिर यह ब्रह्मा ही शेष रह जाता है। यही मुझे सन्देह हो गया है, आप ही उसे दूर कर सकते हैं । क्या उस प्रलय में भी पाप और पुण्यों का नाश नहीं होता ? ॥५८-६०॥ सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो । यह तो अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछा, इसलिए तुमसे कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । नारायण अक्षर, अनन्त, परम ज्योति, सनातन, विशुद्ध, निर्गुण, नित्य माया-मोह से रहित और परानन्द हैं जो निर्गुण होते हुए भी सगुण से जान पड़ते हैं ॥६१-६३॥ वही सनातन ब्रह्म ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रूपों में भिन्न-भिन्न जान पड़ता है । यद्यपि इन तीनों में केवल गुण और उपाधि का ही भेद है ॥६४॥ वह माया से युक्त होकर अखिल जगत् का कार्य करता है वह ब्रह्मारूप से सृष्टि करता, विष्णुरूप से पालन करता और अन्त में रुद्र रूप से सम्पूर्ण सृष्टि को उदरस्थ कर लेता है, यह निश्चित है ॥६५॥ प्रलय काल बीत जाने पर वही ब्रह्मारूपी जनार्दन पूर्व की भाँति चराचरात्मक विश्व की रचना करता है । विप्रेन्द्र ! पूर्व सृष्टि में स्थावर आदि पदार्थ जहाँ जिस रूप में व्यवस्थित थे, तदनुरूप ही ब्रह्मा ने उन सब के साथ सारे जगत् को बनाया ॥६६-६७॥ सज्जन ! इस कारण कृत पापों और पुण्यों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है । कर्मों के फल अक्षय हैं । बिना उन कर्मों का भोग किए करोड़ों कल्पों में भी वे नष्ट नहीं होते । अपने किये शुभ-अशुभ कर्मों २६ ना० पु०

२०२ नारदीयपुराणम् अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । यो देवः सर्वलोकानामंतरात्मा जगन्मयः । सर्वकर्मफलं भुङ्क्ते परिपूर्णः सनातनः ॥७०॥ योऽसौ विश्वंभरो देवो गुणभेदव्यवस्थितः । सृजत्यवति चात्त्येतत्सर्वं सर्वभृगव्ययः ॥७१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे यमदूतकृत्यनिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः ॥३१॥ अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच एवं कर्मपाशनियंत्रित जतवः स्वर्गादिपुण्यस्थानेषु पुण्यभोगमनुभूय यातनासु चातीव दुःखतरं पापफल- मनुभूय प्रक्षीणकर्मावशेषेणामुं लोकमागत्य सर्वभयविह्वलेषु मृत्युबाधासंयुतेषु स्थावरादिषु जायन्ते । वृक्षगुल्मलतावल्लीगिरयश्च तृणानि च । स्थावराश्चेति विख्याता महामोहमसावृताः ॥१॥ स्थावरत्वे पृथिव्यामुप्तबीजानि जलसेकानुपदं सुसंस्कारसामग्रीवशादन्तरूष्मप्रपाविताक्युच्छून्तरत्वमापद्ये ततो मूलभावं तन्मूलादंकुरोत्पत्तिस्तस्मादपि पर्णकांडनालादिकं कांडेपु च प्रसवमापद्यते तेषु च पुष्पसंभवः ॥२॥ तानि पुष्पाणि कानिचिदफलानि कानिचित्फलहेतुभूतानि तेषु पुष्पेषु वृद्धभावेषु सत्सु तत्पुष्पमूलतस्तुषोत्पत्तिर्जायते तेषु तुषु भोक्तॄणां प्राणिनां संस्कारसामग्रीवशाद्धिमरश्मिकरणा- का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है । जो जगन्मय, सर्वलोकान्तरात्मा, परिपूर्ण सनातन देव है, वे सब कर्मों का फल भोग करते हैं । जो ये विश्वम्भर देव हैं, जो गुण-भेद से स्थित हैं, वे सर्वभुक् अव्यय इस सारी सृष्टि को बनाते और पालते हैं ॥६८-७१॥ श्रीनारदीयमहापुराण में यमदूतकृत्यनिरूपण नामक इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३१॥ अध्याय ३२ भवाटवी का वर्णन सनक बोले—इस प्रकार कर्म पाश में बँधा हुआ जीव स्वर्गादि पुण्य स्थानों में पुण्य भोग का अनुभव कर, यातना स्थानों में अति कष्टप्रद पाप-फलों का अनुभव करके कुछ कर्मों के शेष रह जाने पर इस लोक में आते हैं और सब प्रकार के भय से युक्त, मृत्यु बाधा से विजड़ित स्थावरादि योनियों में उत्पन्न होते हैं । वृक्ष, झुर- मुट, लता, वल्लरी, पहाड़ और तृण ये स्थावर नाम से प्रसिद्ध हैं जो महामोह से आवृत हैं ॥१॥ स्थावर की दशा में पृथ्वी में बोये गए बीज सिञ्चन के बाद अपने संस्कारवश, अन्तः उष्णता के कारण कुछ आर्द्र होकर बढ़ जाते हैं । फिर उनमें से जड़े निकलतीं, जड़ों से अंकुर, अंकुर से पत्तियाँ, डंठल और नाल आदि निकलते हैं । कांडों से प्रसव (कलियाँ) और इससे फूल निकलते हैं ॥२॥ उन फूलों में से कुछ तो फल देने में असमर्थ, कुछ फल देने के योग्य होते हैं । वे फूल जब पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं तब पुष्प मूल से तुष (रस) निकलता है उन तुषों में भोक्ता प्राणी के संस्कारवश चन्द्रमा की किरणों के संयोग से उसका ओषधि-रस तुष के भीतर मिल

