भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 1008 में से

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द्वात्रिंशोऽध्यायः २०७ एवमत्यंतचिन्ताकुलः स्वदुःखानि निवारयितुमक्षमो धिग्विधिं भाग्यहीनं मां किमर्थं विदधे इति दैवमाक्षिपति ॥३३॥ तथा वृद्धत्वमापन्नो हीयमान सारो जरापलितादिव्याप्तदेहो व्याधिबाध्यत्वादिकमापन्नः । प्रकंपमानावयवश्वासकासादिपीडितो लोलाविललोचनः श्लेष्मव्याप्तकंठः पुत्रदारादिभिर्भत्स्यमानः कदा मरणमुपयामीति चिंताकुलो मयि मृते सति मदजितं गृहक्षेत्रादिकं वस्तु पुत्रादयः कथं रक्षंति कस्य वा भविष्यति ॥३४॥ नद्धने परैरपहृते पुत्रादीनां कथं वर्त्तनं भविष्यतीति ममतादुःखपरिलुतो गाढं निःश्वस्य स्वेन वयसा कृतानि कर्माणि पुनः पुनः स्मरन् क्षणे विस्मरति च संततस्तत्त्वासन्नमरणो ॥३५॥ व्याधिपीडितोऽन्तस्तापार्तः क्षणं शय्यायां क्षणं मंचे च ततस्ततः पर्यटन् क्षुत्तृट्परीपीडितः किंचित्मात्रमुदकं देहीत्यतिकार्पण्येन याचमानस्तत्रापि ज्वराविष्ठानामुदकं न श्रेयस्करमिति ब्रुवतां मनसातिद्वेषं कुर्वन्मन्दचैतन्यो भवति ॥३६॥ ततश्च हस्तपादाकर्षणे न तु क्षमो रुदद्भिर्बाधवजनैर्वेष्टितो वक्तुमक्षमः स्वार्जितधनादिकं कस्य भविष्यतीति चिंतापरो बाष्पाविलविलोचनः कंठे घुरघुरायमाणे सति शरीराान्निष्क्रांतप्राणो यमदूतैर्भत्स्येमानः पाशंयंत्रितो नरकादीन्पूर्ववदश्नुते ॥३७॥ आमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धान्यंति धातवः । तथैव जीविनः सर्व आकर्मप्रक्षयाद् भृशम् ॥३८॥ को दूर करने में अपने को असमर्थ पाकर 'विधाता को धिक्कार है, क्यों मुझ भाग्यहीन का अन्त नहीं कर देता' आदि कह कर भाग्य को ही दोष देता है ॥३३॥ फिर जब वह बूढ़ा हो जाता है, केश झड़ जाते, बुढ़ापा और रोग से शरीर व्याप्त हो जाता तब व्याधियों और कष्टों से घिर जाता है। उसके शरीर में कंपकंपी होने लगती है । श्वास-कास आदि रोगों से पीड़ित हो जाता । गले में कफ की अधिकता हो जाती और उसकी आँखें मन्द तथा चंचल हो जाती हैं । पुत्र, स्त्री आदि जब उसको झिड़कने लगते तब यही सोचता है कि कब मेरी मृत्यु होगी । परन्तु फिर यह सोचने लगता कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे घर, खेत आदि की रक्षा मेरे पुत्र कैसे करेंगे ? अथवा कौन इसको प्राप्त करेगा ? ॥३४॥ दूसरे जब मेरी सम्पत्ति को चुरा लेंगे तब पुत्रादि का निर्वाह कैसे होगा ? इस प्रकार मोह और दुःख से व्याकुल होकर आहें भरने लगता और अपने जीवन में किये गए कर्मों का बार-बार स्मरण कर क्षण भर में ही अपने को भूल जाता है । जब मृत्यु निकट आती तब व्याधि-पीड़ित और अन्तस्ताप तथा वेदना से आर्त होकर क्षणभर शय्या पर तो क्षण भर मंच पर लुढ़कता है । इधर-उधर घूमता हुआ जब भूख-प्यास से पीड़ित हो जाता तब 'अरे ! थोड़ा जल दो' यह कह कर बड़ी दीनता से जल माँगने लगता है । उस समय जब उसके कुटुम्बी'ज्वराक्रान्त व्यक्ति के लिए जल लाभदायक नहीं होता' यह कहते हैं तब तो वह मन ही मन उन पर ईर्ष्या करने लगता और अचेत हो जाता है ॥३५-३६॥ तदनन्तर उसमें हाथ पैर हिलाने की शक्ति नहीं रह जाती, रोते हुए बन्धुओं से घिरा वह स्वयं कुछ कहने में असमर्थ हो जाता है । उसकी स्वार्जित सम्पत्ति किसके अधिकार में जायगी, इसकी चिन्ता से उसकी आँखें आँसू से भर जाती हैं । धीरे- धीरे कण्ठ से घर्र-घर्र की ध्वनि होने लगती और उसके प्राण शरीर से निकल जाते हैं । मृत्यु के अनन्तर यमदूतों की झिड़कियाँ सहता हुआ, यमपाश में बँधकर पूर्व की भाँति नरकों का भोग करता है ॥३७॥ जिस प्रकार धातुएँ तब तक जलती रहती हैं जब तक उनका दोष क्षय नहीं हो जाता उसी प्रकार सभी जीव कर्मक्षय होने तक अत्यन्त दारुण भोग भोगते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! इसलिए संसार रूपी दावानल से

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