बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
२१२ नारदीयपुराणम् तपः पूजाध्यानपरो यस्त्वसूयारतो भवेत् । तत्तपः सा च पूजा च तद्ध्यानं हि निरर्थकम् ॥४०॥ तस्मात्सर्वात्मकं विष्णुं शमादिगुणतत्परः । मुक्त्यर्थमर्चयेत्सम्यक् क्रियायोगपरो नरः ॥४१॥ कर्मणा मनसा वाचा सर्वलोकहिते रतः । समर्चयति देवेशं क्रियायोगः स उच्यते ॥४२॥ नारायणं जगद्योनिं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । स्तोत्राद्यैः स्तौति यो विष्णुं कर्मयोगी स उच्यते ॥४३॥ उपवासादिभिश्चैव पुराणश्रवणादिभिः । पुष्पाद्यैश्चार्चनं विष्णोः क्रियायोग उदाहृतः ॥४४॥ एवं भक्तिमतां विष्णौ क्रियायोगरतात्मनाम् । सर्वपापानि नश्यंति पूर्वजन्मार्जितानि वै ॥४५॥ पापक्षयाच्छुद्धमतिर्वाञ्छति ज्ञानमुत्तमम् । ज्ञानं हि मोक्षदं ज्ञेयं तदुपायं वदामि ते ॥४६॥ चराचरात्मके लोके नित्यं चानित्यमेव च । सम्यग् विचारयेद्धीमात्सद्भिः शास्त्रार्थकोविदैः ॥४७॥ अनित्यास्तु पदार्था वै नित्यमेको हरिः स्मृतः । अनित्यानि परित्यज्य नित्यमेव समाश्रयेत् ॥४८॥ इहामुत्र च भोगेषु विरक्तश्च तथा भवेत् । अविरक्तो भवेद्यस्तु स संसारे प्रवर्तते ॥४९॥ अनित्येषु पदार्थेषु यस्तु रागी भवेन्नरः । तस्य संसारविच्छित्तिः कदाचिन्नैव जायते ॥५०॥ शमादिगुणसम्पन्नो मुमुक्षुर्ज्ञानमभ्यसेत् । शमादिगुणहीनस्य ज्ञानं नैव च सिध्यति ॥५१॥ रागद्वेषविहीनो यः शमादिगुणसंयुतः । हरिध्यानपरो नित्यं मुमुक्षुरभिधीयते ॥५२॥ चतुर्भिः साधनैरेभिर्विशुद्धमतिरुच्यते । सर्वगं भावयेद्विष्णुं सर्वभूतदयापरः ॥५३॥ क्षराक्षरात्मकं विश्वं व्याप्य नारायणः स्थितः । इति जानाति यो विप्र तज्ज्ञानं योगजं विदुः ॥५४॥ योगोपायमतो वक्ष्ये संसारविनिवर्त्तकम् । योगं ज्ञानं विशुद्धं स्यात्तज्ज्ञानं मोक्षदं विदुः ॥५५॥ [ और वह सब प्रकार के पापियों के बराबर है ॥३६॥ जो तप, ध्यान और पूजा करता हुआ भी असूया का त्याग नहीं करता है, उसकी वह तपस्या, पूजा और ध्यान निरर्थक है ॥४०॥ इसलिए कर्मयोगी विधिपूर्वक शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर सर्वात्मक विष्णु की मुक्ति के लिए पूजा करे ॥४१॥ मन, वचन और कर्म से जो लोक- कल्याण में लीन रहता है; वह मानो देवेश की भली भाँति अर्चा करता है और उसी को क्रिया-योग कहते हैं ॥४२॥ जो जगत् के आदि कारण, सर्वान्तर्यामी, हरि, विष्णु की स्तोत्र आदि से स्तुति करता है, वह कर्मयोगी कहा जाता है ॥४३॥ उपवास आदि व्रत, पुराण-श्रवण और पुष्प, धूप आदि से विष्णु का अर्चन हो क्रियायोग कहा गया है ॥४४॥ इस प्रकार भक्ति पूर्वक क्रिया योग में रत रहने वाले भक्तों के पूर्व जन्माजित सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४५॥ पाप-क्षय से शुद्ध बुद्धि वाले व्यक्ति उत्तम ज्ञान की ही कामना करते हैं । ज्ञान मोक्ष देने वाला है । इसलिए ज्ञान प्राप्ति का उपाय तुमको बतला रहा हूँ ॥४६॥ धीमान् व्यक्ति शास्त्र-तत्त्व जानने वाले सज्जनों से उपदेश प्राप्त कर इस चराचरात्मक लोक में नित्य, अनित्य को पहचाने ॥४७॥ संसार के सब पदार्थ अनित्य हैं, केवल एक हरि ही नित्य हैं। अनित्य को छोड़कर नित्य को ही अपनाना चाहिए ॥४८॥ लौकिक और स्वर्गीय भोगों से सदा विरक्त रहना चाहिए । जो भोगों से विरक्त नहीं रहता, वह संसार में जन्म लेता है ॥४९॥ जो मनुष्य अनित्य पदार्थों से अनुराग करता है, उसका संसार के माया- बन्धन से वियोग नहीं होता । वह उसी से बँधा रहता है ॥५०॥ मुक्ति के इच्छुक शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर ज्ञान का अवश्य अभ्यास करें । शम, दम आदि गुणों से हीन व्यक्ति को ज्ञान-प्राप्ति कभी नहीं होती ॥५१॥ राग-द्वेष से हीन, शम आदि गुणों से युक्त और नित्य प्रति भगवान् का चिन्तन करने वाला व्यक्ति ही मुमुक्षु कहा जाता है ॥५२॥ इन चार साधनों से ही विमल बुद्धि होती है, ऐसा शास्त्रीय कथन है । सब प्राणियों के प्रति दया भाव रखकर सर्वत्र व्यापक विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥५३॥ विप्र ! भगवान् नारायण क्षराक्षरात्मक (जड चेतनमय) संसार में व्याप्त होकर रहते हैं ऐसा जिसको ज्ञान हो जाता है, उसको योगज ज्ञान कहते हैं ॥५४॥ इसके आगे अब संसार से मुक्ति दिलाने वाले योगोपाय को बतला रहा हूँ । विशुद्ध ज्ञान ही योग
२१३ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः आत्मानं द्विविधं प्राहुः परापरविभेदतः । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः ॥५६॥ परस्तु निर्गुणः प्रोक्तो ह्यहंकारयुतोऽपरः । तयोरभेदविज्ञानं योग इत्यभिधीयते ॥५७॥ पंचभूतात्मके देहे यः साक्षी हृदये स्थितः । अपरः प्रोच्यते सद्भिः परमात्मा परः स्मृतः ॥५८॥ शरीरं क्षेत्रमित्याहुस्तत्स्थः क्षेत्रज्ञ उच्यते । अव्यक्तः परमः शुद्धः परिपूर्ण उदाहृतः ॥५९॥ यदा त्वभेदविज्ञानं जीवात्मपरमात्मनोः । भवेत्तदा मुनिश्रेष्ठ पाशच्छेदोऽपरात्मनः ॥६०॥ एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः परमात्मा जगन्मयः । नृणां विज्ञानभेदेन भेदवानिव लक्ष्यते ॥६१॥ एकमेवाद्वितीयं यत्परं ब्रह्म सनातनम् । गीयमानं च वेदांन्तैस्तस्मान्नास्ति परं द्विज ॥६२॥ न तस्य कर्म कार्यं वा रूपं वर्णमथापि वा । कर्तृत्वं वापि भोक्तृत्वं निर्गुणस्य परात्मनः ॥६३॥ निदानं सर्वहेतूनां तेजो यत्तेजसां परम् । किमप्यन्यद्यतो नास्ति तज्ज्ञेयं मुक्तिहेतवे ॥६४॥ शब्दब्रह्ममयं यत्तन्महावाक्यादिकं द्विज । तद्विचारोद्भवं ज्ञानं परं मोक्षस्य साधनम् ॥६५॥ सम्यग्ज्ञानविहीनानां दृश्यते विविधं जगत् । परमज्ञानिनामेतत्परब्रह्मात्मकं द्विज ॥६६॥ एक एव परानन्दो निर्गुणः परतः परः । भाति विज्ञानभेदेन बहुरूपधरोऽव्ययः ॥६७॥ मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमात्मनि । तस्मान्मायां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजसत्तम ॥६८॥ नासद्रूपा न सदरूपा माया नैवोभयात्मिका । अनिर्वाच्या ततो ज्ञेया भेदबुद्धिप्रदायिनी ॥६९॥ मायैव ज्ञानशब्देन बुद्ध्यते मुनिसत्तम । तस्मादज्ञानविच्छेदो भवेदै जितमायिनाम् ॥७०॥ सनातनं परं ब्रह्म ज्ञानशब्देन कथ्यते । ज्ञानिनां परमात्मा वै हृदि भाति निरन्तरम् ॥७१॥ है, वही ज्ञान मोक्ष दाता कहा गया है ॥५५॥ पर और अपर भेद से आत्मा के दो प्रकार कहे गये हैं। 'दो ब्रह्म जानने योग्य हैं' ऐसा अथर्ववेद का वचन है ॥५६॥ निर्गुण को पर और अहंकार से युक्त आत्मा को अपर कहा गया है । उन दोनों में अभेद बुद्धि रखना ही योग है ॥५७॥ इस पंचभूतात्मक देह में जो साक्षी रूप से हृदय में निवास करता है उसको सज्जन अपर कहते हैं और परमात्मा को पर कहते हैं ॥५८॥ शरीर को क्षेत्र और शरीरस्थ आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। वह अव्यक्त, पूर्ण परम और शुद्ध है ॥५६॥ मुनिश्रेष्ठ ! जिस समय मनुष्य को जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान हो जाता है उस समय अपरात्मा (जीव) को मुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥६०॥ एक शुद्ध, अक्षर, नित्य, जगन्मय परमात्मा ही ज्ञान भेद से मनुष्य को भिन्न सा प्रतीत होता है ॥६१॥ द्विज ! जिस एक, अद्वितीय, पर सनातन ब्रह्म का वेदान्तों ने वर्णन किया है उससे पर दूसरा कोई पदार्थ नहीं है ॥६२॥ उस निर्गुण परमात्मा का कर्म, कार्य, रूप अथवा वर्ण कुछ भी नहीं है, और न तो वह कर्त्ता या भोक्ता हो है। वह सब कारणों का कारण और सब उत्कृष्ट तेज से भी उत्कृष्ट तेज है । जिसके अतिरिक्त अन्य कोई पदार्थ नहीं है वही पर ब्रह्म मुक्ति-प्राप्ति के लिये ज्ञेय (कारण) है ॥६३-६४॥ द्विज ! शब्द ब्रह्म के समर्थक जितने महावाक्य हैं उनके विवेचन से प्राप्त पर ज्ञान ही मोक्ष का साधन है । द्विज ! परब्रह्मस्वरूप यह जगत् सम्यग्ज्ञान से शून्य अथवा अज्ञानियों को ही विविधरूपों में दिखाई पड़ता है ॥६५-६६॥ एक ही परानन्द, निर्गुण, परतः पर अव्यय विज्ञान भेद से बहुरूपधारो जान पड़ता है ॥६७॥ मायाबद्ध मनुष्य माया के प्रभाव से परमात्म में भिन्नता देखते हैं। इसलिए, द्विजवर्य ! मुमुक्षु योग द्वारा माया को छोड़े ॥६८॥ माया न तो सद्प है, न असद्रूप और न सदसद्रूपा ही है, उस भेद बुद्धि प्रदान करने वाली माया को अनिर्वचनीय समझना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञान के द्वारा माया को हो पहचाना जाता है। तभी जितमायी (विज्ञानी) का अज्ञान दूर होता है ॥६६-७०॥ ज्ञान शब्द से सनातन पर ब्रह्म का हो निर्देश है। ज्ञानियों के हृदय में परमात्मा सर्वदा विराजमान रहता है। मुनिवर्य ! योगी अपने योगबल से अज्ञान का नाश करे ॥७१॥