द्वार्तिशोऽध्यायः २०३ सन्नतया तदोषधिरसस्तुषांतः प्रविश्य क्षीरभावं समेत्य स्वकाले तंडुलाकारतामुपगम्य प्राणिनां भोगसंस्कारवशात्संवत्सरे फलिनः स्युः ॥३॥ स्थावरत्वेऽपि बहुकालं वानरादिभिर्भुज्यमाना हि च्छेदनदवाग्निदहनशीतातपादिदुःखमनुभूय म्रियंते । ततश्च क्रिमयो भूत्वा सदादुःखबहुलाः क्षणार्द्धं जीवतं क्षणार्द्ध म्रियमाणा बलवत्प्रा- णिपीडायां निवारयितुमक्षमाः शीतवातादिक्लेशभूयिष्ठा नित्यं क्षुधाक्षुधिता मलमूत्रादिषु संचरंतो दुःखमनुभवंति ॥४॥ तत एव पशुयोनिमागत्य बलवद्वाधोद्वेजिता वृथोद्वेगभूयिष्ठाः क्षुत्क्षांता नित्यं वनचारिणो मातृष्वपि विषयातुरा वातादिक्लेशबहुलाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि तृणाशनाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि मांसामेध्याद्यदनाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि कंदमूलफलाशना दुर्बलप्राणिपीडानिरता दुःखमनुभवंति ॥५॥ अंडजत्वेऽपि वाताशनामांसा मेध्याद्यशनाश्च परपीडापरायणा नित्यं दुःखबहुला ग्राम्यपशुयोनि- मागता अपि स्वजातिवियोगभारोद्वहनपाशादिबंधनताडनहलादिधारणादिसर्वदुःखान्यनुभवंति ॥६॥ एवं बहुयोनिषु संभ्रांताः क्रमेण मानुषं जन्म प्राप्नुवंति केचिच्च पुण्यविशेषायुक्तक्रमेणापि मनुष्यजन्ममाप्नुवते ॥७॥ मनुष्यजन्मतापि च चर्मकारचंडालव्याधनापितरजककुंभकारलोहकारतंतुवायसौचिकजटिल- सिद्धधावकलेखकभृतकशासनहारिनीचमृत्यदरिद्रहीनांगाधिकांगत्वादिदुःखबहुलज्वरतापशीत- श्लेष्मगुल्मपादाक्षिशिरोगर्भपार्श्ववेदनादिदुःखमनुभवंति ॥८॥ कर क्षीर के रूप में परिणत हो जाता है । समय पाकर वह क्षीर तण्डुल के रूप में हो जाता है । इस प्रकार प्राणियों के भोग संस्कारवश वर्ष भर में फल देते हैं ॥३॥ स्थावर बन जाने पर भी बहुत समय तक वानर आदि जीव उसको खाते हैं, काटने, जलाने और शीतातप के सहने के कारण उसको दुःख सहन करना पड़ता, इस प्रकार दुःखों का अनुभव कर मर जाते हैं । तदनन्तर कृमि होकर सदा अधिक दुःखों को ही सहते, क्षणभर जीवित रहते तो क्षण भर में ही मर जाते हैं । बली प्राणियों की पीड़ा से अपने को बचाने में सर्वथा असमर्थ होकर शीत, आतप, वायु आदि से घोर कष्ट सहते हैं । नित्यप्रति भूख से व्याकुल होकर मल-मूत्र आदि में घूमते और दुःख का अनुभव करते हैं ॥४॥ पशु-योनि में जन्म लेकर प्रबल बाधाओं से उद्विग्न होकर व्यर्थोद्वेग से कष्ट पाते रहते हैं । भूख-प्यास से व्याकुल हों नित्य वन में घूमते रहते, माता के प्रति भी विषय-वासना की भावना रखते, वात आदि अनेकों क्लेश को सहते, किसी जन्म में तृण खा कर रहते तो किसी जन्म में मांस आदि अमेध्य पदार्थ खाते तो किसी जन्म में कन्द, मूल, फल खाकर ही जोते और दुर्बल प्राणियों को पीड़ा दे देकर स्वयं भी दुःख का अनुभव करते हैं ॥५॥ अंडज योनि में आने पर भी कभी वायु के सहारे जीते तो कभी मांस आदि अमेध्य भोज्य पदार्थ खाकर रहते और सदा अनेकों कष्ट सहते रहते हैं । ग्राम्य पशु योनि में जन्म लेने पर अपनी जाति से वियोग, भार-वहन, पाश- बन्धन और हल में जोतने आदि के दुःख से पीड़ित रहते हैं ॥६॥ इस प्रकार अनेक योनियों में भ्रमण करने के बाद जीव मानव जन्म प्राप्त करता है । कुछ ऐसे भी भाग्यवान् होते हैं जो अपने पुण्य-विशेष के प्रभाव से बहुत योनि में भ्रमण करने के बिना भी मानव जन्म का भोग प्राप्त करते हैं ॥७॥ मनुष्य जन्म में भी चमार, चाण्डाल, व्याधा, नाई, धोबी, कुम्हार, लोहार, सोनार, जुलाहा, दर्जी, जटिल, सिद्ध, सन्देश-वाहक, लिपिक, सेवक टहलु- आ, नीच-सेवक, हीनांग, अधिकांग, आदि होकर अत्यन्त क्लेश सहता और ज्वर, ताप, शीत, श्लेष्म, गुल्म, पाद- रोग, नेत्र और शिरोरोग, उदर और पार्श्वशूल आदि रोगों से व्यथित रहते हैं ॥८॥

२०५ नारदीयपुराण मनुष्यत्वेऽपि यदा स्त्रीपुरुषयोर्व्यवायस्तत्समये रेतो यदा जरायुं प्रविशति तदैव कर्मवशाज्जन्तुः शुक्रेण सह जरायुं प्रविश्य शुक्रशोणितकललं प्रपद्यते ॥६॥ तद्वीर्यं जीवप्रवेशात्पञ्चाहात्कललं भवति अर्द्धमासे पललमम्भवति। मासे प्रादेशमात्रत्वमापद्यते ॥१०॥ ततः प्रभृति वायुवशाच्चैतन्याभावेऽपि मातुरुदरे दुःसहतापवलेनावर्तकल स्थातुमशक्तत्वाद्विभ्रमति ॥११॥ मासे द्वितीये पूर्णे पुरुषाकारमात्रतामुपगम्य मासत्रितये पूर्णे करचरणाद्यवयवावभवमुपगम्य चतुर्थे मासेषु गतेषु सर्वावयवानां संधिभेदपरिज्ञानं पञ्चमतीतेषु नखानामितिव्यंजकता षट्स्वतीतेषु नखसंधिपरिस्फुटतामुपगम्य नाभिधुक्षणं पुष्यमाणममेध्यमूत्रसिक्ततांगं जरायुनांवंधि- तरक्तास्थिकृमिवसामज्जास्नायुकेशादिदूषिते कुत्सिते शरीरे निवासिनं स्वयमप्येवं परिदूषितदेहं मातुश्च कट्वम्ललवणात्युष्णभुक्तदह्यमानमात्मानं दृष्ट्वा देही पूर्वजन्मस्मरणात्सुखावानुभूतानुकूल- नरकदुःखानि च स्मृत्वांतर्दुःखेन च परिदह्यमानो मातुरुदहातिमूत्रादिरूक्षेण दह्यमान एवं मनसि प्रलपति ॥१२॥ अहोऽत्यंतपापोऽहंपूर्वजन्मनि भृत्यापत्यमित्रयोषिद्गृहक्षेत्रधनधान्यादिष्वत्यंतरागेण कलत्रपोषणार्थं परधनक्षेत्रादिकं पश्यतो हरणायुपायैरपहृत्य कामांधतया परस्त्रीहरणादिकमनुभूय महा- पापान्याचरंस्तैः पापै रहमेक एवंविधवरकाननुभूय पुनः स्थावरादिषु महादुःखमनुभूय संप्रति जरायुणा परिवेष्टितोऽन्तःदुःखेन बहिस्तापेन च दह्यामि ॥१३॥ मया पोषिता दाराश्च स्वकर्मवशादन्यतो गताः ॥१४॥ अहो दुःखं हि देहिनाम् ॥१५॥

