बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ नारदीयपुराणम् अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । यो देवः सर्वलोकानामंतरात्मा जगन्मयः । सर्वकर्मफलं भुङ्क्ते परिपूर्णः सनातनः ॥७०॥ योऽसौ विश्वंभरो देवो गुणभेदव्यवस्थितः । सृजत्यवति चात्त्येतत्सर्वं सर्वभृगव्ययः ॥७१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे यमदूतकृत्यनिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः ॥३१॥ अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच एवं कर्मपाशनियंत्रित जतवः स्वर्गादिपुण्यस्थानेषु पुण्यभोगमनुभूय यातनासु चातीव दुःखतरं पापफल- मनुभूय प्रक्षीणकर्मावशेषेणामुं लोकमागत्य सर्वभयविह्वलेषु मृत्युबाधासंयुतेषु स्थावरादिषु जायन्ते । वृक्षगुल्मलतावल्लीगिरयश्च तृणानि च । स्थावराश्चेति विख्याता महामोहमसावृताः ॥१॥ स्थावरत्वे पृथिव्यामुप्तबीजानि जलसेकानुपदं सुसंस्कारसामग्रीवशादन्तरूष्मप्रपाविताक्युच्छून्तरत्वमापद्ये ततो मूलभावं तन्मूलादंकुरोत्पत्तिस्तस्मादपि पर्णकांडनालादिकं कांडेपु च प्रसवमापद्यते तेषु च पुष्पसंभवः ॥२॥ तानि पुष्पाणि कानिचिदफलानि कानिचित्फलहेतुभूतानि तेषु पुष्पेषु वृद्धभावेषु सत्सु तत्पुष्पमूलतस्तुषोत्पत्तिर्जायते तेषु तुषु भोक्तॄणां प्राणिनां संस्कारसामग्रीवशाद्धिमरश्मिकरणा- का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है । जो जगन्मय, सर्वलोकान्तरात्मा, परिपूर्ण सनातन देव है, वे सब कर्मों का फल भोग करते हैं । जो ये विश्वम्भर देव हैं, जो गुण-भेद से स्थित हैं, वे सर्वभुक् अव्यय इस सारी सृष्टि को बनाते और पालते हैं ॥६८-७१॥ श्रीनारदीयमहापुराण में यमदूतकृत्यनिरूपण नामक इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३१॥ अध्याय ३२ भवाटवी का वर्णन सनक बोले—इस प्रकार कर्म पाश में बँधा हुआ जीव स्वर्गादि पुण्य स्थानों में पुण्य भोग का अनुभव कर, यातना स्थानों में अति कष्टप्रद पाप-फलों का अनुभव करके कुछ कर्मों के शेष रह जाने पर इस लोक में आते हैं और सब प्रकार के भय से युक्त, मृत्यु बाधा से विजड़ित स्थावरादि योनियों में उत्पन्न होते हैं । वृक्ष, झुर- मुट, लता, वल्लरी, पहाड़ और तृण ये स्थावर नाम से प्रसिद्ध हैं जो महामोह से आवृत हैं ॥१॥ स्थावर की दशा में पृथ्वी में बोये गए बीज सिञ्चन के बाद अपने संस्कारवश, अन्तः उष्णता के कारण कुछ आर्द्र होकर बढ़ जाते हैं । फिर उनमें से जड़े निकलतीं, जड़ों से अंकुर, अंकुर से पत्तियाँ, डंठल और नाल आदि निकलते हैं । कांडों से प्रसव (कलियाँ) और इससे फूल निकलते हैं ॥२॥ उन फूलों में से कुछ तो फल देने में असमर्थ, कुछ फल देने के योग्य होते हैं । वे फूल जब पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं तब पुष्प मूल से तुष (रस) निकलता है उन तुषों में भोक्ता प्राणी के संस्कारवश चन्द्रमा की किरणों के संयोग से उसका ओषधि-रस तुष के भीतर मिल