भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 1008 में से

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द्वांविंशोऽध्यायः २०५ देहस्तु पापात्संज्जातस्तस्मात्पापं न कारयेत् । भृत्यमित्रकलत्रार्थमप्यद्व्रव्यं हृतं मया ॥१६॥ तेन पापेन दह्यामि जरायुपरिवेष्टितः । दृष्ट्वास्यस्य वित्तं पूर्वं संतप्तोऽहमसूयया ॥१७॥ गर्भाग्निनानुदह्येयमिदानीमपि पापकृत् । कायेन मनसा वाचा परपीड़ामकारिषम् तेन पापेन दह्यामि त्वहमेकोऽतिदुःखितः ॥१८॥ एवं बहुविधं गर्भस्थो जंतुर्विलप्य स्वयमेव वा ॥१९॥ आत्मानमाश्वास्य उत्पत्तेरनंतरं सत्संगेन विष्णोश्चरितश्रवणेन च विशुद्धमना भूत्वा सत्कर्माणि निर्वर्त्य अखिलजगदंतरात्मनः सत्यज्ञानानंदमयस्य स्वशक्त्याद्यनुष्ठितविविधप्रपंचस्य लक्ष्मी- पतेर्नारायणस्य सकलसुरासुरयक्षगंधर्वराक्षसपन्नगमुनिकिन्नरसमूहार्थितचरणकमलयुगं भक्तितः समभ्यर्च्य दुःसह संसारच्छेदस्य कारणभूतं वेदरहस्योपनिषद्भिः परिस्कृतं सकललोकपरायणं हृदि निधाय दुःखतरमिमं संसारागारमतिक्रमिष्यामीति मनसि भावयति ॥२०॥ यतस्तन्मातुः प्रसूतिसमये सति गर्भस्थो देही नारदमुने वायुनापीडितो मातुश्चापि दुःखं कुर्वन्कर्मपाशेन बलाद्योनिमार्गान्निष्क्रामन्सकल्यातनाभोगमेककालभवमनुभवति ॥२१॥ तेनातिवलेशेन योनियंत्रपीडितो गर्भान्निष्क्रांतो निःसंज्ञतां याति ॥२२॥ तं तु बाह्यवायुः समुज्जीवयति । बाह्यवायुस्पर्शसमनंतरमेव नष्टस्मृतिपूर्वानु- भूताखिलदुःखानि वर्त्तमानान्यपि ज्ञानाभावादविज्ञायात्यंतदुःखमनुभवति ॥२३॥ एवं बालत्वमापन्नो जंतुस्तत्रापि स्वमलमूत्रलिप्तदेह आध्यात्मिक दिपीड्यमानोऽपि वक्तुमशक्तः क्षुत्तृषपीडितो रुदिते सति स्तनादिकं देयमिति मन्वानाः प्रयतन्ते ॥२४॥ के कारण ही प्राप्त होती है, इसलिए पाप नहीं करना चाहिए। सेवक, मित्र और स्त्री के लिए दूसरों का धन लूटा। उसी पाप से आज जरायु में बँधकर भस्म हो रहा हूँ। दूसरे के धन को देखकर ईर्ष्यावश जलता रहा उसी पाप के कारण पापी मैं इस समय भी गर्भाग्नि से जल रहा हूँ। शरीर, मन और वचन से दूसरे को पीड़ित करता रहा । उस पाप से आज अकेला दुःखी होकर जल रहा हूँ ॥१६-१८॥ इस प्रकार गर्भस्थ जीव विलाप कर स्वयं अपने द्वारा अपने को आश्वासन देने लगता है कि मैं उत्पन्न होने के बाद सत्संग के द्वारा शुद्धचित्त होकर सत्कर्म करूँगा। अखिल जगदन्तरात्मा, सत्यज्ञानानन्दमय स्वशक्ति के प्रभाव से स्वर्ग लोक को प्रतिष्ठित करने वाले लक्ष्मीपति नारायण के उन युगल चरणारविन्दों की जिनकी सब सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, मुनि और किन्नरवर्ग पूजा करते हैं, भक्तिपूर्वक पूजा करूँगा। और वेद, रहस्य साधना तथा उपनिषदों से परिस्कृत सकल लोकों के एक मात्र परम आधार भगवान् का हृदय में ध्यान कर इस दुःखमय संसार के बन्धन से अपने को मुक्त करूँगा। इस प्रकार वह अपने मन में भावना करता है ॥१९-२०॥ नारदमुनि ! यतः जन्म समय वह गर्भस्थ देही स्वयं वायु से पीड़ित होता माता को भी पीड़ा पहुँचाता, कर्मपाश से बँधा वह बलात् योनिमार्ग से निकलते समय सब प्रकार की यात- नाओं के भोग का अनुभव उसी समय करता है ॥२१॥ अतः योनि-यन्त्र से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण गर्भ से निकलते ही अचेत हो जाता है। इस दशा में उसको बाहर की वायु द्वारा चेतना प्राप्त होती है । बाह्य वायु के स्पर्श करते ही पूर्व जन्म की स्मृति नष्ट हो जाती है। उस समय पूर्व जन्म के अनुभूत दुःख संस्कार रूप में वर्त्तमान रहते हैं। तो भी ज्ञानशून्य होने से उसको भूलकर वह जीव स्वयं दुःख का अनुभव करता है ॥२२-२३॥ इस प्रकार जीव बालक बन कर अपने मलमूत्र में लिपटा रहता है। उसको मानसिक पीड़ा होती रहती है, परन्तु कुछ कह नहीं सकता है। क्षुत्पिपासा से पीड़ित होकर जब रोने लगता है तब माता 'स्तन पान कराना चाहिए', ऐसा सोचकर स्तनपान कराती है ॥२४॥

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