मनुष्य होने पर भी जब स्त्री पुरुष का संयोग होता है और उस समय जब वीर्य जरायु में प्रवेश करता है उसी समय कर्मवश जन्तु शुक्र के साथ जरायु में जाकर शुक्र, शोणित और कलल के रूप में परिवर्तित हो जाता है। उस वीर्य में जीव के प्रवेश से पाँच दिन बाद कलल होता, आधे महीने में पलल और एक महीने में प्रादेश मात्र का पिण्ड हो जाता है ! तत्पश्चात् चेतनता के अभाव में भी वायु के कारण माता के उदर में दुःसह ताप के सहने में असमर्थ हो इधर उधर चलता रहता है ॥९-११॥ दो मास बीत जाने पर पूर्णरूप से पुरुषाकार हो जाता है। तीसरे महीने में पूर्ण रूप से हाथ, पैर आदि अंग स्पष्ट होने लगते हैं । चार मास बीत जाने पर सब अवयवों का सन्धि भेद स्फुट हो जाता है । पांच मास बाद नख निकल आते, छह मास बीतने पर नख सन्धि परिस्फुट हो- जाती और नाभि नाल से उसका पोषण होता है । अशुद्ध मूत्र आदि पदार्थों से उसका अंग ढका रहता है । जरायु से बँधा, रक्त, अस्थि, कृमि, वसा, मज्जा, स्नायु, केश आदि से दूषित उस कुत्सित शरीर में अपने को अवस्थित तथा माता के कटु, अम्ल, लवण और अत्युष्ण भोजन से जलाये जाते हुए स्वयं को देखकर वह देही पूर्व जन्म की स्मृति तथा अनुभवों और पूर्वानुभूत नरक-दुखों का स्मरण कर अन्तर्वेदना से व्यथित हो माता के मूत्र आदि रूक्ष पदार्थों से जलकर विलाप करने लगता है ॥१२॥ आह ! महापापी मैंने पूर्वजन्म में भृत्य, पुत्र, मित्र, स्त्री, घर, धन, धान्य आदि के मोह में पड़कर स्त्री-पालन के लिए दूसरे के धन क्षेत्र आदि कूटोपायों से अपहरण किया । कामान्ध हो पर-स्त्री हरण आदि महापापों को किया । दूसरों के लिए पापाचरण किया, परन्तु अकेला ही अनेकों घोर नरकों का अनुभव कर पुनः स्थावर आदि योनियों में अनेक प्रकार के कष्ट सहा । इस समय जरायु में बँधकर अन्तस्ताप और बाह्य ताप दोनों से जल रहा हूँ ॥१३॥ मेरे द्वारा पाली गई स्त्री भी अपने कर्मवश, अन्यत्र चली गई । अहो, देहधारियों के लिए केवल कष्ट ही कष्ट है ॥१४-१५॥ देह पाप

द्वांविंशोऽध्यायः २०५ देहस्तु पापात्संज्जातस्तस्मात्पापं न कारयेत् । भृत्यमित्रकलत्रार्थमप्यद्व्रव्यं हृतं मया ॥१६॥ तेन पापेन दह्यामि जरायुपरिवेष्टितः । दृष्ट्वास्यस्य वित्तं पूर्वं संतप्तोऽहमसूयया ॥१७॥ गर्भाग्निनानुदह्येयमिदानीमपि पापकृत् । कायेन मनसा वाचा परपीड़ामकारिषम् तेन पापेन दह्यामि त्वहमेकोऽतिदुःखितः ॥१८॥ एवं बहुविधं गर्भस्थो जंतुर्विलप्य स्वयमेव वा ॥१९॥ आत्मानमाश्वास्य उत्पत्तेरनंतरं सत्संगेन विष्णोश्चरितश्रवणेन च विशुद्धमना भूत्वा सत्कर्माणि निर्वर्त्य अखिलजगदंतरात्मनः सत्यज्ञानानंदमयस्य स्वशक्त्याद्यनुष्ठितविविधप्रपंचस्य लक्ष्मी- पतेर्नारायणस्य सकलसुरासुरयक्षगंधर्वराक्षसपन्नगमुनिकिन्नरसमूहार्थितचरणकमलयुगं भक्तितः समभ्यर्च्य दुःसह संसारच्छेदस्य कारणभूतं वेदरहस्योपनिषद्भिः परिस्कृतं सकललोकपरायणं हृदि निधाय दुःखतरमिमं संसारागारमतिक्रमिष्यामीति मनसि भावयति ॥२०॥ यतस्तन्मातुः प्रसूतिसमये सति गर्भस्थो देही नारदमुने वायुनापीडितो मातुश्चापि दुःखं कुर्वन्कर्मपाशेन बलाद्योनिमार्गान्निष्क्रामन्सकल्यातनाभोगमेककालभवमनुभवति ॥२१॥ तेनातिवलेशेन योनियंत्रपीडितो गर्भान्निष्क्रांतो निःसंज्ञतां याति ॥२२॥ तं तु बाह्यवायुः समुज्जीवयति । बाह्यवायुस्पर्शसमनंतरमेव नष्टस्मृतिपूर्वानु- भूताखिलदुःखानि वर्त्तमानान्यपि ज्ञानाभावादविज्ञायात्यंतदुःखमनुभवति ॥२३॥ एवं बालत्वमापन्नो जंतुस्तत्रापि स्वमलमूत्रलिप्तदेह आध्यात्मिक दिपीड्यमानोऽपि वक्तुमशक्तः क्षुत्तृषपीडितो रुदिते सति स्तनादिकं देयमिति मन्वानाः प्रयतन्ते ॥२४॥ के कारण ही प्राप्त होती है, इसलिए पाप नहीं करना चाहिए। सेवक, मित्र और स्त्री के लिए दूसरों का धन लूटा। उसी पाप से आज जरायु में बँधकर भस्म हो रहा हूँ। दूसरे के धन को देखकर ईर्ष्यावश जलता रहा उसी पाप के कारण पापी मैं इस समय भी गर्भाग्नि से जल रहा हूँ। शरीर, मन और वचन से दूसरे को पीड़ित करता रहा । उस पाप से आज अकेला दुःखी होकर जल रहा हूँ ॥१६-१८॥ इस प्रकार गर्भस्थ जीव विलाप कर स्वयं अपने द्वारा अपने को आश्वासन देने लगता है कि मैं उत्पन्न होने के बाद सत्संग के द्वारा शुद्धचित्त होकर सत्कर्म करूँगा। अखिल जगदन्तरात्मा, सत्यज्ञानानन्दमय स्वशक्ति के प्रभाव से स्वर्ग लोक को प्रतिष्ठित करने वाले लक्ष्मीपति नारायण के उन युगल चरणारविन्दों की जिनकी सब सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, मुनि और किन्नरवर्ग पूजा करते हैं, भक्तिपूर्वक पूजा करूँगा। और वेद, रहस्य साधना तथा उपनिषदों से परिस्कृत सकल लोकों के एक मात्र परम आधार भगवान् का हृदय में ध्यान कर इस दुःखमय संसार के बन्धन से अपने को मुक्त करूँगा। इस प्रकार वह अपने मन में भावना करता है ॥१९-२०॥ नारदमुनि ! यतः जन्म समय वह गर्भस्थ देही स्वयं वायु से पीड़ित होता माता को भी पीड़ा पहुँचाता, कर्मपाश से बँधा वह बलात् योनिमार्ग से निकलते समय सब प्रकार की यात- नाओं के भोग का अनुभव उसी समय करता है ॥२१॥ अतः योनि-यन्त्र से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण गर्भ से निकलते ही अचेत हो जाता है। इस दशा में उसको बाहर की वायु द्वारा चेतना प्राप्त होती है । बाह्य वायु के स्पर्श करते ही पूर्व जन्म की स्मृति नष्ट हो जाती है। उस समय पूर्व जन्म के अनुभूत दुःख संस्कार रूप में वर्त्तमान रहते हैं। तो भी ज्ञानशून्य होने से उसको भूलकर वह जीव स्वयं दुःख का अनुभव करता है ॥२२-२३॥ इस प्रकार जीव बालक बन कर अपने मलमूत्र में लिपटा रहता है। उसको मानसिक पीड़ा होती रहती है, परन्तु कुछ कह नहीं सकता है। क्षुत्पिपासा से पीड़ित होकर जब रोने लगता है तब माता 'स्तन पान कराना चाहिए', ऐसा सोचकर स्तनपान कराती है ॥२४॥