२१४ नारदीयपुराणम् अज्ञानं नाशयेद्योगी योगेन मुनिसत्तम । अष्टांगैः सिद्ध्यते योगस्तानि वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥७२॥ यमाश्च नियमाश्चैव आसनानि च सत्तम । प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानमेव च ॥७३॥ समाधिश्च मुनिश्रेष्ठ योगाङ्गानि यथाक्रमम् । एषां संक्षेपतो वक्ष्ये लक्षणानि मुनीश्वर ॥७४॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अक्रोधश्चानसूया च प्रोक्ताः संक्षेपतो यमाः ॥७५॥ सर्वेषामेव भूतानामक्लेशजननं हि यत् । अहिंसा कथिता सद्भिर्योगसिद्धिप्रदायिनी ॥७६॥ यथार्थकथनं यच्च धर्माधर्मविवेकतः । सत्यं प्राहुर्मनिश्रेष्ठ अस्तेयं शृणु साम्प्रतम् ॥७७॥ चौर्येण वा बलेनापि परस्वहरणं हि यत् । स्तेयमित्युच्यते सद्भीरस्तेयं तद्विपर्ययम् ॥७८॥ सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रकीर्तितम् । ब्रह्मचर्यपरित्यागाज्ज्ञानवानपि पातकी ॥७६॥ सर्वसंगपरित्यागी मैथुने यस्तु वर्तते । स चंडालसमो ज्ञेयः सर्ववर्णबहिष्कृतः ॥८०॥ यस्तु योगरतो विप्र विषयेषु स्पृहान्वितः । तत्संभाषणमात्रेण ब्रह्महत्या भवेन्नृणाम् ॥८१॥ सर्वसंगपरित्यागी पुनः संगो भवेद्यदि । तत्संगसंगिनां संगान्महापातकदोषभाक् ॥८२॥ अनादानं हि द्रव्याणामापद्यपि मुनीश्वर । अपरिग्रह इत्युक्तो योगसिद्धिकारकः ॥८३॥ आत्मनस्तु समुत्कर्षादितिनिष्ठुरभाषणम् । क्रोधमाहुर्धर्मविदो ह्यक्रोधस्तद्विपर्ययः ॥८४॥ धनाद्यैरधिकं दृष्ट्वा भृशं मनसि तापनम् । असूया कीर्तिता सद्भिस्तत्त्यागो ह्यनसूयता ॥८५॥ एवं संक्षेपतः प्रोक्ता यमा विबुधसत्तम । नियमानपि वक्ष्यामि तुभ्यं ताञ्छृणु नारद ॥८६॥ तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचं च हरिपूजनम् । संध्योपासनमुख्याश्च नियमाः परिकीर्त्तिताः ॥८७॥
योग अष्टांगों द्वारा ही सिद्ध होता है उनको अब यथार्थ रूप से बतला रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये ही क्रमशः योग के अंग हैं। मुनीश्वर ! संक्षेप में इनका लक्षण कह रहा हूँ ॥७२-७४॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अक्रोध और अनसूया ये ही संक्षेप में यम कहे गए हैं ॥७५॥ मनीषियों ने कहा है कि सभी प्राणियों को किसी प्रकार का कष्ट देना ही अहिंसा है जो कि मनुष्य को योगसिद्धि प्रदान करने वाली है ॥७६॥ मुनिश्रेष्ठ ! धर्म अधर्म का विचार कर जिसको जैसे देखा जाय उसको उसी रूप में कह देना ही सत्य है। अब अस्तेय की परिभाषा सुनिए। शिष्ट पुरुषों ने कहा है कि चोरी से या बलपूर्वक किसी का धन छीन लेना ही स्तेय है, इसके विपरीत अस्तेय है ॥७७-७८॥ कहीं किसी भी अवस्था में मैथुन न करना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य के त्याग से ज्ञानी भी पापी है ॥७६॥ सब संग (आसक्ति) का परित्याग करने वाला व्यक्ति भी यदि मैथुन करता है तो वह सब वर्णों से बहिष्कृत है, उसको चाण्डाल के समान जानना चाहिए ॥८०॥ विप्र! जो योगरत रहने पर भी विषय वासना की इच्छा करता है उससे बातचीत करने से भी मनुष्य को ब्रह्महत्या का पाप लगता है। सब प्रकार की आसक्तियों का त्याग करने वाला व्यक्ति यदि फिर रागी बन जाय उसके सहकर्मी या संगियों की संगति से भी महापाप का दोषभागी बनना पड़ता है ॥८१-८२॥ मुनीश्वर ! आपत्ति में भी किसी दूसरे से कुछ न लेना अपरिग्रह कहा गया है जिसके पालन से योगसिद्धि मिल जाती है ॥८३॥ अपने उत्कर्ष के अभिमान से जो निष्ठुर भाषण किया जाता है उसको क्रोध कहते हैं इसके विपरीत अक्रोध कहा जाता ॥८४॥ धनादि से किसी को अपने से अधिक देखकर जो मन में अधिक सन्ताप होता है उसको असूया कहते हैं, उसका परित्याग करना अनसूया कहा जाता है। ॥८५॥ बुधश्रेष्ठ ! इस प्रकार संक्षेप में यमों का वर्णन कर दिया गया, नारद! अब नियमों को बता रहा हूँ उसको सुनो ॥८६॥ तप, स्वाध्याय, सन्तोष, शौच, हरिपूजन और मुख्यरूप से सन्ध्योपासन ये नियम कहे गए हैं ॥८७॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१५ चांद्रायणादिभिर्यत्र शरीरस्य विशोषणम् । तपो निगदितं सद्भिर्योगसाधनमुत्तमम् ॥८८॥ प्रणवस्योपनिषदां द्वादशार्णस्य च द्विज । अष्टाक्षरस्य मंत्रस्य महावाक्यचयस्य च ॥८९॥ जपः स्वाध्याय उदितो योगसाधनमुत्तमम् । स्वाध्यायं यस्त्यजेन्मूढस्तस्य योगो न सिध्यति ॥९०॥ योगं विनापि स्वाध्यायात्पापनाशो भवेन्नृणाम् । स्वाध्यायैस्तोष्यमाणाश्च प्रसीदंति हि देवताः ॥९१॥ जपस्तु त्रिविधः प्रोक्तो वाचिकोपांशुमानसः । त्रिविधेऽपि च विप्रेन्द्र पूर्वात्पुवत्परो वरः ॥९२॥ मंत्रस्योच्चारणं सम्यक्स्फुटाक्षरपदं यथा । जपस्तु वाचिकः प्रोक्तः सर्वयज्ञफलप्रदः ॥९३॥ मंत्रस्योच्चारणे किंचित्पदात्पदविवेचनम् । स तूपांशर्जपः प्रोक्तः पूर्वस्माद्द्विगुणोऽधिकः ॥९४॥ विधाय हृद्यक्षरश्रेण्यां तत्तदर्थविचारणम् । स जपो मानसः प्रोक्तो योगसिद्धिप्रदायकः ॥९५॥ जपेन देवता नित्यं स्तुवतः संप्रसीदति । तस्मात्स्वाध्यायसंपन्नो लभेत्सर्वान्मनेारथान् ॥९६॥ यदृच्छालाभसंतुष्टिः संतोष इति गीयते । संतोषहीनः पुरुषो न लभेच्छर्म कुत्रचित् ॥९७॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । इतोऽधिकं कदा लप्स्य इति कामस्तु वर्द्धते ॥९८॥ तस्मात्कामं परित्यज्य देहसंशोषकारणम् । यदृच्छालाभसंतुष्टो भवेद्धर्मपरायणः ॥९९॥ बाह्याभ्यन्तरभेदेन शौचं तु द्विविधं स्मृतम् । मृज्जलाभ्यां बहिः शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥१००॥ अन्तःशुद्धिविहीनस्तु येऽध्वरा विविधाः कृताः । न फलंति मुनिश्रेष्ठ भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥१०१॥ भावशुद्धिविहीनानां समस्तं कर्म निष्फलम् । तस्माद्रागादिकं सर्वं परित्यज्य सुखी भवेत् ॥१०२॥ मृदा भारसहस्रैस्तु कुम्भकोटिजलैस्तथा । कृतशौचोऽपि दुष्टात्मा चंडालसदृशः स्मृतः ॥१०३॥ चान्द्रायण आदि व्रत द्वारा शरीर के शोषण को महात्माओं ने उत्तम योग साधन और तप कहा है ॥८८॥ ओंकार उपनिषद्, द्वादशाक्षर मन्त्र, अष्टाक्षर मन्त्र और जिस (सम्प्रदाय) के जो महावाक्य हैं, उनका जप ही स्वाध्याय है जो कि उत्तम योग साधन है । जो मूढ़ स्वाध्याय का त्याग कर देता है उसका योग कभी भी सिद्ध नहीं होता ॥८९-९०॥ बिना योग के भी केवल स्वाध्याय से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं । स्वाध्याय के द्वारा जिन देवताओं की स्तुति की जाती है, वे अवश्य प्रसन्न होते हैं ॥९१॥ जप, वाचिक उपांशु, और मानस भेद से तीन प्रकार का होता है। इस त्रिविध जप में पूर्वपेक्षा पर श्रेष्ठ माना गया है ॥९२॥ जिस जप में मन्त्र के अक्षरों, पदों का स्फुट रूप से भलीभाँति उच्चारण किया जाता है उसको वाचिक जप कहा जाता है, ऐसा जप सब यज्ञों के फल को देने वाला है । जिस जप में मन्त्रोच्चारण करते समय मंत्रपदों का कुछ विवेचन किया जाता है उसको उपांशु जप कहते हैं । यह पूर्व वाचिक जप से दुगुना अधिक फल देने वाला है । अक्षरों की पृथक्-पृथक् श्रेणी बनाकर उसके अर्थों पर ध्यान देकर मन में ही जप करना मानस जप कहा है। यह जप योगसिद्धि को देने वाला है । जप द्वारा देवताओं की स्तुति करने पर देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं । इसलिए स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता है ॥८३-९६॥ जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना सन्तोष कहा जाता है । संतोष हीन व्यक्ति कभी और कहीं सुख नहीं पा सकता ॥९७॥ विषयोपभोग से कभी भी इच्छा-तृप्ति नहीं होती । इसमें तो 'इससे अधिक कब प्राप्त करूंगा' ऐसी इच्छा बनी ही रहती है, जिससे दिनों दिन काम (इच्छा) बढ़ता ही रहता है । इसलिए देह को सुखा देने वाले को छोड़कर सर्वदा श्रम से जो कुछ मिल जाय उसी पर सन्तोष करना चाहिए ॥९८-९९॥ बाह्य और आभ्यन्तर भेद से शौच दो प्रकार का होता है । मिट्टी और जल से की हुई शुद्धि बाह्य- शुद्धि और भावशुद्धि आभ्यन्तर शुद्धि है ॥१००॥ मुनिश्रेष्ठ ! अन्तःशुद्धि विहीन मनुष्यों के किए हुए विविध-यज्ञ राख में दी हुई आहुति की भाँति कभी भी फलदायक नहीं होते ॥१०१॥ बिना भावशुद्धि के सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं । इस लिए रागादि का परित्याग करके ही मनुष्य सुखी होता है ॥१०२॥ हजारों मन मिट्टी और करोड़ों घड़ों के जल से शुद्धि करने पर भी दुष्टात्मा व्यक्ति चाण्डाल के समान ही माना जाता
