बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० नारदीयपुराणम् नारद उवाच विद्युत्प्रभायुधैर्भीमो द्वात्रिंशद्भुजसंयुतः । योजनत्रयविस्तारो रक्ताक्षो दीर्घनासिकः ॥४१॥ दंष्ट्राकरालवदनो वापीतुल्यांगलोचनः । मृत्युज्वरादिभिर्मुख्यैश्चित्रगुप्तोऽपि भीषणः ॥४२॥ सर्वे दूताश्च गर्जंति यमतुल्यविभीषणाः । ततो ब्रवीति तान्सर्वांकंपमानांश्च पापिनः ॥४३॥ शोचन्तः स्वानि कर्माणि चित्रगुप्तो यमाज्ञया । भो भो पापा दुराचारा अहङ्कारप्रदूषिताः ॥४४॥ किमर्थमर्जितं पापं ह्युष्माभिरविवेकिभिः । कामक्रोधादिदृप्तेन मदेन तु चेतसा ॥४५॥ यद्यत्पापतरं तत्किमर्थं अर्जितं जनाः । कुर्वन्तः पुनः यूयं पापाख्यं च बहुविधाः ॥४६॥ तथैव यातना भोग्याः किं वृथा ह्यतिदुःखिताः । भृत्यमित्रकलत्रार्थं दुष्कृतं चरितं यथा ॥४७॥ तथा कर्मवशात्प्राप्ता यूयमत्रातिदुःखिताः । युष्माभिः पोषिता ये तु पुत्राद्या अन्यतो गताः ॥४८॥ युष्माकमेव तत्पापं प्राप्तं किं दुःखकारणम् । यथा कृतानि पापानि युष्माभिः सुखहनि वै ॥४९॥ तथा प्राप्तानि दुःखानि किमर्थमिह दुःखिताः । विचारयध्वं यूयं तु युष्माभिश्चार्जितं पुरा ॥५०॥ यमः करिष्यते दंडमिति किं न विचारितम् । दरिद्रेऽपि च मूर्खे न पंडिते वा धियान्विते ॥५१॥ कांदिशीके च वीरे च समवर्ती यमः स्मृतः । चित्रगुप्तेरितं वाक्यं श्रुत्वा ते पापिनस्तदा ॥५२॥ शोचंतः स्वानि कर्माणि तूष्णीं तिष्ठंति भीषिताः । यमाज्ञाकारिणः क्रूराश्चंडा दूता भयानकाः ॥५३॥ चंडालाद्याः प्रसङ्ग्यातान्रौरवेषु क्षिपंति च । स्वदुष्कर्मफलं ते तु भुक्त्वांते पापशेषतः ॥५४॥ महीतलं च संप्राप्य भवंति स्थावरादयः । भगवन्संशयो जातो मच्चेतसि दयानिधे ॥५५॥ समान हो जाता है। अपनी बत्तीस भुजाओं में विद्युत् के समान चमकने वाले अस्त्रों को धारण करने से महा भयंकर जान पड़ते हैं। उनकी काया तीन योजन विस्तृत सी जान पड़ती है। उनकी लाल-लाल आँखे, बड़ी लंबी नाक, भयानक दाढ़ी वाला भयानक मुख और बावली के समान आंखें बड़ी ही भयंकर जान पड़ती है। मृत्यु-ज्वर और घातक रोगों और भीषण आकृति वाले लिपिक चित्रगुप्त के साथ वो और डरावने हो जाते हैं ॥४१-४२॥ यम के समान भयंकर सब यमदूत घोर गर्जन करने लगते हैं इसके अनन्तर यम का आदेश पाकर चित्रगुप्त अपने पाप कर्मों पर अनुताप करने वाले उन पापियों से, जो भय से कांपते रहते हैं, कहता है कि— अरे पापियो! दुराचारियो! अहंकार में पड़कर तुम अविवेकियों ने क्यों पाप किया? काम, क्रोध आदि के वश में होकर गर्वोन्मत्त तुम पापियों ने पापकर्म क्यों किये? अत्यन्त प्रसन्न हो-हो कर तुम लोगों ने जैसे बहुत से पाप किये हैं वैसी ही यातनायें तुमको भोगनी पड़ेंगी। अब क्यों व्यर्थ दुःखी हो रहे हो? ॥४३-४६॥ जिस प्रकार सेवक, मित्र और स्त्री के लिए तुम लोगों ने दुष्कर्म किए हैं, उसी प्रकार कर्मवश वहां दुःख भोगने के लिए आये हुए हो देखो, जिन पुत्र आदि को तुम लोगों ने पालन किया वे तो तुम्हें छोड़कर चले गए। अब उन पापों को तुम लोगों को ही भोगना है। इसमें दुःख करने की क्या आवश्यकता है ॥४७-४८½॥ तुम लोगों ने जैसे अत्यन्त घोर पापों को किया है वैसे ही दुःख अब प्राप्त हुए हैं, तो अब यहां दुःखी क्यों हो रहे हो? विचारो तो सही, पहले जिस समय पाप कर्म किये उस समय 'यम इसका दंड अवश्य देगें' इसका विचार क्या नहीं किया? यम दरिद्र, मूर्ख, पंडित, धनी, भय-भीत कायर और वीर सबके प्रति समान न्याय करते हैं ॥४९-५१½॥ उस समय चित्र गुप्त की उन बातों को सुनकर के पापी अपने पाप-कर्मों पर अनुताप करते हुए भयभीत हो चुप चाप बैठे रहते हैं ॥५२½॥ यम के आज्ञापालक, क्रूर, भयानक चण्ड, चाण्डाल आदि दूत उन पापियों को पकड़कर बलात् नरक कुण्डों में फेंक देते हैं। वहाँ अपने पापों को वे भलीभांति भोगते और कुछ शेष रह जाने पर इस भूतल पर आकर स्थावर आदि योनियों में जन्म लेते हैं ॥५३-५४½॥