२०६ नारदीयपुराणम् एवमनेकं देहभोगमन्वाधीनतयानुभूयमानो दंशादिष्वपि निवारयितुमशक्तः ॥२५॥ बाल्यभावमसाद्य मातापित्रोरुपाध्यायस्यां ताडनं सदा पर्यटनशीलत्वं पांशुभस्मपंमादिषु क्रीडनं सदा कलहप्रियतदामशुचित्वं अशुच्याचाराभासकार्यनियतत्वं तदसंभव आधिप्रात्मिकदुः- खमेवंविधमनुभवति ॥२६॥ ततस्तु तरुणभावेन धनार्जनमर्जितस्य रक्षणं तस्य नाशव्ययादिषु चात्यंतदुःखिता मायया मोहिताः कामक्रोधादिदुष्टमनसः सदास्र्यापरायणाः परस्वपरस्त्रीहरणोपायपरायणाः पुत्रमित्रकलत्रादि- भरणोपायचिंतापरायणा वृथाहंकारदूषिताः पुत्रादिषु व्याध्यादिपीडितेषु सत्सु सर्वव्याप्तिं परित्यज्य रोगादिभिः क्लेशितांनां समीपे स्वयमाध्यात्मिकदुःखेन परिप्लुता वक्ष्यमाणप्रकारेण चिंतामनुभवते ॥२७॥ गृहक्षेत्रादिकं कर्म किंचिन्नापि विचारितम् । समृद्धस्य कुटुम्बस्य कथं भवति वर्त्तनम् ॥२८॥ मम मूलधनं नास्ति वृष्टिश्चापि न वर्धति । अश्वः पलायितः कुत्र गावः किं नागता मम ॥२९॥ वालापत्या च मे भार्या व्याधितोऽहं च निर्धनः । अविचारात्कृषिर्नष्टा पुत्रा नित्यं रुदंति च ॥३०॥ भग्नं छिन्नं तु मे सद्म बांधवा अपि दूरगाः । न लभ्यते वर्त्तनं च राजबाधातिदुःसहा ॥३१॥ रिपवो मां प्रधावंते कथं जेष्याम्यहं रिपून् । व्यवसायाक्षमश्वाहं प्राप्ताः प्राघूर्णका अमी ॥३२॥

इस भाँति वह बालक परवश होने के कारण अनेक शारीरिक भोगों को भोगता है, मच्छर आदि उसको काटते हैं, परन्तु वह हटा नहीं पाता है। धीरे-धीरे जब वह किशोरावस्था को प्राप्त होता है तब माता, पिता और उपाध्याय की डाँट-फटकार और ताड़ना प्रारम्भ होती है, वह सदा इधर-उधर घूमता रहता, धूल राख और कीचड़ से खेलने लगता, प्रति दिन लड़ता-झगड़ता और अनेकों अशिष्ट व्यवहारों तथा अशुचि कार्यों में ही लगा रहता है। जब इन कार्यों में किसी प्रकार की बाधा पहुँचती तब उसको मानसिक कष्ट का अनुभव होने लगता है। २५-२६॥ किशोरावस्था बीत जाने के बाद जब वह तरुण हो जाता है तब वह जीव धन कमाने लगता। अर्जित धन को रक्षा, उसके नाश और व्यय को चिन्ता से अधिक दुःखी रहता है। मायामोहित, उस जीव का मन काम- क्रोध आदि से दूषित हो जाता है। सर्वदा असूया-परायण होकर परद्रव्य परस्त्री के हरण की युक्ति ही सोचा करता है। पुत्र, मित्र, कलत्र आदि के भरण-पोषण की चिन्ता में तल्लीन होकर व्यर्थ के अहंकार से उसका मन दूषित हो जाता है। पुत्र आदि के रोग-ग्रस्त होने पर वह सारी क्रियाओं को छोड़कर रोगादि से पीड़ित स्वजनों के समीप रहता और स्वयं मानसिक दुःख से दुःखी होकर अनेकों प्रकार को चिन्ताओं से चिन्तित हो जाता है ॥२७॥ सोचता है कि घर, खेती बारी आदि की ओर मैंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया, इतने बड़े कुटुंब का भरण-पोषण कैसे होगा ? मेरे पास मूलधन भी नहीं है। वर्षा भी नहीं हो रही है। घोड़ा कहाँ भाग गया ? मेरी गायें अबतक नहीं आईं। मेरी भार्या की गोद में छोटा-सा बच्चा है, व्याधि पीड़ित मैं निर्धन हो गया । मेरे अविचार के कारण कृषि भी नष्ट हो गई। पुत्र सर्वदा रोते रहते हैं ॥२८-३०॥ घर भी गिर गया, टूट गया, बन्धु भी दूर हैं। कोई जीविका का साधन भी प्राप्त नहीं है। ऊपर से अति दुःसह राजा का शुल्क संबन्धी भय है ॥३१॥ शत्रु चारों ओर से चढ़े भा रहे हैं। कैसे शत्रुओं को वश में कर सकूँगा ? कोई व्यवसाय करने की भी क्षमता नहीं है । इतने अतिथि भी आ गए ॥३२॥ इस प्रकार अत्यन्त चिन्ताकुल हो अपने-अपने दुःखों