२१६ नारदीयपुराणम् अंतःशुद्धिविहीनस्तु देवपूजापरो यदि । तमेव दैवतं हंति नरकं च प्रपद्यते ॥१०४॥ अंतःशुद्धिविहीनश्च बहिः शुद्धिं करोति यः । अलंकृतः सुराभाण्ड इव शांतिं न गच्छति ॥१०५॥ मनःशुद्धिविहीना ये तीर्थयात्रां प्रकुर्वते । न तान्पुनंति तीर्थानि सुराभांडमिवापगा ॥१०६॥ वाचा धर्मान्प्रवदति मनसा पापमिच्छति । जानीयातं मुनिश्रेष्ठ महापातकिनां वरम् ॥१०७॥ विशुद्धमानसा ये तु धर्ममात्रमनुत्तमम् । कुर्वंति तत्फलं विद्यादक्षयं सुखदायकम् ॥१०८॥ कर्मणा मनसा वाचा स्तुतिश्रवणपूजनैः । हरिभक्तिर्दृढा यस्य हरिपूजेति गीयते ॥१०८॥ यमाश्च नियमाश्चैव संक्षेपेण प्रबोधिताः । एभिर्विशुद्धमनसां मोक्षं हस्तगतं विदुः ॥११०॥ यमैश्च नियमैश्चैव स्थिरबुद्धिर्जितेन्द्रियः । अभ्यसेदासनं सम्यग्योगसाधनमुत्तमम् ॥१११॥ पद्मकं स्वस्तिकं पीठं सैंहं कौक्कुटकौजरे । कौमं वज्रासनं चैव वाराहं मृगचैलिकम् ॥११२॥ क्रौञ्चं च नालिकं चैव सर्वतोभद्रमेव च । वार्षभं नागमात्स्ये च वैयाघ्रं चार्द्धचन्द्रकम् ॥११३॥ दंडवातासनं शैलं स्वभ्रं मौद्गरमेव च । माकरं त्रैपथं काष्ठं स्थाणुं वैकर्णिकं तथा ॥११४॥ भौमं वीरासनं चैव योगसाधनकारणम् । त्रिंशत्संख्यान्यासनानि मुनीन्द्रैः कथितानि वै ॥११५॥ एषामेकतमं बद्ध्वा गुरुभक्तिपरायणः । उपासको जयेत्प्राणान्द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ॥११६॥ प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि तथा प्रत्यङ्मुखोऽपि वा । अभ्यासेन जयेत्प्राणान्निःशब्दे जनवर्जिते ॥११७॥ प्राणो वायुः शरीरस्थ आयामस्तस्य निग्रहः । प्राणायाम इति प्रोक्तो द्विविधः स प्रकीर्त्तितः ॥११८॥ है ॥१०३॥ अन्तः शुद्धि के बिना जो व्यक्ति देवपूजा करता है, देवता उसी का सर्वनाश करते हैं और वह नरक- गामी भी होता है ॥१०४॥ जो अन्तःशुद्धि के बिना बाह्यशुद्धि पर ही ध्यान देता है वह ऊपर से सजाये हुए मदिरा पात्र के समान है और ऐसे दम्भी को शान्ति कभी भी नहीं मिलती ॥१०५॥ जो व्यक्ति बिना मन को शुद्ध किए तीर्थ यात्रा करता है, उसको तीर्थ उसी प्रकार पवित्र करने में असमर्थ होता है, जिस प्रकार देव-सरिता मदिरा से भरे पात्र को ॥१०६॥ जो वाणी द्वारा धर्म का उपदेश देता है और हृदय से पाप करना चाहता है, मुनिश्रेष्ठ ! उसको महापापियों में शिरोमणि समझना चाहिए ॥१०७॥ जो विशुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति केवल उत्तम धर्म का पालन करता है, उसको अक्षय सुखदायक फल प्राप्त होता है ॥१०८॥ मन, वाणी, क्रिया, स्तुति, नामश्रवण और पूजा के द्वारा भगवान् में अचल भक्ति रखने को ही हरिपूजा कहते हैं । यम और नियमों को इस प्रकार संक्षेप में कह दिया। इन यम-नियमों के पालन से मनुष्यों का अन्तः करण विशुद्ध होता है और विशुद्ध अन्तःकरण वालों को मोक्ष अनायास प्राप्त हो जाता है ॥१०६-११०॥ जिते- न्द्रिय व्यक्ति यम-नियमों के अभ्यास से स्थिर बुद्धि होकर आसनों का अभ्यास भली भांति करे, जो कि उत्तम योग- साधन हैं । मुनिवरों ने पद्मक, स्वस्तिक, पीठ, सिंह, कुक्कुट, कुंजर, कूर्म्म, वज्र, वाराह, मृग, चैलिक, क्रौञ्च, नालिक, सर्वतोभद्र, वार्षभ (वृषभासन), नाग, मत्स्य, व्याघ्र, अर्द्धचन्द्र, दण्डवातासन, शैल, स्वभ्र, मौद्गर, मकर, त्रिपथ, काष्ठ, स्थाणु, वैकर्णिक, भौम और वीरासन नामक तीस आसनों का वर्णन किया है ॥१११-११५॥ इसमें से किसी एक आसन का अभ्यास करके भी गुरुभक्तिनिष्ठ उपासक प्राण पर अधिकार कर सकता और मात्सर्य तथा द्वन्द्व को जीत सकता है। नीरव और निर्जन स्थान में पूर्व उत्तर या पश्चिमाभिमुख हो आसन लगाकर अभ्यास के द्वारा प्राण वायु पर अधिकार करना चाहिए ॥११६-११७॥ शरीर-सञ्चारी वायु को प्राण कहा जाता है। आयाम का अर्थ उसका निग्रह करना है। इस प्रकार प्राण को वश में करना ही प्राणायाम कहा जाता है । यह दो प्रकार का होता है ; अगर्भ और सगर्भ । इनमें
त्रयस्त्रिंंशोऽध्यायः २१७ अगर्भश्च सगर्भश्च द्वितीयस्तु तयोर्वरः। जपध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वितः ॥११६॥ रेचकः पूरकश्चैव कुंभकः शून्यकस्तथा। एवं चतुर्विधः प्रोक्तः प्राणायामो मनीषिभिः ॥१२०॥ जंतूनां दक्षिणा नाडी पिंगला परिकीर्तिता। सूर्यदेवतका चैव पितृयोनिरिति श्रुता ॥१२१॥ देवयोनिरिति ख्याता इडा नाडी त्वदक्षिणा। तत्राधिदैवतं चंद्रं जानीहि मुनिसत्तम ॥१२२॥ एतयोरुभयोर्मध्ये सुषुम्णा नाडिका स्मृता। अतिसूक्ष्मा गुह्यतमा ज्ञेया सा ब्रह्मदैवता ॥१२३॥ वामेन रेचयेद्वायुं रेचनाद्रेचकः स्मृतः। पूरयेद्दक्षिणेनैव पूरणात्पूरकः स्मृता ॥१२४॥ स्वदेहपूरितं वायुं निगृह्य न विमुंचति। संपूर्णकुं भवत्तिष्ठेत्कुम्भकः स हि विश्रुतः ॥१२५॥ न गृह्णाति न त्यजति वायुमंतर्बहिःस्थितम्। विद्धि तच्छून्यकं नाम प्राणायामं यथास्थितम् ॥१२६॥ शनैःशनैर्विजेतव्यः प्राणो मत्तगजेन्द्रवत्। अन्यथा खलु जायन्ते महारोगा भयंकराः ॥१२७॥ क्रमेण योजयेद्वायुं योगी विगतकल्मषः। स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणः पदमाप्नुयात् ॥१२८॥ विषयेषु प्रसक्तानि चेन्द्रियाणि मुनीश्वरः। समाहृत्य निगृह्णाति प्रत्याहारस्तु स स्मृतः ॥१२६॥ जितेन्द्रिया महात्मानो ध्यानशून्या अपि द्विज। प्रयान्ति परमं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१३०॥ अनिजितेन्द्रियग्रामं यस्तु ध्यानपरो भवेत्। मूढात्मानं च तं विद्याद्ध्यानं चास्य न सिध्यति ॥१३१॥ यद्यत्पश्यति तत्सर्वं पश्येदात्मवदात्मनि। प्रत्याहृतानीन्द्रियाणि धारयेत्सा तु धारणा ॥१३२॥ योगाज्जितेन्द्रियग्रामस्तानि हृत्वा दृढं हृदि। आत्मानं परमं ध्यायेत्सर्वधातारमच्युतम् ॥१३३॥ दूसरा श्रेष्ठ है। जप-ध्यान के बिना किया हुआ प्राणायाम अगर्भ और जप के सहित सगर्भ है ॥११८-११६॥ मनीषियों ने प्राणायाम के रेचक, पूरक, कुंभक और शून्यक ये चार भेद बताये हैं ॥१२०॥ जीवों की दक्षिणनाड़ी पिंगला कही गई है। सूर्य इसका देवता और पितर योनि है। मुनिसत्तम ! वामनाड़ी इड़ा नाम से प्रसिद्ध है। चन्द्रमा इसका देवता और देव योनि है ॥१२१-१२२॥ इन दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी है। यह अति सूक्ष्म, गुह्यतम ओर ब्रह्मदैवत है। वाम नाड़ी से वायु को छोड़े। रेचन के कारण ही प्राणायाम की तीसरी क्रिया को रेचक कहा गया है, दक्षिणा से वायु को खींचे। उसी क्रिया में वायु द्वारा शरीर को पूरण किया जाता है इसलिए उसको पूरक कहा जाता है ॥१२३-१२४॥ अपनी देह में वायु को भरकर उसको छोड़ा न जाय और भरे हुए कुंभ (घड़े) के समान स्थिर रखा जाय तो इस क्रिया को कुंभक कहते हैं ॥१२५॥ शरीर के भीतर की वायु को न निकाला जाय और बाहर की वायु को न भीतर खींचा जाय ऐसी स्थिति वाली क्रिया को शून्यक नामक प्राणायाम कहते हैं ॥१२६॥ धीरे-धीरे मतवाले हाथी की भाँति प्राण को वश में करना चाहिए, अन्यथा महान् भयंकर रोग हो जाते हैं ॥१२७॥ शुद्धहृदय योगी क्रमशः वायु को वश में करे। ऐसा करने से वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है ॥१२८॥ विषयों की ओर झुकी हुई इन्द्रियों को उधर से हटाकर अपने वश में करना प्रत्याहार कहा जाता है ॥१२९॥ द्विज ! जितेन्द्रिय महात्मा ध्यानशून्य रहने पर भी परम ब्रह्म पद को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरा- गमन नहीं होता ॥१३०॥ जो इन्द्रियों पर बिना अधिकार किये ध्यान परायण होता है उसको मूढात्मा (पाखण्डी) समझना चाहिए और उसका ध्यान कभी भी सफल नहीं होता ॥१३१॥ जो जो वस्तुयें दिखाई देती हैं उनको आत्मवत् देखे। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अन्तःकरण में ही धारण करने को धारणा कहते हैं ॥१३२॥ योग के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर हृदय में अच्युत, विश्वरूप, सब लोकों के एक कारण, सबके प्रतिपालक, परम आत्मा विष्णु का ध्यान करे। विकसित कमल के समान नेत्र २८ ना० पु०
