भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

एकविंशोऽध्यायः १६६ शुश्रूषां कुरुते यस्तु यतीनां व्रतचारिणाम् । द्विज्याग्र्यब्राह्मणानां च स यात्यति सुखान्वितः ॥२६॥ सर्वभूतदयायुक्तः पूज्यमानोऽमरैर्द्विजः । सर्वभोगान्वितेनासौ विमानेन प्रयाति च ॥२७॥ विद्यादानरतो याति पूज्यमानोऽब्जसूनुभिः । पुराणपाठको याति स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२८॥ एवं धर्मपरा यांति सुखं धर्मस्य मंदिरम् । यमश्चतुर्मुखो भूत्वा शंखचक्रगदासिभृत् ॥२९॥ पुण्यकर्मरतं सम्यक्स्नेहान्मित्रमिवार्चति । भो भो बुद्धिमतां श्रेष्ठ नरकक्लेशभीरवः ॥३०॥ युष्माभिः साधितं पुण्यमत्रामुत्रसुखावहम् । मनुष्यजन्म यः प्राप्य सुकृतं न करोति च ॥३१॥ स एव पापिनां श्रेष्ठ आत्मघातं करोति च । अनित्यं प्राप्य मानुष्यं नित्यं यस्तु न साधयेत् ॥३२॥ स याति नरकं घोरं कोऽन्यस्तस्मादचेतनः । शरीरं यातनारूपं मलाद्यैः परिदूषितम् ॥३३॥ तस्मिन्यो याति विश्वासं तं विद्यादात्मघातकम् । सर्वेषु प्राणिनः श्रेष्ठास्तेषु वै बुद्धिजीविनः ॥३४॥ बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणास्तथा । ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ॥३५॥ कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः । ब्रह्मवादिष्वपि तथा श्रेष्ठो निर्मम उच्यते ॥३६॥ एतेभ्योऽपि परो ज्ञेयो नित्यं ध्यानपरायणः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥३७॥ सर्वत्र पूज्यते जंतुर्धर्मवान्नात्र संशयः । गच्छ स्वपुण्यैर्मत्स्थानं सर्वभोगसमन्वितम् ॥३८॥ अस्ति चेद्दुष्कृतं किंचित्पश्चादत्रैव भोक्ष्यसे । एवं यमस्तमभ्यर्च्य प्रापयित्वा च सद्गतिम् ॥३९॥ आहूय पापिनश्चैव कालदंडेन तर्जयेत् । प्रलयांबुदनिर्घोषो ह्यंजनाद्रिसमप्रभः ॥४०॥ को जाता है ॥२५॥ जो व्रती यतियों और उत्तम ब्राह्मणों की शुश्रूषा करता है, वह अत्यन्त सुखपूर्वक जाता है ॥२६॥ जो द्विज सब प्राणियों पर दया दृष्टि रखता है वह देवों से पूजित हो सब सुख सामग्रियों से पूर्ण विमान पर आरूढ़ होकर जाता है ॥२७॥ विद्या दान करने वाला व्यक्ति ब्रह्मा से पूज्यमान होकर जाता है, पुराण का पाठ करने वाला व्यक्ति जब चलता है तो मुनीश्वर उसकी स्तुति करते चलते हैं ॥२८॥ इस प्रकार धार्मिक जन सुखपूर्वक धर्म मन्दिर को जाते हैं । वहाँ यमराज चतुर्मुख का रूप धारण कर हाथ में शंख, चक्र, गदा और तलवार लेकर पुण्यकर्मों में रुचि रखने वाले उन महापुरुषों की भली-भाँति प्रेम पूर्वक मित्र के समान सम्मान करते हैं । वे कहते हैं कि हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! तुम लोग नरक के भय से पुण्य कर्मों को किया है इसीलिए वे कर्म दोनों लोकों के लिए सुखदायक सिद्ध हुए ॥२९-३०॥ जो मानव जन्म पाकर भी शुभ कर्म नहीं करता है वही महान् पापी है, वह आत्म-हनन करता है । जो इस अनित्य मानुष योनि को पाकर नित्य तत्त्व (धर्म), की साधना नहीं करता वह घोर नरक में जाता हैं । उससे बढ़कर चेतनाहीन कौन हो सकता है ? ॥३१-३२॥ यह शरीर यातना की मूर्ति है, मल आदि से दूषित है ऐसे शरीर पर जो विश्वास करता अर्थात् इसको नित्य और सुख का साधन समझता है उसको आत्मघातक समझना चाहिए । सारी सृष्टि में प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ है, बुद्धिजीवियों (चेतन) में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में ब्राह्मण, ब्राह्मणों में विद्वान् और विद्वानों में कृतबुद्धि (विवेकी), कृत बुद्धियों में कर्त्ता और कर्त्ताओं (कर्मपरायणों) में ब्रह्मवादी और ब्रह्मवादियों में निर्मम व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है ॥३३-३६॥ इनसे भी नित्य धर्मपरायण व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है । इसलिए सब प्रकार से धर्म संग्रह करना चाहिए। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि धर्मवान् व्यक्ति सर्वत्र पूजित होता है । इसलिए अपने पुण्य से उपार्जित मेरे पुण्य स्थान पर जाओ, जहाँ सारे ऐश्वर्य भरे पड़े हैं ॥३७-३८॥ यदि कोई दुष्कृत होगा तो उसको भी पुण्य भोग के अनन्तर यहीं भोगना पड़ेगा । इस प्रकार पुण्यात्माओं की पूजाकर उनको सब गति दे देने के पश्चात महाराज यम पापियों को बुलाकर अपने कालदण्ड से तर्जन करते हैं । उस समय यम प्रलय कालीन मेघ के समान गर्जन करने लगते हैं । उनका आकार अंजन (नील) गिरि के