द्वात्रिंशोऽध्यायः २०७ एवमत्यंतचिन्ताकुलः स्वदुःखानि निवारयितुमक्षमो धिग्विधिं भाग्यहीनं मां किमर्थं विदधे इति दैवमाक्षिपति ॥३३॥ तथा वृद्धत्वमापन्नो हीयमान सारो जरापलितादिव्याप्तदेहो व्याधिबाध्यत्वादिकमापन्नः । प्रकंपमानावयवश्वासकासादिपीडितो लोलाविललोचनः श्लेष्मव्याप्तकंठः पुत्रदारादिभिर्भत्स्यमानः कदा मरणमुपयामीति चिंताकुलो मयि मृते सति मदजितं गृहक्षेत्रादिकं वस्तु पुत्रादयः कथं रक्षंति कस्य वा भविष्यति ॥३४॥ नद्धने परैरपहृते पुत्रादीनां कथं वर्त्तनं भविष्यतीति ममतादुःखपरिलुतो गाढं निःश्वस्य स्वेन वयसा कृतानि कर्माणि पुनः पुनः स्मरन् क्षणे विस्मरति च संततस्तत्त्वासन्नमरणो ॥३५॥ व्याधिपीडितोऽन्तस्तापार्तः क्षणं शय्यायां क्षणं मंचे च ततस्ततः पर्यटन् क्षुत्तृट्परीपीडितः किंचित्मात्रमुदकं देहीत्यतिकार्पण्येन याचमानस्तत्रापि ज्वराविष्ठानामुदकं न श्रेयस्करमिति ब्रुवतां मनसातिद्वेषं कुर्वन्मन्दचैतन्यो भवति ॥३६॥ ततश्च हस्तपादाकर्षणे न तु क्षमो रुदद्भिर्बाधवजनैर्वेष्टितो वक्तुमक्षमः स्वार्जितधनादिकं कस्य भविष्यतीति चिंतापरो बाष्पाविलविलोचनः कंठे घुरघुरायमाणे सति शरीराान्निष्क्रांतप्राणो यमदूतैर्भत्स्येमानः पाशंयंत्रितो नरकादीन्पूर्ववदश्नुते ॥३७॥ आमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धान्यंति धातवः । तथैव जीविनः सर्व आकर्मप्रक्षयाद् भृशम् ॥३८॥ को दूर करने में अपने को असमर्थ पाकर 'विधाता को धिक्कार है, क्यों मुझ भाग्यहीन का अन्त नहीं कर देता' आदि कह कर भाग्य को ही दोष देता है ॥३३॥ फिर जब वह बूढ़ा हो जाता है, केश झड़ जाते, बुढ़ापा और रोग से शरीर व्याप्त हो जाता तब व्याधियों और कष्टों से घिर जाता है। उसके शरीर में कंपकंपी होने लगती है । श्वास-कास आदि रोगों से पीड़ित हो जाता । गले में कफ की अधिकता हो जाती और उसकी आँखें मन्द तथा चंचल हो जाती हैं । पुत्र, स्त्री आदि जब उसको झिड़कने लगते तब यही सोचता है कि कब मेरी मृत्यु होगी । परन्तु फिर यह सोचने लगता कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे घर, खेत आदि की रक्षा मेरे पुत्र कैसे करेंगे ? अथवा कौन इसको प्राप्त करेगा ? ॥३४॥ दूसरे जब मेरी सम्पत्ति को चुरा लेंगे तब पुत्रादि का निर्वाह कैसे होगा ? इस प्रकार मोह और दुःख से व्याकुल होकर आहें भरने लगता और अपने जीवन में किये गए कर्मों का बार-बार स्मरण कर क्षण भर में ही अपने को भूल जाता है । जब मृत्यु निकट आती तब व्याधि-पीड़ित और अन्तस्ताप तथा वेदना से आर्त होकर क्षणभर शय्या पर तो क्षण भर मंच पर लुढ़कता है । इधर-उधर घूमता हुआ जब भूख-प्यास से पीड़ित हो जाता तब 'अरे ! थोड़ा जल दो' यह कह कर बड़ी दीनता से जल माँगने लगता है । उस समय जब उसके कुटुम्बी'ज्वराक्रान्त व्यक्ति के लिए जल लाभदायक नहीं होता' यह कहते हैं तब तो वह मन ही मन उन पर ईर्ष्या करने लगता और अचेत हो जाता है ॥३५-३६॥ तदनन्तर उसमें हाथ पैर हिलाने की शक्ति नहीं रह जाती, रोते हुए बन्धुओं से घिरा वह स्वयं कुछ कहने में असमर्थ हो जाता है । उसकी स्वार्जित सम्पत्ति किसके अधिकार में जायगी, इसकी चिन्ता से उसकी आँखें आँसू से भर जाती हैं । धीरे- धीरे कण्ठ से घर्र-घर्र की ध्वनि होने लगती और उसके प्राण शरीर से निकल जाते हैं । मृत्यु के अनन्तर यमदूतों की झिड़कियाँ सहता हुआ, यमपाश में बँधकर पूर्व की भाँति नरकों का भोग करता है ॥३७॥ जिस प्रकार धातुएँ तब तक जलती रहती हैं जब तक उनका दोष क्षय नहीं हो जाता उसी प्रकार सभी जीव कर्मक्षय होने तक अत्यन्त दारुण भोग भोगते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! इसलिए संसार रूपी दावानल से