२१८ नारदीयपुराणम् सर्वविश्वात्मकं विष्णुं सर्वलोकैककारणम् । विकसत्पद्मपत्राक्षं चारुकुण्डलभूषितम् ॥१३४॥ दीर्घबाहुमुदाराङ्गं सर्वालङ्कारभूषितम् । पीताम्बरधरं देवं हेमयज्ञोपवीतिनम् ॥१३५॥ बिभ्रतं तुलसीमालां कौस्तुभेन विराजितम् । श्रीवत्सवक्षसं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥१३६॥ अष्टारे हृत्सरोजे तु द्वादशांगुलविस्तृते । ध्यायेदात्मानमव्यक्तं परात्परतरं विभुम् ॥१३७॥ ध्यानं सद्भिर्निगदितं प्रत्ययस्यैकतानता । ध्यानं कृत्वा मुहूर्त्तं वा परं मोक्षं लभेन्नरः ॥१३८॥ ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विंदति । ध्यानात्प्रसीदति हरिर्द्ध्यानात्सर्वार्थसाधनम् ॥१३६॥ यद्यद्रूपं महाविष्णोस्तत्तद्ध्यायेत्समाहितम् । तेन ध्यानेन तुष्टात्मा हरिर्मोक्षं ददाति वै ॥१४०॥ अचञ्चलं मनः कुर्याद्ध्येयवस्तुनि सत्तम । ध्यानं ध्येयं ध्यातृभावं यथा नश्यति निर्भरम् ॥१४१॥ ततोऽमृतत्वं भवति ज्ञानामृतनिषेवणात् । भवेन्निरन्तरं ध्यानादभेदप्रतिपादनम् ॥१४२॥ सुषुप्तिवत्परानन्दयुक्तश्चोपरतेन्द्रियः । निर्वातदीपवत्संस्थः समाधिरभिधीयते ॥१४३॥ योगी समाध्यवस्थायां न शृणोति न पश्यति । न जिघ्रति न स्पृशति न किंचद्वक्ति सत्तम ॥१४४॥ आत्मा तु निर्मलः शुद्धः सच्चिदानन्दविग्रहः । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो योगिनां भात्यचञ्चलः ॥१४५॥ निर्गुणोऽपि परो देवो ह्यज्ञानाद्गुणवानिव । विभात्यज्ञाननाशे तु यथापूर्वं व्यवस्थितम् ॥१४६॥ परं ज्योतिरमेयात्मा मायावानिव मायिनाम् । तन्नाशे निर्मलं ब्रह्म प्रकाशयति पंडित ॥१४७॥ एकमेवाद्वितीयं च परं ज्योतिर्निरंजनम् । सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामितया स्थितम् ॥१४८॥ वाले, मनोहर कुण्डलों से विभूषित, दीर्घ भुजा वाले, उदार अंगों वाले, सब अलंकारों से अलंकृत, पीताम्बर- धारी सुवर्ण का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, तुलसी माला को धारण किए हुए कौस्तुभमणि और श्रीवत्स से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, सुर और असुरों से पूजित, अव्यक्त, परात्पर विभु विष्णु का बारह अंगुल विस्तृत और आठ पंखुड़ियों वाले हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिए ॥१३३-१३७॥ सज्जनों ने प्रत्यय की एकतानता (ईश्वर में एकनिष्ठ हो जाने के भाव) को ही ध्यान कहा है। मनुष्य क्षण भर के ध्यान से भी पर मोक्ष को पा जाता है ॥१३८॥ ध्यान से पाप नष्ट होते और ध्यान से ही मोक्ष मिलता है । ध्यान से भगवान् प्रसन्न होते और ध्यान से सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं । महाविष्णु के जो जो रूप हैं उन उन रूपों को एकाग्र होकर ध्यान करना चाहिए । हरि इस प्रकार के ध्यान से प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करते हैं ॥१३६-१४०॥ मुनिवर्य ! ध्येय वस्तु में अपने मन को स्थिर करना चाहिए । जब ध्यान, ध्येय और ध्यातृ-भाव का सर्वथा नाश हो जाता है तब उसके बाद ज्ञान रूपी अमृत के निरन्तर पान करने से अमृतत्व की प्राप्ति होती है । निरन्तर ध्यान से अभेद ज्ञान होता है ॥१४१-१४२॥ जब मनुष्य सुषुप्ति अवस्था के समान परानन्द युक्त हो इन्द्रिय व्यापारों से स्वतः विमुख हो जाता है और उसका मन निर्वात दीप के समान स्थिर हो जाता है तो उसकी उस अवस्था को समाधि कहते है ॥१४३॥ योगी समाधि अवस्था में कुछ भी सुनता नहीं है, देखता और सूंघता भी नहीं है, उसे स्पर्श ज्ञान भी नहीं रह जाता और न तो कुछ बोलता ही है । योगियों का अन्तः करण निर्मल और शुद्ध रहता है वे स्वयं सच्चिदानन्द स्वरूप और सर्वोपाधि से मुक्त हो पर्वत की भाँति अचल रहते हैं ॥१४४-१४५॥ अज्ञानावस्था में पर देव निर्गुण होता हुआ भी गुणवान् के समान जान पड़ता है । वही अज्ञान नष्ट हो जाने पर अपने पूर्व रूप में ही दिखाई पड़ने लगता है ॥१४६॥ पंडित ! मायाबद्ध जीवों को अमेयात्मा परज्योति माया- बद्ध सा जान पड़ता है और वही मायामुक्त हो जाने पर निर्गुण पर ब्रह्म के रूप में दिखलाई पड़ने लगता है ॥१४७॥ परब्रह्म एक, अद्वितीय, परज्योति और निरंजन स्वरूप है जो कि सब प्राणियों का अन्तर्यामी
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१६ अणोरणीयान्महतो महीयान्सनातनारमाखिलविश्वहेतुः । पश्यन्ति यज्ज्ञानविदां वरिष्ठाः परात्परस्मात्परमं पवित्रम् ॥१४८॥ अकारादिक्षकारांतवर्णभेदव्यवस्थितः । पुराणपुरुषोऽनादिः शब्दब्रह्मेति गीयते ॥१५०॥ विशुद्धमक्षरं नित्यं पूर्णमाकाशमध्यगम् । आनन्दं निर्मलं शांतं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५१॥ योगिनो हृदि पश्यन्ति परात्मानं सनातनम् । अविकारमजं शुद्धं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५२॥ ध्यानमन्यत्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनि सत्तम । संसारतापतप्तानां सुधावृष्टिसमं नृणाम् ॥१५३॥ नारायणं परानन्दं स्मरेत्प्रणवसंस्थितम् । नादरूपमनौपम्यमर्द्ध मात्रोपरिस्थितम् ॥१५४॥ अकारं ब्रह्मणो रूपमुकारं विष्णुरूपवत् । मकारं रुद्ररूपं स्यादर्द्धमात्रं परात्मकम् ॥१५५॥ मात्रास्तिस्रः समाख्याता ब्रह्मविष्णुशिवाधिपाः । तेषां समुच्चयं विप्र परब्रह्मप्रबोधकम् ॥१५६॥ वाच्यं तु परमं ब्रह्म वाचकः प्रणवः स्मृतः । वाच्यवाचकसंबन्धो ह्युपचारात्तयोर्द्विज ॥१५७॥ जपन्तः प्रणवं नित्यं मुच्यन्ते सर्वपातकैः । तदभ्यासेन संयुक्ताः परं मोक्षं लभन्ति च ॥१५८॥ जपंश्च प्रणवं मन्त्रं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । कोटिसूर्यसमं तेजो ध्यायेदात्मनि निर्मलम् ॥१५९॥ शालग्रामशिलारूपं प्रतिमारूपमेव वा । यद्यत्पापहरं वस्तुतत्तद्वा चिन्तयेद्धृदि ॥१६०॥ यदेतद्वैष्णवं ज्ञानं कथितं ते मुनीश्वर । एतद्विदित्वा योगीन्द्रो लभते मोक्षमुत्तमम् ॥१६१॥ यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वापि समाहितः । स सर्वपापनिर्मुक्तो हरिसालोक्यमाप्नुयात् ॥१६२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे योगनिरूपणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥ है ॥१४८॥ वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम और महान् से भी महत्तर है। सनातनात्मा और अखिलविश्व का एक मात्र कारण है, जिसको तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ महात्मा परात्पर से भी परम पवित्र समझते हैं ॥१४९॥ वह पुराण पुरुष अनादि है और अकार के लेकर क्षकार तक वर्ण भेद के रूप में व्यवस्थित रह कर शब्द ब्रह्म के नाम से वर्णित होता है ॥१५०॥ उसको विशुद्ध, अक्षर, नित्य, पूर्ण, आकाशमध्यगामी, आनन्दमय, निर्मल, शान्त और परब्रह्म कहते हैं ॥१५१॥ उस परात्मा सनातन को योगी जन अपने हृदय में देखते हैं और उस पर ब्रह्म को अविकार, अज और शुद्ध कहते हैं ॥१५२॥ मुनिवर्य ! अब मैं दूसरे प्रकार के ध्यान को कह रहा हूँ सुनो, जो इस संसार की ज्वाला में दग्ध मानवों के लिए अमृत वर्षा के समान है ॥१५३॥ परानन्द नारायण की अनुपम नाद रूप में, अर्द्ध मात्रा के ऊपर स्थित तथा प्रणव में स्थित रूप में स्मरण करना चाहिए ॥१५४॥ अकार ब्रह्मा का रूप है, उकार विष्णु का, मकार रुद्र का और अर्द्धमात्रा परब्रह्म का रूप है। ये तीनों मात्रायें ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवता वाली कही जाती हैं। विप्र ! इन तीनों का समुच्चय पर ब्रह्म का वाचक है ॥१५५-१५६॥ परब्रह्म वाच्य (अर्थ) और प्रणव वाचक (शब्द) है। द्विज ! उनका यह वाच्य-वाचक संबन्ध केवल उपचार (आरोपित) मात्र है। वस्तुतः इन दोनों में अभेद संबन्ध है। नित्य प्रति प्रणव का जप करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और प्रणव साधना में लीन रहने वाले तो पर मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥१५७-१५८॥ ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक प्रणव मंत्र का जप करते समय कोटि सूर्य के समान प्रभावशाली तेज पुंज का ध्यान करना चाहिए। शालिग्राम शिला रूप, अथवा प्रतिमारूप अथवा जो जो पापों को दूर करने वाली वस्तुएँ हैं उनका हृदय में ध्यान करना चाहिए ॥१५९-१६०॥ मुनीश्वर ! यह जो वैष्णव ज्ञान तुमसे मैंने कहा है, इसको जानकर योगीन्द्र उत्तम मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो व्यक्ति एकाग्र होकर इस ज्ञान को सुनता है या स्वयं पढ़ता है, वह अपने सब पापों से मुक्त होकर हरि-सालोक्य मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१६१-१६२॥ श्रीनारदीयमहापुराण में योग निरूपण नामक तैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३३॥
