बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ नारदीयपुराणम् तस्मात्संसारदावाग्नितापात द्विजसत्तम । अभ्यसेत्परमं ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३६॥ ज्ञानशून्या नरा ये तु पशवः परिकीर्तिताः । तस्मात्संसारमोक्षाय परं ज्ञानं समभ्यसेत् ॥४०॥ मानुष्यं चैव संप्राप्य सर्वकर्मप्रसाधकम् । हरिं न सेवते यस्तु कोऽन्यस्तस्मादचेतनः ॥४१॥ अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रं मनीश्वराः । आस्थिते कामदे विष्णौ नरा यांति हि यातनाम् ॥४२॥ नारायणे जगन्नाथे सर्वकामफलप्रदे । स्थितेऽपि ज्ञानरहिताः पच्यंते नरकेष्वहो ॥४३॥ स्रवन्मूत्रपुरीषे तु शरीरेऽस्मिन्नशाश्वते । शाश्वतं भावयन्त्यज्ञा महामोहसमावृताः ॥४४॥ कुत्सितं मांसरक्ताद्यैर्देहं संप्राप्य यो नरः । संसारच्छेदकं विष्णुं न भजेत्सोऽतिपातकी ॥४५॥ अहो कष्टमहो कष्टमहो कष्टं हि मूर्खता । हरिध्यानपरो विप्र चाण्डालोऽपि महासुखी ॥४६॥ स्वदेहान्निस्सृतं दृष्ट्वा मलमूत्रादिकं त्विमम् । उद्वेगं मानवा मूर्खाः किं न यांति हि पापिनः ॥४७॥ दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि । तल्लब्ध्वा परलोकाय यत्नं कुर्याद्विचक्षणः ॥४८॥ अध्यात्मज्ञानसम्पन्ना हरिपूजापरायणाः । लभन्ते परमं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥४९॥ यतो जातमिदं विश्वं यतश्चैतन्यमश्नुते । यस्मिंश्च विलयं याति स संसारस्य मोचकः ॥५०॥ निर्गुणोऽपि परोऽनंतो गुणवानिव भाति यः । तं समभ्यर्च्य देवेशं संसारात्परिमुच्यते ॥५१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे भवाटवीनिरूपणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३२॥
सन्तप्त प्राणी परम ज्ञान का अभ्यास करे, ज्ञान से ही वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है ॥३८-३९॥ जो ज्ञान- शून्य मनुष्य हैं वे पशु कहे गए हैं, इसलिए संसार से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए ॥४०॥ जो सब कर्मों का आधार भूत मानव-जीवन पाकर भा हरि की सेवा नहीं करता, उससे बढ़कर चेतनाहीन कौन होगा ? मुनीश्वरवृन्द ! यह आश्चर्य है कि मनोरथदाता विष्णु के रहते हुए भी अज्ञानी नर यातना पाते हैं ॥४१॥ अहो ! सब मनोरथों के देने वाले जगत्पति नारायण के रहने पर भी ज्ञानहीन मूढ़ नरक में पाप भोगते हैं ॥४२॥ अज्ञ मनुष्य महामोह में फँसकर इस मलमूत्र से भरे अनित्य शरीर को ही नित्य समझते हैं ॥४३॥ जो मनुष्य मांस, रक्त आदि से युक्त इस कुत्सित शरीर को पाकर संसार से उद्धार करने वाले विष्णु का भजन नहीं करता वह महापापी है ॥४४॥ विप्र ! सर्वदा हरि की उपासना करने वाला चाण्डाल भी महासुखी है । कष्ट है, कष्ट है, महाकष्ट है इस प्रकार चिल्लाना मूर्खता है ॥४५॥ आश्चर्य है कि मूर्ख पापी मानव शरीर से निकलते हुए मल-मूत्रादि अशुद्ध पदार्थों को देखकर भी इसको अशुचि समझकर घृणा क्यों नहीं करता ? ॥४६॥ देवता भी दुर्लभ मानव-जीवन प्राप्त करने की प्रार्थना किया करते हैं । इसलिए ऐसे दुर्लभ मानुष जन्म को पाकर बुद्धिमान् व्यक्ति अवश्य परलोक सुधारने का प्रयत्न करे ॥४७॥ अध्यात्म-ज्ञान-सम्पन्न और हरिपूजापरायण व्यक्ति उस परम स्थान को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरागमन नहीं होता ॥४८॥ जिससे यह सारा विश्व उत्पन्न हुआ, जिससे यह चैतन्य प्राप्त करता और जिसमें लय हो जाता है वही संसार का उद्धारकर्त्ता है ॥४६॥ जो अनन्तनिर्गुण होता हुआ भी सगुण के समान जान पड़ता है उस देवेश की पूजा करने से ही संसार से मुक्ति प्राप्त होती है ॥५०॥ श्री नारदीय महापुराण में भवाटवी निरूपण नामक बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२॥