२०८ नारदीयपुराणम् तस्मात्संसारदावाग्नितापात द्विजसत्तम । अभ्यसेत्परमं ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३६॥ ज्ञानशून्या नरा ये तु पशवः परिकीर्तिताः । तस्मात्संसारमोक्षाय परं ज्ञानं समभ्यसेत् ॥४०॥ मानुष्यं चैव संप्राप्य सर्वकर्मप्रसाधकम् । हरिं न सेवते यस्तु कोऽन्यस्तस्मादचेतनः ॥४१॥ अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रं मनीश्वराः । आस्थिते कामदे विष्णौ नरा यांति हि यातनाम् ॥४२॥ नारायणे जगन्नाथे सर्वकामफलप्रदे । स्थितेऽपि ज्ञानरहिताः पच्यंते नरकेष्वहो ॥४३॥ स्रवन्मूत्रपुरीषे तु शरीरेऽस्मिन्नशाश्वते । शाश्वतं भावयन्त्यज्ञा महामोहसमावृताः ॥४४॥ कुत्सितं मांसरक्ताद्यैर्देहं संप्राप्य यो नरः । संसारच्छेदकं विष्णुं न भजेत्सोऽतिपातकी ॥४५॥ अहो कष्टमहो कष्टमहो कष्टं हि मूर्खता । हरिध्यानपरो विप्र चाण्डालोऽपि महासुखी ॥४६॥ स्वदेहान्निस्सृतं दृष्ट्वा मलमूत्रादिकं त्विमम् । उद्वेगं मानवा मूर्खाः किं न यांति हि पापिनः ॥४७॥ दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि । तल्लब्ध्वा परलोकाय यत्नं कुर्याद्विचक्षणः ॥४८॥ अध्यात्मज्ञानसम्पन्ना हरिपूजापरायणाः । लभन्ते परमं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥४९॥ यतो जातमिदं विश्वं यतश्चैतन्यमश्नुते । यस्मिंश्च विलयं याति स संसारस्य मोचकः ॥५०॥ निर्गुणोऽपि परोऽनंतो गुणवानिव भाति यः । तं समभ्यर्च्य देवेशं संसारात्परिमुच्यते ॥५१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे भवाटवीनिरूपणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३२॥


सन्तप्त प्राणी परम ज्ञान का अभ्यास करे, ज्ञान से ही वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है ॥३८-३९॥ जो ज्ञान- शून्य मनुष्य हैं वे पशु कहे गए हैं, इसलिए संसार से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए ॥४०॥ जो सब कर्मों का आधार भूत मानव-जीवन पाकर भा हरि की सेवा नहीं करता, उससे बढ़कर चेतनाहीन कौन होगा ? मुनीश्वरवृन्द ! यह आश्चर्य है कि मनोरथदाता विष्णु के रहते हुए भी अज्ञानी नर यातना पाते हैं ॥४१॥ अहो ! सब मनोरथों के देने वाले जगत्पति नारायण के रहने पर भी ज्ञानहीन मूढ़ नरक में पाप भोगते हैं ॥४२॥ अज्ञ मनुष्य महामोह में फँसकर इस मलमूत्र से भरे अनित्य शरीर को ही नित्य समझते हैं ॥४३॥ जो मनुष्य मांस, रक्त आदि से युक्त इस कुत्सित शरीर को पाकर संसार से उद्धार करने वाले विष्णु का भजन नहीं करता वह महापापी है ॥४४॥ विप्र ! सर्वदा हरि की उपासना करने वाला चाण्डाल भी महासुखी है । कष्ट है, कष्ट है, महाकष्ट है इस प्रकार चिल्लाना मूर्खता है ॥४५॥ आश्चर्य है कि मूर्ख पापी मानव शरीर से निकलते हुए मल-मूत्रादि अशुद्ध पदार्थों को देखकर भी इसको अशुचि समझकर घृणा क्यों नहीं करता ? ॥४६॥ देवता भी दुर्लभ मानव-जीवन प्राप्त करने की प्रार्थना किया करते हैं । इसलिए ऐसे दुर्लभ मानुष जन्म को पाकर बुद्धिमान् व्यक्ति अवश्य परलोक सुधारने का प्रयत्न करे ॥४७॥ अध्यात्म-ज्ञान-सम्पन्न और हरिपूजापरायण व्यक्ति उस परम स्थान को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरागमन नहीं होता ॥४८॥ जिससे यह सारा विश्व उत्पन्न हुआ, जिससे यह चैतन्य प्राप्त करता और जिसमें लय हो जाता है वही संसार का उद्धारकर्त्ता है ॥४६॥ जो अनन्तनिर्गुण होता हुआ भी सगुण के समान जान पड़ता है उस देवेश की पूजा करने से ही संसार से मुक्ति प्राप्त होती है ॥५०॥ श्री नारदीय महापुराण में भवाटवी निरूपण नामक बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२॥