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः नारद उवाच समाख्यातानि सर्वाणि योगाङ्गानि महामुने । इदानीमपि सर्वज्ञ यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥१॥ योगो भक्तिमतामेष सिध्यतीति त्वयोदितम् । यस्य तुष्यति सर्वेशस्तस्य भक्तिश्च शाश्वतम् ॥२॥ यथा तुष्यति सर्वेशो देवदेवो जनार्दनः । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ मुने कारुण्यवारिधे ॥३॥ सनक उवाच नारायणं परं देवं सच्चिदानन्दविग्रहम् । भज सर्वात्मना विप्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥४॥ रिपवस्तं न हिंसन्ति न बाधंते ग्रहाश्च तम् । राक्षसाश्च न चेक्षन्ते नरं विष्णुपरायणम् ॥५॥ भक्तिर्दृढा भवेद्यस्य देवदेवे जनार्दने । श्रेयांसितस्य सिध्यन्ति भक्तिमन्तोऽधिकास्ततः ॥६॥ पादौ तौ सफलौ पुंसां यौ विष्णोगृहगामिनौ । तौ करौ सफलौ ज्ञेयौ विष्णुपूजापरौ तु यौ ॥७॥ ते नेत्रे सुफले पुंसां पश्यतो ये जनार्दनम् । सा जिह्वा प्रोच्यते सद्भिर्हरिनामपरा तु या ॥८॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । तत्त्वं गुरुसमं नास्ति न देवः केशवात्परः ॥९॥ सत्यं वच्मि हितं वच्मि सारं वच्मि पुनः पुनः । असारेऽस्मिंस्तु संसारे सत्यं हरिसमर्चनम् ॥१०॥ अध्याय ३४ हरिभक्त के लक्षणों का निरूपण नारद बोले—महामुनि ! आपने समस्त योगांगों का वर्णन कर दिया, सर्वज्ञ ! अब जो कुछ मैं पूछ रहा हूँ उसको कहिए ॥१॥ आपने अभी कहा है कि, योग भक्तों को ही सिद्ध होता है और शाश्वत भक्ति उसी को प्राप्त होती है जिस पर सर्वेश प्रसन्न रहते हैं । सर्वज्ञ ! करुणा-सागर ! मुने ! अब देवाधिदेव जनार्दन कैसे प्रसन्न होते हैं, इसको आप कहिए ॥२-३॥ सनक बोले—विप्र ! यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो सच्चिदानन्द स्वरूप, पर देव ब्रह्म का सब प्रकार से भजन करो ॥४॥ जो नर विष्णु में सर्वदा अपनी निष्ठा रखता है उसको शत्रु नहीं मार सकते, ग्रह-पीड़ा भी पास नहीं फटकती और राक्षस उसकी ओर आँख नहीं उठा सकते हैं ॥५॥ जिसकी देवाधिदेव जनार्दन में दृढ़ भक्ति हो जाती है उसको सब कल्याण प्राप्त होते हैं और वह अधिकाधिक भक्तिमान् हो जाता है ॥६॥ उस व्यक्ति के ही पैर सफल हैं जिनसे विष्णु मन्दिर में जाया जाता है, जो हाथ विष्णु की पूजा में लगे रहते हैं वे ही धन्य हैं । नेत्र वे ही कृतकृत्य हैं जो जनार्दन का दर्शन करते हैं । उसी जिह्वा की मनीषी लोग प्रशंसा करते हैं जो सर्वदा हरिनामोच्चारण में लगी रहती है ॥७-८॥ मैं दोनों हाथ उठाकर कह रहा हूँ कि यह सत्य है, सत्य है, सत्य है कि, गुरु के समान दूसरा कोई तत्त्व नहीं और न तो केशव से बढ़कर कोई देवता ही है ॥९॥ मैं सत्य कह रहा हूँ, श्रेय कह रहा हूँ और बार बार सार कह रहा हूँ कि, इस असार संसार
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२१ संसारपाशे सुदृढं महामोहप्रदाय कम् । हरिभक्तिकुठारेण च्छित्वात्यन्तसुखी भव ॥११॥ तन्मनः संयुक्तं विष्णौ सा वाणी मत्परायणा । ते श्रोत्रे तत्कथासारपूरिते लोकवंदिते ॥१२॥ आनन्दमक्षरं शून्यमवस्थां त्रितयेऽपि । आकाशमध्यगं देवं भज नारद संततम् ॥१३॥ स्थानं न शक्यते यस्य स्वरूपं वा कदाचन । निर्देष्टुं मुनिशार्दूल द्रष्टुं वाथ कृतात्मभिः ॥१४॥ समस्तैः करणैर्युक्तो वर्त्ततेऽसौ यदा तदा । जाग्रदित्यप्युच्यते सद्भीरन्तर्यामी सनातनः ॥१५॥ यदान्तःकरणैर्युक्तः स्वेच्छया विलत्यसौ । स्वप्नन्नित्युच्यते ह्यात्मा यदा स्वापविवर्जितः ॥१६॥ न बाह्यकरणैर्युक्तो न चान्तःकरणैस्तथा । अस्वरूपो यदात्मासौ पुण्यापुण्यविवर्जितः ॥१७॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो ह्यानंदो निर्गुणो विभुः । परब्रह्ममयो देवः सुषुप्त इति गीयते ॥१८॥ भावनामयमेतद्वै जगत्स्थावरजङ्गमम् । विद्युल्लोलं विप्रेन्द्र भज तस्माज्जनार्दनम् ॥१९॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यापरिग्रहौ । वर्त्तते यस्य तस्यैव तुष्यते जगतां पतिः ॥२०॥ सर्व्वभूतदयायुक्तो विप्रपूजापरायणः । तस्य तुष्टो जगन्नाथो मधुकैटभमर्द्दनः ॥२१॥ सत्कथायां च रमते सत्कथां च करोति यः । सत्सङ्गे निरहंकारस्तस्य प्रीतो रमापतिः ॥२२॥ नामसंकीर्त्तनं विष्णो क्षुत्तृट्प्रस्खलितादिषु । करोति सततं यस्तु तस्य प्रीतो ह्यधोक्षजः ॥२३॥ या तु नारी पतिप्राणा पतिपूजापरायणा । तस्यास्तुष्टो जगन्नाथो ददाति स्वपदं मुने ॥२४॥ असूयारहिता ये तु ह्यहंकारविवर्जिताः । देवपूजापरायश्चैव तेषां तुष्यति केशवः ॥२५॥ में हरि पूजा ही सत्य है ॥१०॥ यह संसार का पाश अत्यन्त सुदृढ़ है और महामोह में डालने वाला है । इसलिए हरिभक्ति रूपी कुल्हाड़ी से इसको काटकर अत्यन्त सुखी हो जाओ ॥११॥ वही मन प्रशंसनीय है जो विष्णु में लगा रहता है, वही वाणी वाणी है जो प्रभु का गुणगान करती रहती है। वे ही कान धन्य है जो विष्णु के कथासार से भरे रहते हैं ॥१२॥ नारद ! तीनों अवस्थाओं (जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति) में आनन्द, अक्षर, शून्य और आकाश मध्यगामी देव (विष्णु) का सर्वदा भजन करो । मुनिशार्दूल ! उस ब्रह्म के स्थान, स्वरूप का निर्देश अवश्यात्म। जन कभी भी नहीं कर सकते हैं, (उनके लिए) दर्शन पाना तो दूर की वस्तु है ॥१३-१४.। जिस समय सनातन अन्तर्यामी आत्मा समस्त इन्द्रियों से युक्त रहता है उस अवस्था को सज्जन जाग्रत कहते हैं ॥१५॥ जिस समय आत्मा अन्तःकरण के साथ इच्छा पूर्वक इधर उधर विचरता रहता है सोता नहीं उसको स्वप्नावस्था कहते हैं ॥१६॥ बाह्य और अन्तःकरण से सर्वथा विमुक्त रहकर यह आत्मा जब अस्वरूप, पुण्यापुण्य से रहित हो जाता है तो उस अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं। सब उपाधियों से मुक्त, आनन्द, निर्गुण, विभु, पर ब्रह्ममय देव ही सुषुप्त कहा जाता है ॥१७-१८॥ इसलिए हे विप्रेन्द्र ! यह स्थावर जंगमात्मक जगत् चंचला के समान चंचल है, इसलिए तुम अपनी भावना में सर्वदा ईश्वर का भजन करो ॥१९॥ जिसके पास अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह की निधि है उसी पर लोक-प्रभु प्रसन्न रहते हैं ॥२०॥ सब प्राणियों पर दया करने वाले, विप्र- पूजा परायण व्यक्ति पर मधु कैटभसंहारी विष्णु सर्वदा प्रसन्न रहते हैं ॥२१॥ जो सत्कथा में सर्वदा रमता रहता, सर्वदा सत्कथा को ही सुनता रहता और अहंकार रहित होकर सत्संगति से प्रेम करता है उसके ऊपर रमापति भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥२२॥ जो भूख, प्यास और वाक् स्खलन के समय भी विष्णु का नाम स्मरण करता है, उसके ऊपर भगवान् अधोक्षज प्रसन्न रहते हैं ॥२३॥ मुने ! जो नारी पतिव्रता और पतिपूजा परायण होती है, उस पर भगवान् प्रसन्न होकर परमपद दे देते हैं ॥२४॥ जो ईर्ष्या और अहंकार से दूर रह कर देव-पूजा में सर्वदा लगे रहते
२२२ नारदीयपुराणम्
