बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ नारदीयपुराणम् एवमनेकं देहभोगमन्वाधीनतयानुभूयमानो दंशादिष्वपि निवारयितुमशक्तः ॥२५॥ बाल्यभावमसाद्य मातापित्रोरुपाध्यायस्यां ताडनं सदा पर्यटनशीलत्वं पांशुभस्मपंमादिषु क्रीडनं सदा कलहप्रियतदामशुचित्वं अशुच्याचाराभासकार्यनियतत्वं तदसंभव आधिप्रात्मिकदुः- खमेवंविधमनुभवति ॥२६॥ ततस्तु तरुणभावेन धनार्जनमर्जितस्य रक्षणं तस्य नाशव्ययादिषु चात्यंतदुःखिता मायया मोहिताः कामक्रोधादिदुष्टमनसः सदास्र्यापरायणाः परस्वपरस्त्रीहरणोपायपरायणाः पुत्रमित्रकलत्रादि- भरणोपायचिंतापरायणा वृथाहंकारदूषिताः पुत्रादिषु व्याध्यादिपीडितेषु सत्सु सर्वव्याप्तिं परित्यज्य रोगादिभिः क्लेशितांनां समीपे स्वयमाध्यात्मिकदुःखेन परिप्लुता वक्ष्यमाणप्रकारेण चिंतामनुभवते ॥२७॥ गृहक्षेत्रादिकं कर्म किंचिन्नापि विचारितम् । समृद्धस्य कुटुम्बस्य कथं भवति वर्त्तनम् ॥२८॥ मम मूलधनं नास्ति वृष्टिश्चापि न वर्धति । अश्वः पलायितः कुत्र गावः किं नागता मम ॥२९॥ वालापत्या च मे भार्या व्याधितोऽहं च निर्धनः । अविचारात्कृषिर्नष्टा पुत्रा नित्यं रुदंति च ॥३०॥ भग्नं छिन्नं तु मे सद्म बांधवा अपि दूरगाः । न लभ्यते वर्त्तनं च राजबाधातिदुःसहा ॥३१॥ रिपवो मां प्रधावंते कथं जेष्याम्यहं रिपून् । व्यवसायाक्षमश्वाहं प्राप्ताः प्राघूर्णका अमी ॥३२॥
इस भाँति वह बालक परवश होने के कारण अनेक शारीरिक भोगों को भोगता है, मच्छर आदि उसको काटते हैं, परन्तु वह हटा नहीं पाता है। धीरे-धीरे जब वह किशोरावस्था को प्राप्त होता है तब माता, पिता और उपाध्याय की डाँट-फटकार और ताड़ना प्रारम्भ होती है, वह सदा इधर-उधर घूमता रहता, धूल राख और कीचड़ से खेलने लगता, प्रति दिन लड़ता-झगड़ता और अनेकों अशिष्ट व्यवहारों तथा अशुचि कार्यों में ही लगा रहता है। जब इन कार्यों में किसी प्रकार की बाधा पहुँचती तब उसको मानसिक कष्ट का अनुभव होने लगता है। २५-२६॥ किशोरावस्था बीत जाने के बाद जब वह तरुण हो जाता है तब वह जीव धन कमाने लगता। अर्जित धन को रक्षा, उसके नाश और व्यय को चिन्ता से अधिक दुःखी रहता है। मायामोहित, उस जीव का मन काम- क्रोध आदि से दूषित हो जाता है। सर्वदा असूया-परायण होकर परद्रव्य परस्त्री के हरण की युक्ति ही सोचा करता है। पुत्र, मित्र, कलत्र आदि के भरण-पोषण की चिन्ता में तल्लीन होकर व्यर्थ के अहंकार से उसका मन दूषित हो जाता है। पुत्र आदि के रोग-ग्रस्त होने पर वह सारी क्रियाओं को छोड़कर रोगादि से पीड़ित स्वजनों के समीप रहता और स्वयं मानसिक दुःख से दुःखी होकर अनेकों प्रकार को चिन्ताओं से चिन्तित हो जाता है ॥२७॥ सोचता है कि घर, खेती बारी आदि की ओर मैंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया, इतने बड़े कुटुंब का भरण-पोषण कैसे होगा ? मेरे पास मूलधन भी नहीं है। वर्षा भी नहीं हो रही है। घोड़ा कहाँ भाग गया ? मेरी गायें अबतक नहीं आईं। मेरी भार्या की गोद में छोटा-सा बच्चा है, व्याधि पीड़ित मैं निर्धन हो गया । मेरे अविचार के कारण कृषि भी नष्ट हो गई। पुत्र सर्वदा रोते रहते हैं ॥२८-३०॥ घर भी गिर गया, टूट गया, बन्धु भी दूर हैं। कोई जीविका का साधन भी प्राप्त नहीं है। ऊपर से अति दुःसह राजा का शुल्क संबन्धी भय है ॥३१॥ शत्रु चारों ओर से चढ़े भा रहे हैं। कैसे शत्रुओं को वश में कर सकूँगा ? कोई व्यवसाय करने की भी क्षमता नहीं है । इतने अतिथि भी आ गए ॥३२॥ इस प्रकार अत्यन्त चिन्ताकुल हो अपने-अपने दुःखों