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः नारद उवाच भगवन्त्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टं विदुषा त्वया । संसारपाशबद्धानां दुःखानि सुबहूनि च ॥१॥ अस्य संसारपाशस्य च्छेदकः कतमः स्मृतः । येनोपायेन मोक्षः स्यात्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥२॥ प्राणिभिः कर्मजालानि क्रियंते प्रत्यहं भृशम् । भुज्यंते च मुनिश्रेष्ठ तेषां नाशः कथं भवेत् ॥३॥ कर्मणा देहमाप्नोति देही कामेन बध्यते । कामाल्लोभाभिभूतः स्याल्लोभात्क्रोधपरायणः ॥४॥ क्रोधाच्च धर्मनाशः स्याद्धर्मनाशान्मतिभ्रमः । प्रनष्टबुद्धिर्मनुजः पुनः पापं करोति च ॥५॥ तस्माद्देहं पापमूलं पापकर्मरतं तथा । यथा देहभ्रमं त्यक्त्वा मोक्षभाक्स्यात्तथा वद ॥६॥ सनक उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ मतिस्ते विमलोर्जिता । यस्मात्संसारदुःखान्नो मोक्षोपायमभीप्ससि ॥७॥ यस्याज्ञया जगत्सर्वं ब्रह्मा सृजति सुव्रत । हरिश्च पालको रुद्रो नाशकः स हि मोक्षदः ॥८॥ अहमादिविशेषांता जाता यस्य प्रभावतः । तं विद्यान्मोक्षदं विष्णुं नारायणमनामयम् ॥९॥ यस्याभिन्नमिदं सर्वं यच्चेंगति च नेंगति । तमुग्रमजरं देवं ध्यात्वा दुःखात्प्रमुच्यते ॥१०॥ अध्याय ३३ योग-निरूपण नारद बोले—भगवन् ! महाज्ञानो आप से जो कुछ पूछा गया उसको आपने कह दिया । इस संसार- पाश में बंधे प्राणियों को अनेक दुःख हैं ॥१॥ तपोधन ! इस संसार-पाश को छिन्न करने वाला कौन है ? और जिस उपाय से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है उसको मुझसे कहिए ॥२॥ समस्त प्राणी सदा कर्म करते रहते हैं और उसका भोग भी करते हैं, परन्तु मुनिश्रेष्ठ ! उन कर्मों का नाश कैसे होता है, इसको कृपा कर बतलाइए ॥३॥ कर्म से ही देह प्राप्त होती है और देही इच्छाओं से बंध जाता है, काम से वह लोभाभिभूत हो जाता है, लोभ से क्रोधी स्वभाव का होना स्वाभाविक है । क्रोध से धर्मनाश होता और धर्मनाश से बुद्धि-भ्रम हो जाता है । नष्ट-बुद्धि मनुष्य बार-बार पाप करता है । सारांश यह है कि यह देह पाप मूल है और देही सदा पापकर्मों में लीन रहता है । इसलिए जिस प्रकार मनुष्य शरीर-भ्रम को छोड़कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है उस उपाय को बतलाइए ॥४-६॥ सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो, तुमने अत्यंत विमल बुद्धि पाई है, क्योंकि इसीलिए तुम सांसारिक दुःख से मुक्ति पाने के उपाय की ही इच्छा करते हो ॥७॥ व्रती ! जिसकी आज्ञा से ब्रह्मा समस्त विश्व की सृष्टि करते, विष्णु पालन करते और रुद्र संहार करते हैं, वही मोक्षदाता हैं ॥८॥ अहम् आदि तत्त्व से लेकर विशेष पर्यन्त सारे पदार्थ जिससे उत्पन्न हुए हैं उसी अनामय, विष्णु नारायण को मोक्षदाता सम- झना चाहिए ॥९॥ जिससे यह संसार भिन्न नहीं अर्थात् जो विश्व रूप है, जो स्वयं सचेष्ट और निश्चेष्ट (अकाम-सकाम) दोनों हैं उसी उग्र अजर देव का ध्यानकर मानव दुःखों से मुक्ति पाता है ॥१०॥ उस अविकार २७—ना० पु०

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिपि में दिया गया है:

२१० नारदीयपुराणम् अविकारमजं शुद्धं स्वप्रकाशं निरंजनम् । ज्ञानरूपं सदानन्दं प्राहुर्वै मोक्षसाधनम् ॥११॥ यस्यावताररूपाणि ब्रह्माद्या देवतागणाः । समर्चयंति तं विद्याच्छाश्वतस्थानदं हरिम् ॥१२॥ जितप्राणा जिताहाराः सदा ध्यानपरायणाः । हृदि पश्यंति यं सत्यं तं जानीहि सुखावहम् ॥१३॥ निर्गुणोऽपि गुणाधारो लोकानुग्रहरूपधृक् । आकाशमध्यगः पूर्णस्तं प्राहुर्मोक्षदं नृणाम् ॥१४॥ अध्यक्षः सर्वकार्याणां देहिनो हृदये स्थितः । अनूपमोऽखिलाधारस्तं देवं शरणं व्रजेत् ॥१५॥ सर्वं संगृह्य कल्पांते शेते यस्तु जले स्वयम् । तं प्राहुर्मोक्षदं विष्णुं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥१६॥ वेदार्थविद्भिः कर्मज्ञैरिज्यते विविधैर्मखैः । स एव कर्मफलदो मोक्षदोऽकामकर्मणाम् ॥१७॥ हव्यकव्यादिदानेषु देवतापितृरूपधृक् । भुंक्ते य ईश्वरोऽव्यक्तस्तं प्राहुर्मोक्षदं प्रभुम् ॥१८॥ ध्यातःप्रणमितो वापि पूजितो वापि भक्तितः । ददाति शाश्वतं स्थानं तं दयालुं समर्चयेत् ॥१९॥ आधारः सर्वभूतानामेको यः पुरुषः परः । जरामरणनिर्मुक्तो मोक्षदः सोऽव्ययो हरिः ॥२०॥ संपूज्य यस्य पादाब्जं देहिनोऽपि मुनीश्वर । अमृतत्वं भजंत्याशु तं विदुः पुरुषोत्तमम् ॥२१॥ आनन्दमजरं ब्रह्म परं ज्योतिः सनातनम् । परात्परतरं यच्च तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२२॥ अद्वयं निर्गुणं नित्यमद्वितीयमनौपमम् । परिपूर्णं ज्ञानमयं विदुर्मोक्षप्रसाधकम् ॥२३॥ एवंभूतं परं वस्तु योगमार्गविधानतः । य उपास्ते सदा योगी स याति परमं पदम् ॥२४॥ सर्वसंगपरित्यागी शमादिगुणसंयुतः । कामाद्यैर्वर्जितो योगी लभते परमं पदम् ॥२५॥


अज, शुद्ध, स्वप्रकाश निरंजन, ज्ञानरूप और सदानन्द को ही मोक्ष-साधन कहा जाता है ॥११॥ जिसके अवतार रूपों की ब्रह्मा आदि देवतागण अर्चा करते हैं उसी हरि को शाश्वत मोक्षदाता जानना चाहिए ॥१२॥ जितप्राण, जिताहार और सदा ध्यानपरायण साधुजन ही जिस ब्रह्म को हृदय में दर्शन कर लेते हैं उसी सुखदायक सत्य को मुक्तिप्रद जानो ॥१३॥ जो निर्गुण होता हुआ भी गुणाधार है जो लोकानुग्रह के लिए अवतार रूप धारण करने वाला, पूर्ण और आकाशमध्यचारी है वही मनुष्यों का मोक्षदाता कहा जाता है ॥१४॥ वह सब कार्यों का अध्यक्ष, प्राणियों के हृदय में स्थित रहने वाला, अनुपम और निखिल विश्व का आधार है, उस देव के ही शरण में जाना चाहिए ॥१५॥ जो कल्पान्त में सारी सृष्टि को अपने में लीन कर जल में शयन करता है, तत्त्वदर्शी मुनि उसी विष्णु को मोक्षप्रद कहते हैं ॥१६॥ कर्म और वेद के तत्त्वज्ञाता लोग विविध यज्ञों से जिसकी उपासना करते हैं, वही निष्काम कर्म करने वाले मनुष्यों को कर्मफल प्रदान करता है ॥१७॥ जो अव्यक्त ईश्वर हव्य कव्य आदि दान में देवता और पितरों का रूप धारण कर दिये हुये पदार्थों को भोग करता है, उसी प्रभु को मोक्षद कहते हैं ॥१८॥ जो भक्ति पूर्वक ध्यान, प्रणाम, पूजा करने से शाश्वत स्थान प्रदान करता है, उस दयालु की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥१९॥ जो सब भूतों का एक मात्र आधार है, जो श्रेष्ठ पुरुष, जरा- मरण से रहित अव्यय हरि है वह मोक्ष देने वाला है ॥२०॥ मुनीश्वर, जिसके चरण कमल की पूजा कर मरण- शील मानव भी अमर बन जाता है उसको पुरुषोत्तम समझते हैं ॥२१॥ जो आनन्द, अजर, परब्रह्म सनातन ज्योति और पर से भी पर है वह विष्णु का परम पद है ॥२२॥ अद्वैत, निर्गुण, नित्य, अद्वितीय, अनुपम, परिपूर्ण, ज्ञानमय ब्रह्म ही मोक्ष के देने वाले हैं ॥२३॥ जो योगी सदा ऐसे पर वस्तु की योग विधि से उपासना करता है वह परमपद को प्राप्त करता है ॥२४॥ सब प्रकार की आसक्ति से रहित, शम आदि गुणों से युक्त और काम आदि गुणों से मुक्त रहने वाला योगी परम पद को प्राप्त करता है ॥२५॥