तस्माच्छृणुष्व देवर्षे भजस्व सततं हरिम् । मा कुरुष्व ह्यहंकारं विद्युल्लोलश्रिया वृथा ॥२६॥ शरीरं मृत्युसंयुक्तं जीवितं चातिचञ्चलम् । राजादिभिर्धनं बाध्यं सम्पदः क्षणभंगुराः ॥२७॥ किं न पश्यसि देवर्षे ह्यायुषार्द्धं तु निद्रया । हृतं च भोजनाद्यैश्च कियदायुः समाहृतम् ॥२८॥ कियदायुर्बालभावाद् वृद्धावाक्यिद्वृथा । कियदिन्द्रियभोगैश्च कदा धर्मान्करिष्यति ॥२९॥ बालभावे च वार्द्धक्ये न घटेताच्युतार्चनम् । वयस्येव ततो धर्मान्कुरु त्वमनहंकृतः ॥३०॥ मा विनाशं व्रज मुने मग्नः संसारगह्वरे । वपुर्विनाशनिलयमपदां परमं पदम् ॥३१॥ शरीरं भोगनिलयं मलाद्यैः परिदूषितम् । किमर्थं शाश्वतधिया कुर्यात्पापं नरो वृथा ॥३२॥ आसारभूते संसारे नानादुःखसमन्विते । विश्वासो नात्र कर्तव्यो निश्चितं मृत्युसंकुले ॥३३॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् । देहयोगनिवृत्त्यर्थं सद्य एव जनार्दनम् ॥३४॥ मानं त्यक्त्वा तथा लोभं कामक्रोधविवर्जितः । भजस्व सततं विष्णुं मानुष्यमतिदुर्लभम् ॥३५॥ कोटिजन्मसहस्रेषु स्थावरादिषु सत्तम । संभ्रांतस्य तु मानुष्यं कथंचित्परिलभ्यते ॥३६॥ तत्रापि देवताबुद्धिर्दानबुद्धिश्च सत्तम । भोगबुद्धिस्तथा नृणां जन्मान्तरतपःफलम् ॥३७॥ मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य यो हरिं नार्चयेत्सकृत् । मूर्खः कोऽस्ति परस्तस्माज्जडबुद्धिरचेतनः ॥३८॥ दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं नार्चयन्ति च ये हरिम् । तेषामतीव मूर्खाणां विवेकः कुत्र तिष्ठति ॥३९॥ आराधितो जगन्नाथो ददात्यभिमतं फलम् । कस्तं न पूजयेद्विप्रसंसाराग्निप्रदीपितः ॥४०॥
हैं उन पर केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥२५॥ इसलिए, देवर्षिनारद ! सुनो, तुम सर्वदा हरि को भजो, विद्युत के समान क्षणभंगुर सम्पत्ति को पाकर कभी भी अहंकार न करो ॥२६॥ यह शरीर सर्वदा मृत्यु से घिरा रहता है, जीवन अत्यन्त चंचल है, राजा आदि से प्राप्त धन और संपत्ति सब कुछ क्षणभंगुर है ॥२७॥ देवर्षि ! क्या यह नहीं देखते कि आयु का आधा भाग निद्रा में ही चला जाता है, भोजन आदि में आयु का कितना अंश बीत जाता है यह भी प्रत्यक्ष ही है ॥२८॥ शैशव और बुढ़ापे में कितना व्यर्थ समय बीत जाता है ? कितना अंश तो विषय भोग में ही नष्ट हो जाता है तो बताओ कब तुम धर्माचरण करोगे ? ॥२९॥ बचपन और बुढ़ापे में भगवान् की पूजा तो हो नहीं सकती, इसलिए तुम युवावस्था में ही धर्माचरण करो ॥३०॥ मुनिवर ! इस संसार- कुण्ड में मग्न होकर आत्मविनाश मत करो। यह शरीर विनाश का घर है और आपत्तियों का परम स्थान है ॥३१॥ यह शरीर विषय भोग का अड्डा है और मलमूत्र आदि से दूषित है। इसलिए मनुष्य व्यर्थ में इसको शाश्वत समझकर क्यों पाप करे ? ॥३२॥ इस असार, नाना दुःखों से भरे और मृत्यु पाश में बँधे हुए संसार का विश्वास नहीं करना चाहिए ॥३३॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, तुमसे यथार्थ बात बता रहा हूँ। इस जन्म मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए तत्काल अहंकार और लोभ को छोड़कर कामक्रोध को दूर हटाकर जनार्दन विष्णु को सर्वदा भजो । मानव-जीवन सचमुच ही अत्यन्त दुर्लभ है ॥३४-३५॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्थावरादि योनियों में करोड़ों जन्म तक भ्रमण करने के बाद कहीं किसी प्रकार मानव-जीवन प्राप्त होता है। इस जीवन में भी देवों में श्रद्धा, दान की प्रवृत्ति और भोगबुद्धि मनुष्यों को जन्मान्तर की तपस्या से प्राप्त होती है ॥३६-३७॥ जो दुर्लभ मनुष्य देह प्राप्त करके हरि की एक बार भी पूजा नहीं करता उससे बढ़कर जड़बुद्धि, चेतनाहीन और मूर्ख कौन होगा ? ॥३८॥ जो दुर्लभ मानव जीवन को पाकर हरि की पूजा नहीं करते उन प्रचण्ड मूर्खों का विवेक कहाँ रहता है ? ॥३९॥ पूजा द्वारा भगवान् जगन्नाथ संतुष्ट होकर मनुष्य को इष्ट फल प्रदान करते हैं, विप्र ! तो कौन ऐसा होगा जो संसार ज्वाला से दग्ध होकर भी भगवदाराधना करना नहीं चाहेगा ? ॥४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! चाण्डाल
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२३ चंडालोऽपि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तो द्विजाधिकः । विष्णुभक्तिविहीनश्च द्विजोऽपि श्वपचाधमः ॥४१॥ तस्मात्कामादिकं त्यक्त्वा भजेत हरिमव्ययम् । यस्मिंस्तुष्टेऽखिलं तुष्येद्यतः सर्वगतो हरिः ॥४२॥ यथा हस्तिपदे सर्वं पदमात्रं प्रलीयते । तथा चराचरं विश्वं विष्णावेव प्रलीयते ॥४३॥ आकाशेन यथा व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम् । तथैव हरिणा व्याप्तं विश्वमेतच्चराचरम् ॥४४॥ जन्मनो मरणं नृणां जन्म वै मृत्युसाधनम् । उभे ते निकटे विद्धि तन्नाशं हरिसेवया ॥४५॥ ध्यातः स्मृतः पूजितो वा प्रणतो वा जनार्दनः । संसारपाशविच्छेदी कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥४६॥ यन्नामोच्चारणादेव महापातकनाशनम् । यं समभ्यर्च्य विप्रर्षे मोक्षभागी भवेन्नरः ॥४७॥ अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रमिदं द्विज । हरिनाम्नि स्थिते लोकः संसारे परिवर्तते ॥४८॥ भूयोभूयोऽपि वक्ष्यामि सत्यमेतत्तपोधन । नीयमानो यमभटैरशक्तो धर्मसाधनैः ॥४६॥ यावन्नेन्द्रियवैकल्यं यावद्व्याधिर्न बाधते । तावदेवार्चयेद्विष्णुं यदि मुक्तिमभीप्सति ॥५०॥ मातुर्गर्भाद्विनिष्क्रान्तो यदा जन्तुस्तदैव हि । मृत्युः संनिहितो भूयात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ॥५१॥ अहो कष्टमहो कष्टमहोकष्टमिदं वपुः । विनश्वरं समाज्ञाय धर्मं नैवाचरत्ययम् ॥५२॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । दम्भाचारं परित्यज्य वासुदेवं समर्चयेत् ॥५३॥ भूयो भूयो हितं वच्मि भुजमुद्धृत्य नारद । विष्णुः सर्वात्मना पूज्यस्त्याज्यासूया तथानृतम् ॥५४॥ क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् । धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५५॥ भी यदि विष्णु भक्त है तो वह ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है, विष्णु भक्ति के बिना ब्राह्मण श्वपच (चाण्डाल) से भी गया बीता है ॥४१॥ इन कामादि दोषों को छोड़कर अव्यय हरि का भजन करना चाहिए, जिसके प्रसन्न हो जाने पर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि विष्णु तो सर्वदेवमय और व्यापक हैं ॥४२॥ जिस प्रकार हाथी के पैर में सब जन्तुओं के पैर विलीन हो जाते हैं अर्थात् बड़े होने के कारण उसके पदचिह्न में सब जन्तुओं के पद चिह्न समा- विष्ट हो जाते हैं ॥४३॥ जिस प्रकार आकाश से सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् व्याप्त है उसी प्रकार भगवान् से यह सचराचर जगत् व्याप्त है ॥४४॥ मनुष्यों का जन्म मृत्यु का और मृत्यु जन्म का साधन है । इन दोनों का निकटतम संबन्ध है । इस जन्म मृत्यु का नाश केवल हरि की सेवा से ही हो सकता है ॥४५॥ जनार्दन के ध्यान, स्मरण, पूजा और वन्दना से संसार बन्धन से छुटकारा अवश्य मिल जाता है । इसलिए कौन ऐसा अभागा होगा जो उसकी पूजा नहीं करेगा ? जिसके नामोच्चारण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते हैं, विप्रर्षि ! जिसकी अर्चना करने से मनुष्य मोक्षभागी होता है उसकी पूजा मनुष्य क्यों न करे ॥४६-४७॥ द्विज ! यह आश्चर्य की बात है, अत्यन्त आश्चर्य है कि हरिनाम के रहते हुए भी मनुष्य संसार सागर में डूबता रहता है । तपोधन ! यह मैं बार-बार जोर देकर कहा रहा हूँ यह सत्य है कि धर्म साधन से हीन प्राणी यम दूतों द्वारा तो जाया जाता है ॥४८-४६॥ जब तक इन्द्रियां शिथिल नहीं है, जब तक शरीर रोग ग्रस्त नहीं है तब तक ही मोक्षाभिलाषी मनुष्य विष्णु की पूजा कर ले ॥५०॥ ज्यों ही जीव माता के गर्भ से बाहर आता है त्योंही मृत्यु उसके पीछे लग जाती है इसलिए सर्वदा धर्म तत्पर रहना चाहिए ॥५१॥ यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस शरीर को नश्वर समझकर भी मनुष्य धर्माचरण नहीं करता है ॥५२॥ मैं भुजा उठाकर यह घोषणा करता हूँ कि मनुष्य दंभाचार को छोड़ कर वासुदेव की पूजा करे यह एक चिर सत्य सिद्धान्त है ॥५३॥ नारद ! मैं भुजा उठाकर बार बार इस हितकर वचन को कह रहा हूँ कि विष्णु की सर्वतोभावेन पूजा करनी चाहिए, असूया और असत्य को पास नहीं फटकने देना चाहिए ॥५४॥ क्रोध से मनः सन्ताप होता है और क्रोध ही संसार-बन्धन का कारण है । क्रोध से ही धर्म क्षय भी होता है, काम इस जन्म का कारण है और काम ही पाप का कारण है । यश को नष्ट करने वाला भी काम
