बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०५ नारदीयपुराण मनुष्यत्वेऽपि यदा स्त्रीपुरुषयोर्व्यवायस्तत्समये रेतो यदा जरायुं प्रविशति तदैव कर्मवशाज्जन्तुः शुक्रेण सह जरायुं प्रविश्य शुक्रशोणितकललं प्रपद्यते ॥६॥ तद्वीर्यं जीवप्रवेशात्पञ्चाहात्कललं भवति अर्द्धमासे पललमम्भवति। मासे प्रादेशमात्रत्वमापद्यते ॥१०॥ ततः प्रभृति वायुवशाच्चैतन्याभावेऽपि मातुरुदरे दुःसहतापवलेनावर्तकल स्थातुमशक्तत्वाद्विभ्रमति ॥११॥ मासे द्वितीये पूर्णे पुरुषाकारमात्रतामुपगम्य मासत्रितये पूर्णे करचरणाद्यवयवावभवमुपगम्य चतुर्थे मासेषु गतेषु सर्वावयवानां संधिभेदपरिज्ञानं पञ्चमतीतेषु नखानामितिव्यंजकता षट्स्वतीतेषु नखसंधिपरिस्फुटतामुपगम्य नाभिधुक्षणं पुष्यमाणममेध्यमूत्रसिक्ततांगं जरायुनांवंधि- तरक्तास्थिकृमिवसामज्जास्नायुकेशादिदूषिते कुत्सिते शरीरे निवासिनं स्वयमप्येवं परिदूषितदेहं मातुश्च कट्वम्ललवणात्युष्णभुक्तदह्यमानमात्मानं दृष्ट्वा देही पूर्वजन्मस्मरणात्सुखावानुभूतानुकूल- नरकदुःखानि च स्मृत्वांतर्दुःखेन च परिदह्यमानो मातुरुदहातिमूत्रादिरूक्षेण दह्यमान एवं मनसि प्रलपति ॥१२॥ अहोऽत्यंतपापोऽहंपूर्वजन्मनि भृत्यापत्यमित्रयोषिद्गृहक्षेत्रधनधान्यादिष्वत्यंतरागेण कलत्रपोषणार्थं परधनक्षेत्रादिकं पश्यतो हरणायुपायैरपहृत्य कामांधतया परस्त्रीहरणादिकमनुभूय महा- पापान्याचरंस्तैः पापै रहमेक एवंविधवरकाननुभूय पुनः स्थावरादिषु महादुःखमनुभूय संप्रति जरायुणा परिवेष्टितोऽन्तःदुःखेन बहिस्तापेन च दह्यामि ॥१३॥ मया पोषिता दाराश्च स्वकर्मवशादन्यतो गताः ॥१४॥ अहो दुःखं हि देहिनाम् ॥१५॥
मनुष्य होने पर भी जब स्त्री पुरुष का संयोग होता है और उस समय जब वीर्य जरायु में प्रवेश करता है उसी समय कर्मवश जन्तु शुक्र के साथ जरायु में जाकर शुक्र, शोणित और कलल के रूप में परिवर्तित हो जाता है। उस वीर्य में जीव के प्रवेश से पाँच दिन बाद कलल होता, आधे महीने में पलल और एक महीने में प्रादेश मात्र का पिण्ड हो जाता है ! तत्पश्चात् चेतनता के अभाव में भी वायु के कारण माता के उदर में दुःसह ताप के सहने में असमर्थ हो इधर उधर चलता रहता है ॥९-११॥ दो मास बीत जाने पर पूर्णरूप से पुरुषाकार हो जाता है। तीसरे महीने में पूर्ण रूप से हाथ, पैर आदि अंग स्पष्ट होने लगते हैं । चार मास बीत जाने पर सब अवयवों का सन्धि भेद स्फुट हो जाता है । पांच मास बाद नख निकल आते, छह मास बीतने पर नख सन्धि परिस्फुट हो- जाती और नाभि नाल से उसका पोषण होता है । अशुद्ध मूत्र आदि पदार्थों से उसका अंग ढका रहता है । जरायु से बँधा, रक्त, अस्थि, कृमि, वसा, मज्जा, स्नायु, केश आदि से दूषित उस कुत्सित शरीर में अपने को अवस्थित तथा माता के कटु, अम्ल, लवण और अत्युष्ण भोजन से जलाये जाते हुए स्वयं को देखकर वह देही पूर्व जन्म की स्मृति तथा अनुभवों और पूर्वानुभूत नरक-दुखों का स्मरण कर अन्तर्वेदना से व्यथित हो माता के मूत्र आदि रूक्ष पदार्थों से जलकर विलाप करने लगता है ॥१२॥ आह ! महापापी मैंने पूर्वजन्म में भृत्य, पुत्र, मित्र, स्त्री, घर, धन, धान्य आदि के मोह में पड़कर स्त्री-पालन के लिए दूसरे के धन क्षेत्र आदि कूटोपायों से अपहरण किया । कामान्ध हो पर-स्त्री हरण आदि महापापों को किया । दूसरों के लिए पापाचरण किया, परन्तु अकेला ही अनेकों घोर नरकों का अनुभव कर पुनः स्थावर आदि योनियों में अनेक प्रकार के कष्ट सहा । इस समय जरायु में बँधकर अन्तस्ताप और बाह्य ताप दोनों से जल रहा हूँ ॥१३॥ मेरे द्वारा पाली गई स्त्री भी अपने कर्मवश, अन्यत्र चली गई । अहो, देहधारियों के लिए केवल कष्ट ही कष्ट है ॥१४-१५॥ देह पाप