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २११ नारद उवाच कर्मणा केन योगस्य सिद्धिर्भवति योगिनाम् । तदुपायं यथातत्त्वं ब्रूहि मे वदतां वर ॥२६॥ सनक उवाच ज्ञानलभ्यं परं मोक्षं प्राहुस्तत्त्वार्थचिंतकाः । यज्ज्ञानं भक्तिमूलं च भवितः कर्मवतां तथा ॥२७॥ दानानि यज्ञा विविधास्तीर्थयात्रादयः कृताः । येन जन्मसहस्रेषु तस्य भक्तिर्भवेद्धरौ ॥२८॥ अक्षयः परमो धर्मो भक्तिलेशेन जायते । श्रद्धया परया चैव सर्वं पापं प्रणश्यति ॥२९॥ सर्वपापेषु नष्टेषु बुद्धिर्भवति निर्मला । सैव बुद्धिः समाख्याता ज्ञानशब्देन सूरिभिः ॥३०॥ ज्ञानं च मोक्षदं प्राहुस्तज्ज्ञानं योगिनां भवेत् । योगस्तु द्विविधः प्रोक्तः कर्मज्ञानप्रभेदतः ॥३१॥ क्रियायोगं विना नृणां ज्ञानयोगो न सिध्यति । क्रियायोगरतस्तस्माच्छ्रद्धया हरिमर्चयेत् ॥३२॥ द्विजभूम्यग्निसूर्याम्बुधातुहृच्चित्रसंज्ञिताः । प्रतिमाः केशवस्यैता पूज्य एतासु भक्तितः ॥३३॥ कर्मणा मनसा वाचा परपीडापराङ्मुखः । तस्मात्सर्वगतं विष्णुं पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥३४॥ अहिंसा सत्यमक्रोधो ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अनीर्ष्या च दया चैव योगयोर्ह्वयोः समाः ॥३५॥ चराचरात्मकं विश्वं विष्णुरेव सनातनः । इति निश्चित्य मनसा योगद्वितयमभ्यसेत् ॥३६॥ आत्मवत्सर्वभूतानि ये मन्यंते मनीषिणः । ते जानंति परं भावं देवदेवस्य चक्रिणः ॥३७॥ यदि क्रोधादिदुष्टात्मा पूजाध्यानपरो भवेत् । न तस्य तुष्यते विष्णूर्यतो धर्मपतिः स्मृतः ॥३८॥ यदि कामादिदुष्टात्मा देवपूजापरो भवेत् । दंभाचारः स विज्ञेयः सर्वपातकैभिः समः ॥३६॥ नारद बोले--हे वक्ताओं में श्रेष्ठ ! योगियों को किस कर्म से योग-सिद्धि प्राप्त होती है ? उसका उपाय तत्त्वतः बताइए ॥२६॥ सनक बोले--तत्त्वार्थ चिन्तकों ने पर मोक्ष को ज्ञानलभ्य कहा है । उस ज्ञान का मूल भक्ति है, जो कर्मशील व्यक्ति को ही प्राप्त होती है । ॥२७॥ जिसने सहस्रों जन्म में दान यज्ञ और विविध तीर्थ- यात्रायें की हैं, उसकी हरि चरणों में भक्ति होती है ।।२८।। भक्ति के लेश मात्र से भी अक्षय परम धर्म प्राप्त होता है और अति उत्तम श्रद्धा से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२९॥ सब पापों के नष्ट हो जाने पर बुद्धि निर्मल हो जाती है । विद्वानों ने उसी निर्मल बुद्धि को ज्ञान नाम से कहा है ।।३०।। ज्ञान को मोक्ष देने वाला कहा गया है । वह ज्ञान योगियों को प्राप्त होता है । कर्म और ज्ञान भेद से योग दो प्रकार का कहा गया है ।।३१।। मनुष्यों को कर्म योग के बिना ज्ञान योग सिद्ध नहीं होता । इसलिए कर्म योग में लीन रह कर श्रद्धापूर्वक हरि की उपासना करनी चाहिए ।।३२।। ब्राह्मण, भूमि, अग्नि, सूर्य, जल, धातु की बनी मूर्ति, हृदय और केशव का चित्र इतनी केशव की प्रतिमायें हैं । इन प्रतिमाओं में केशव की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ।।३३।। इसलिए मन, कर्म और वचन से किसी को पीड़ा न देते हुए भक्तिपूर्वक, सर्वव्यापक विष्णु की पूजा करे ॥३४॥ अहिंसा, सत्य, अक्रोध, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनीर्ष्या (सहानुभूति) और दया दोनों योगों में समानरूप से आवश्यक है ।।३५।। यह सारा चराचरात्मक विश्व विष्णु का ही रूप है, ऐसा मन में निश्चय कर दोनों योगों का अभ्यास करना चाहिए ।।३६।। जो मनीषी सब प्राणियों को आत्मवत् समझते हैं वे देवाधिदेव चक्रधर विष्णु के परम रहस्य को जानते हैं ।।३७।। यदि क्रोध आदि से मलिन आत्मा वाला व्यक्ति पूजा और ध्यान करता है उस पर विष्णु कभी प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि वे धर्मपति कहे जाते हैं ।।३८।। यदि कोई कामादि दोषों से दूषित अन्तः करण वाला व्यक्ति देवपूजा करता है, उसको दम्भी समझना चाहिए