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२२४ नारदीयपुराणम् काममूलमिदं जन्म कामः पापस्य कारणम् । यशः क्षयकरः कामस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५६॥ समस्तदुःखजालानां मात्सर्यं कारणं स्मृतम् । नरकाणां साधनं च तस्मात्तदपि संत्यजेत् ॥५७॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । तस्मात्तदमिसंयोज्य परात्मनि सुखी भवेत् ॥५८॥ अहो धैर्पमहो धैर्यमहो धैर्यमहो नृणाम् । विष्णौ स्थिते जगन्नाथे न भजंति मदोद्धता ॥५६॥ अनाराध्य जगन्नाथं सर्वधातारमच्युतम् । संसारसागरे मग्नाः कथं पारं प्रयांति हि ॥६०॥ अच्युतानंदगोविंदनामोच्चारणभेषजात् । नश्यंति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥६१॥ नारायण जगन्नाथ वासुदेव जनार्दन । इतीरयन्ति ये नित्यं ते वै सर्वत्र वन्दिताः ॥६२॥ अद्यापि च मुनिश्रेष्ठ ब्रह्माद्या अपि देवताः । यत्प्रभावं न जानन्ति तं याहि शरणं मुने ॥६३॥ अहो मौर्यमहो मौर्यमहो मौर्य दुरात्मनाम् । हृत्पद्मसंस्थितं विष्णुं न विजानन्ति नारद ॥६४॥ शृणुष्व मुनिशार्दूल भूयोभूयो वदाम्यहम् । हरिः श्रद्धावतां तुष्येन्न धनेर्न च बान्धवैः ॥६५॥ बन्धुमत्त्वं धनाढ्यत्वं पुत्रवत्त्वं च सत्तम । विष्णुभक्तिमतां नॄणां भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥६६॥ पापमूलमयं देहः पापकर्मरतस्तथा । एतद्विदित्वा सततं पूजनीयो जनार्दनः ॥६७॥ पुत्रमित्रकलत्राद्या बहवः स्युश्च संपदः । हरिपूजारतानां तु भवत्येव न संशयः ॥६८॥ इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेत्सततं हरिम् । इहामुत्रासुखप्रेप्सुः परनिन्दापरो भवेत् ॥६६॥ धिग्जन्म भक्तिहीनानां देवदेवे जनार्दने । सत्पात्रदानशून्यं यत्तद्धनं धिक्पुनः पुनः ॥७०॥ न नमेद्विष्णवे यस्य शरीरं कर्मभेदिने । पापानामाकरं तद्वै विज्ञेयं मुनिसत्तम ॥७१॥ ही है, इसलिए काम को कभी भी पास न आने दो ॥५५-५६॥ मात्सर्य समस्त दुःख-समूह का एक मात्र कारण है। यही नरकों की ओर भी ले जाने वाला है। इसलिए इसको भी छोड़ दो ॥५७॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है इसलिए इसको परमात्मा में लगा कर सुखी होना चाहिए ॥५८॥ अहो ! यह मनुष्यों की आश्च- चर्य जनक जड़ता या धीरता है कि जगत्पति विष्णु के रहते हुए भी मनुष्य मदोद्धत होकर उनका भजन नहीं करते ॥५६॥ सबके पालक जगन्नाथ की आराधना के बिना संसार-सागर में डूबे हुए मनुष्य कैसे भवसागर के पार जा सकते हैं ? ॥६०॥ यह सत्य कह रहा हूँ, सत्य कह रहा हूँ कि अच्युतानन्द, गोविन्दनामोच्चारण रूपी ओषधि से ही संसार के सब रोग नष्ट होते हैं ॥६१॥ नारायण, जगन्नाथ, वासुदेव, जनार्दन आदि नामों का जो उच्चारण करते हैं वे सर्वत्र सम्मानित होते हैं ॥६२॥ मुनिश्रेष्ठ ! आजतक ब्रह्मा आदि देवता जिसके प्रभाव को नहीं जानते हैं, मुने ! उसी की शरण में जाओ ॥६३॥ नारद ! दुष्टों की यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि हृदय रूपी कमल में स्थित विष्णु को वे नहीं जानते ॥६४॥ मुनिशार्दूल ! सुनो, मैं यह बार बार कह रहा हूँ कि भगवान् श्रद्धालु भक्तों पर ही प्रसन्न होते हैं धन और बड़े परिवार वाले मनुष्य पर नहीं ॥६५॥ सज्जनाग्रणी ! विष्णु-भक्तों को जन्म जन्मान्तर में कुटुम्ब, धन, पुत्र आदि प्राप्त होते हैं ॥६६॥ यह मानव शरीर पापों का मूल है और इसके द्वारा सर्वदा पाप कर्मों में अभिरुचि बनी रहती है, यह जानकर जनार्दन की सर्वदा पूजा करनी चाहिए ॥६७॥ पुत्र, मित्र, कलत्र आदि और बहुत प्रकार की संपत्तियां हरिपूजापरायण व्यक्तियों को अवश्य प्राप्त होती हैं ॥६८॥ लोक, परलोक सर्वत्र सुख चाहने वाला व्यक्ति हरि की सर्वदा पूजा करे और कष्ट चाहने वाला दूसरों की निन्दा किया करे ॥६९॥ देवाधिदेव जनार्दन की भक्ति न करने वाले व्यक्ति के जीवन को धिक्कार है और सत्पात्र को दान न देने वाले के धन को बार बार धिक्कार है ॥७०॥ मुनिश्रेष्ठ ! कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने वाले विष्णु के सामने जिसका शरीर नहीं झुका उसको पापों की खान समझना चाहिए ॥७१॥ सत्पात्र को
पञ्चविंशोऽध्यायः २२५ सत्पात्रदानरहितं यद्द्रव्यं येन रक्षितम् । चौर्येण रक्षितमिव विद्धि लोकेषु निश्चितम् ॥७२॥ तडिल्लोलश्रिया मत्ताः क्षणभंगुरशालिनः । नाराधयंति विश्वेशं पशुपालविमोचकम् ॥७३॥ सृष्टिस्तु द्विविधा प्रोक्ता दैवासुरविभेदतः । हरिभक्तियुता दैवी तद्धीनाह्यासुरो मता ॥७४॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र हरिभक्तपरायणाः । श्रेष्ठाः सर्वत्र विख्याता यतो भक्तिः सुदुर्लभा ॥७५॥ असूयारहिता ये च विप्रत्राणपरायणाः । कामादिरहिता ये च तेषां तुष्यति केशवः ॥७६॥ संमार्जनादिना ये तु विष्णुशुश्रूषणे रताः । सत्पात्रदाननिरताः प्रयांति परमं पदम् ॥७७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे हरिभक्तिलक्षणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३४॥ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच पुनर्वक्ष्यामि माहात्म्यं देवदेवस्य चक्रिणः । पठतां शृण्वतां सद्यः पापराशिः प्रणश्यति ॥१॥ शांता जितारिषड्वर्गा योगेनाप्यनहंकृताः । यजंति ज्ञानयोगेन ज्ञानरूपिणमव्ययम् ॥२॥ तीर्थस्नानर्विशुद्धा ये व्रतदानतपोमखैः । यजंति कर्मयोगेन सर्वधातारमच्युतम् ॥३॥ दान न देकर जिस द्रव्य को सुरक्षित रखा गया उसको संसार में चोर की कमाई हुई और उसके द्वारा रक्षित संपत्ति समझना चाहिए ॥७२॥ बिजली के समान चंचल शोभा वालो लक्ष्मी को पाकर मदमत्त हो जाने वाले मरणशील प्राणी पशु आदि योनियों से मुक्त करने वाले विश्वेश की आराधना नहीं करते हैं, यह एक दुर्भाग्य की बात है ॥७३॥ दैव और आसुर भेद से सृष्टि दो प्रकार की होतो है। हरि भक्ति से युक्त सृष्टि दैवी और इससे शून्य सृष्टि आसुरी मानी जाती है ॥७४॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, हरिभक्तिपरायण मनुष्य सर्वत्र आदर पाते हैं ; क्योंकि भक्ति संसार में अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ है ॥७५॥ जो ईर्ष्या द्वेष से दूर रहते, और सदा ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं और काम आदि दोषों से अलग रहते हैं उनसे केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥७६॥ जो मन्दिर की झाड़ू आदि से सफाई कर भगवान् को सेवा किया करते हैं और सत्पात्रों को दान दिया करते हैं, वे परम पद को प्राप्त करते हैं ॥७७॥ श्रीनारदीयमहापुराण में हरिभक्तिलक्षणवर्णन नामक चौतीसवां अध्याय समाप्त ॥३४॥ अध्याय ३५ ज्ञान का निरूपण सनक बोले--अब इसके बाद फिर मैं देवों के देव भगवान् विष्णु का माहात्म्य कह रहा हूँ जिसको सुनने और पढ़ने से शीघ्र ही पाप-समूह नष्ट हो जाता है ॥१॥ शान्त, काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतने वाले और योग के द्वारा अहंकार पर विजय पाने वाले महापुरुष ज्ञान योग के द्वारा ज्ञान रूप अव्यय परमात्मा की आराधना करते हैं ॥२॥ जिनका तीर्थ, स्नान, व्रत, दान, तपस्या और यज्ञों से अन्तःकरण विशुद्ध है वे कर्मयोग से निखिल भुवन पालक भगवान् की आराधना करते हैं ॥३॥ २९-मार०
