भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

एकोनत्रिंशोऽध्यायः २०१ नारद उवाच त्वं समर्थोऽसि तच्छेत्तुं यतो नो ह्यग्रजो भवान् । धर्माश्च विविधाः प्रोक्ताः पापान्यापि बहूनि च ॥५६॥ चिरभोज्यं फलं तेषामुक्तं बहुविदा त्वया । दिनांते ब्रह्मणः प्रोक्तो नाशो लोकत्रयस्य वै ॥५७॥ परार्द्धद्वितयांते तु ब्रह्माण्डस्यापि संक्षयः । ग्रामदानादिपुण्यानां त्वयैव विधिनंदन ॥५८॥ कल्पकोटिसहस्रेषु महांन्भोग उदाहृतः । सर्वेषामेव लोकानां विनाशः प्राकृते लये ॥५६॥ एकः शिष्यत एवेति त्वया प्रोक्तं जनार्दनः । एष मे संशयो जातस्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति ॥६०॥ पुण्यपापोपभोगानां समाप्तिर्नास्य संप्लवे । सनक उवाच ॥६१॥ साधु साधु महाप्राज्ञ गुह्याद्गुह्यतमं त्विदम् पृष्टं तत्तेऽभिधास्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । नारायणोऽक्षरोऽनंतः परं ज्योतिः सनातनः ॥६२॥ विशुद्धो निर्गुणो नित्यो मायामोहविवर्जितः । निर्गुणोऽपि परानन्दो गुणवानिव भाति यः ॥६३॥ ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैस्तु भेदवानिव लक्ष्यते । गुणोपाधिकभेदेषु त्रिष्वेतेषु सनातन ॥६४॥ संयोज्य मायामखिलं जगत्कार्यं करोति च । ब्रह्मारूपेण सृजति विष्णुरूपेण पाति च ॥६५॥ अंते च रुद्ररूपेण सर्वमत्तीति निश्चितम् । प्रलयांते समुत्थाय ब्रह्मारूपी जनार्दनः ॥६६॥ चराचरात्मकं विश्वं यथापूर्वमकल्पयत् । स्थावराद्याश्च विप्रेन्द्र यत्र यत्र व्यवस्थिता ॥६७॥ ब्रह्मा तत्तज्जगत्सर्वं यथापूर्वं करोति वै । तस्मात्कृतानां पापानां पुण्यानां चैव सत्तम् ॥६८॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मणां ह्यक्षयं फलम् । नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥६६॥ नारद ने कहा—भगवन् ! दयानिधे ! मेरे मन में सन्देह हो रहा है । आप ही उसको दूर करने में समर्थ हैं, क्योंकि आप हमारे अग्रज हैं । बहुज्ञ आपने बहुविध धर्म, बहुत से पाप और उनके चिर काल तक भोगने के योग्य फलों को कहा और यह भी बताया कि ब्रह्मा के दिन के अन्त में तीनों लोकों का नाश हो जाता है ॥५५-५७॥ दो परार्द्ध के बीत जाने पर ब्रह्माण्ड का भी नाश हो जाता है । विधिनन्दन ! आपने अभी ग्राम दान आदि पुण्य कर्मों का करोड़ों कल्पों तक महान् भोग कहा, फिर यह ब्रह्मा ही शेष रह जाता है। यही मुझे सन्देह हो गया है, आप ही उसे दूर कर सकते हैं । क्या उस प्रलय में भी पाप और पुण्यों का नाश नहीं होता ? ॥५८-६०॥ सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो । यह तो अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछा, इसलिए तुमसे कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । नारायण अक्षर, अनन्त, परम ज्योति, सनातन, विशुद्ध, निर्गुण, नित्य माया-मोह से रहित और परानन्द हैं जो निर्गुण होते हुए भी सगुण से जान पड़ते हैं ॥६१-६३॥ वही सनातन ब्रह्म ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रूपों में भिन्न-भिन्न जान पड़ता है । यद्यपि इन तीनों में केवल गुण और उपाधि का ही भेद है ॥६४॥ वह माया से युक्त होकर अखिल जगत् का कार्य करता है वह ब्रह्मारूप से सृष्टि करता, विष्णुरूप से पालन करता और अन्त में रुद्र रूप से सम्पूर्ण सृष्टि को उदरस्थ कर लेता है, यह निश्चित है ॥६५॥ प्रलय काल बीत जाने पर वही ब्रह्मारूपी जनार्दन पूर्व की भाँति चराचरात्मक विश्व की रचना करता है । विप्रेन्द्र ! पूर्व सृष्टि में स्थावर आदि पदार्थ जहाँ जिस रूप में व्यवस्थित थे, तदनुरूप ही ब्रह्मा ने उन सब के साथ सारे जगत् को बनाया ॥६६-६७॥ सज्जन ! इस कारण कृत पापों और पुण्यों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है । कर्मों के फल अक्षय हैं । बिना उन कर्मों का भोग किए करोड़ों कल्पों में भी वे नष्ट नहीं होते । अपने किये शुभ-अशुभ कर्मों २६ ना० पु०