२२६ नारदीयपुराणम् लुब्धा व्यसनिनोऽज्ञाश्च न यजन्ति जगत्पतिम् । अजरामरवन्मूढास्तिष्ठंति नरकीटकाः ॥४॥ तडिल्लेखाश्रिया मत्ता वृथाहंकारदूषिताः । न यजन्ति जगन्नाथं सर्वश्रेयोविधायकम् ॥५॥ हरिधर्मरताः शांता हरिपादाम्बुजसेवकाः । दैवात्केऽपीह जायंते लोकानुग्रहतत्पराः ॥६॥ कर्मणा मनसा वाचा यो यजेद्भक्तितो हरिम् । स याति परमं स्थानं सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥७॥ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥८॥ तत्प्रवक्ष्यामि चरितं यज्ञमालिसुमालिनोः । यस्य श्रवणमात्रेण वाजिमेधफलं लभेत् ॥९॥ कश्चिदासीत्पुरा विप्र ब्राह्मणो रैवतेंऽतरे । वेदमालिरिति ख्यातो वेदवेदांगपारगः ॥१०॥ सर्वभूतदयायुक्तो हरिपूजापरायणः । पुत्रमित्रकलत्रार्थं धनार्जनपरोऽभवत् ॥११॥ अपण्यविक्रयं चक्रे तथा च रसविक्रयम् । चंडालाद्यैरपि तथा संभावी तत्प्रतिग्रही ॥१२॥ तपसां विक्रयं चक्रे व्रतानां विक्रयं तथा । परार्थे तीर्थगमनं कलत्रार्थमकारयत् ॥१३॥ कालेन गच्छता विप्र जातौ तस्य सुतावुभौ । यज्ञमाली सुमाली च यमलावतिशोभनौ ॥१४॥ ततः पिता कुमारौ तावतिस्नेहसमन्वितः । पोषयामास वात्सल्याद्बहुभिः साधनैस्तदा ॥१५॥ वेदमालिर्बहुपायैर्धनं संपाद्य यत्नतः । स्वधनं गणयामास कियत्स्यादिति वेदितुम् ॥१६॥ निधिकोटिसहस्राणां कोटिकोटिगुणान्वितम् । विगणय्य स्वयं हृष्टो विस्मितश्चार्थचिंतया ॥१७॥ लोभी, व्यसनप्रिय और अज्ञानी जगत्पति की पूजा नहीं करते। ऐसे नरपशु उलटे अपने को अजर-अमर समझकर जड़ की भाँति पड़े रहते हैं। विद्युल्लेखा के समान चंचल लक्ष्मी से मतवाले और व्यर्थ अहंकार से दूषित लोग सर्वकल्याणकारी संसार के स्वामी भगवान् की पूजा नहीं करते हैं ॥४॥ भगवान् की कृपा से ही वैष्णव, शान्त, भगवान्, के चरण कमल की सेवा करने वाले, तथा लोककल्याणकारी कुछ महापुरुष इस लोक में जन्म लेते हैं ॥५-६॥ जो मन, वचन और कर्म से भगवान् हरि की उपासना करते हैं वे सब लोकों से श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करते हैं ॥७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसके पठन और श्रवण से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं उस यज्ञमाली और सुमाली के चरित्र को सुना रहा हूँ जिसके सुनने से ही अश्वमेध का फल प्राप्त हो जाता है ॥८-६॥ विप्र ! बहुत दिनों की बात है, रैवत प्रदेश में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम वेदमालि था जो वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् था। वह हरि-पूजा का प्रेमी और सब प्राणियों पर दया करने वाला व्यक्ति था। कुछ समय के बाद वह पुत्र, मित्र और स्त्री के पालन के लिए धन कमाने के फेर में पड़ा ॥१०-११॥ अपने कुल-धर्म की ओर ध्यान न देकर उसने निषिद्ध वस्तुओं और रस (मद्य) को बेचा। लोभ में पड़कर चाण्डाल आदि से बात-चीत करता और उनसे दान भी लेता था। पैसे के लिए दूसरे के निमित्त तीर्थ यात्रा भी करता था ॥१२-१३॥ विप्र ! कुछ समय बीतने पर उसको यज्ञमाली और सुमाली नामक दो अत्यन्त सुन्दर जुड़वां पुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर वेद माली ने उन दोनों पुत्रों को बड़े प्यार से प्रत्येक सम्भवसाधनों से पालन पोषण किया ॥१४-१५॥ उसने बड़े परिश्रम से अनेकों उपायों से धन कमाया। एक दिन वह अपनी उपार्जित सम्पति का ठीक ठीक परिमाण जानने के लिए अपने धन को गिनने लगा। हजारों करोड़ों की संख्या में अपनी संपत्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर भी अर्थलोभ की ओर अपने मन को खिचाव देखकर विस्मित होकर सोचने लगा ॥१६-१७॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः २२७ असत्प्रतिग्रहैश्चैव अपण्यानां च विक्रयैः । मया तपो विक्रयाद्यैरेतद्धनमुपार्जितम् ॥१८॥ नाद्यापि शांतिमापन्ना मम तृष्णातिदुःसहा । मेरुतुल्यसुवर्णानि ह्यसंख्यातानि वांछति ॥१९॥ अहो मन्ये महाकष्टं समस्तक्लेशसाधनम् । सर्वान्कामानवाप्नोति पुनरन्यच्च कांक्षति ॥२०॥ जीर्यति जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः । चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥२१॥ ममेंद्रियाणि सर्वाणि मंदभावं व्रजंति च । बलं हतं च जरसा तृष्णा तरुणतां गता ॥२२॥ कष्टआशा वर्त्तते यस्य स विद्वानथ पंडितः । सुशांतोऽपि प्रमन्युः स्याद्धीमानप्यतिमूढधीः ॥२३॥ आशा भंगकरी पुंसामजेयारातिसन्निभा । तस्मादाशां त्यजेत्प्राज्ञो यदिच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥२४॥ बलं तेजो यशश्चैव विद्यां मानं च वृद्धताम् । तथैव सत्कुले जन्म आशा हंत्यतिवेगतः ॥२५॥ नृणामाशाभिभूतानामाश्चर्यमिदमुच्यते । किंचिद्दातापि चांडालस्तस्मादधिकतां गतः ॥२६॥ आशाभिभूता ये मर्त्या महामोहा महोद्धताः । अवमानादिकं दुःखं न जानंति कदाप्यहो ॥२७॥ मयाप्येवं बहुक्लेशैरेतद्धनमुपार्जितम् । शरीरमपि जीर्णं च जरसापहृतं बलम् ॥२८॥ इतः परं यतिष्यामि परलोकार्थमादरात् । एवं निश्चित्य विप्रेंद्र धर्ममार्गरतोऽभवत् ॥२९॥ तदैव तद्धनं सर्वं चतुर्द्धा व्यभजत्तथा । स्वयं तु भागद्वितयं स्वार्जितादर्थादपाहरत् ॥३०॥ शेषं च भागद्वितयं पुत्रयोरुभयोर्ददौ । स्वेनार्जितानां पापानां नाशं कर्तुमनास्तदा ॥३१॥ प्रपातडागारामंश्च तथा देवगृहान्बहून् । अन्नादीनां च दानानि गंगातीरे चकार सः ॥३२॥ "आश्चर्य है कि मैंने असत् पात्रों से दान लिया, निषिद्ध वस्तुओं को बेंचा और अपनी तपस्या को बेंचा । इसप्रकार मैंने इतनी संपत्ति प्राप्त की । परन्तु अब तक मुझको शान्ति नहीं मिली प्रत्युत दिनानुदिन दुःसह तृष्णा होती जाती है । सुमेरु के बराबर असंख्य सुवर्ण राशि की इच्छा होती है ॥१८-१९॥ अहो ! यह बड़े कष्ट की बात है और समस्त दुःखों का यही एक मात्र कारण है कि मनुष्य ज्यों-ज्यों अपने मनोरथों को पाता जाता है त्यों-त्यों नई-नई आकांक्षायें बढ़ती जाती हैं । बुढ़ापे में बाल सफेद हो जाते, दांत टूट जाते, आँखें और कान भी जवाब दे देते हैं परन्तु केवल एक तृष्णा ही तरुण होती जाती है, अर्थात् बुढ़ापे में सब अंग तो शिथिल हो जाते पर तृष्णा बढ़ती ही जाती है ॥२०-२१॥ मेरी सब इन्द्रियाँ तो धीरे-धीरे शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे के कारण शक्ति भी नहीं रह गई परन्तु केवल तृष्णा नवीन होती जा रही है जिसको यह कष्ट दायिनी आशा (तृष्णा) हो जाती है चाहे वह विद्वान् हो, पंडित हो, परमधीर हो परन्तु वह भी क्रोधी हो जाता है, बुद्धिमान् भी इसके आगे मूढ़ हो जाता है ॥२२-२३॥ आशा पुरुषों को विनष्ट करने वाली है, अजेय है और शत्रु के समानघातक है; इसलिए शाश्वत सुख की इच्छा करने वाले मनस्वी जन यदि अपना कल्याण चाहते हों तो तृष्णा को अवश्य छोड़ दें ॥२४॥ बल, तेज, यश, विद्या, गर्व, वृद्धता और उसी प्रकार कुलीनता आदि को आशा शीघ्र नष्ट कर देती है ॥२५॥ आशा के बन्धन में बंधे मनुष्यों की स्थिति देखकर आश्चर्य के साथ कहना पड़ता है कि थोड़ा धन दान करने वाले चाण्डाल से दान लेकर उन्होंने अपने को चाण्डाल से भी हीन बना दिया ॥२६॥ जो मनुष्य आशा से अभिभूत, महामोह में पड़े मदोद्धत हैं वे अपमान आदि के दुःखों को कभी भी नहीं जानते हैं ॥२७॥ मैंने इसी प्रकार अत्यन्त कष्ट सहकर इतनी प्रचुर संपत्ति कमाई है, इसी कार्य में शरीर भी जीर्ण हो गया, बुढ़ापे से सारी शक्ति भी नष्ट हो गई ॥२८॥ अब इसके बाद मैं अवश्य श्रद्धापूर्वक परलोक-कल्याण के लिए प्रयत्न करूँगा । विप्रेन्द्र ! ऐसा निश्चय कर वह धर्म-कार्यों में लग गया ॥२९॥ उसी समय उसने अपने धन को चार भागों में बाँटा । अपनी अर्जित संपत्ति में से दो भाग स्वयं लिये और शेष दो भाग अपने दोनों पुत्रों को दे दिये । अपने किये हुए पापों को नष्ट करने के उद्देश्य से उसने बहुत स्थानों पर प्याऊ बैठाए, धर्मशालायें, उपवन और देवमन्दिर बनवाये,
२२८ नारदीयपुराणम् एवं धनमशेषं च विश्राण्य हरिभक्तिमान् । नरनारायणस्थानं जगाम तपसे वनम् ॥३३॥ तत्रापश्यन्महार्म्यमाश्रमं मुनिसेवितम् । फलितैः पुष्पितैश्चैव शोभितं वृक्षसंचयैः ॥३४॥ गृणद्भिः परमं ब्रह्म शास्त्रचिंतापरैस्तथा । परिचर्यापरैर्वृद्धैर्मतिभिः परिशोभितम् ॥३५॥ शिष्यैः परिवृतं तत्र मुनिं जानंति संज्ञकम् । गृणंतं परमं ब्रह्म तेजोराशिं ददर्श ह ॥३६॥ शमादिगुणसंयुक्तं रागादिरहितं मुनिम् । शीर्णपर्णाशनं दृष्ट्वा वेदमालिर्ननाम तम् ॥३७॥ तस्य जानन्तिरागतोः कल्पयामास चार्हणम् । कंदमूलफलाद्यैस्तु नारायणधिया मुने ॥३८॥ कृतातिथ्यक्रियस्तेन वेदमाली कृतांजलिः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाच वदतां वरम् ॥३९॥ भगवन्कृतकृत्योऽस्मि विगते कल्मषं मम । मामुद्धर महाभाग ज्ञानदानेन पंडित ॥४०॥ एवमुक्तस्ततस्तेन जानन्तिर्मु निसत्तमः । प्रोवाच प्रहसन्वाग्मी वेदमालिं गुणान्वितम् ॥४१॥ शृणुष्व विप्रशार्दूल संसारच्छेदकारणम् । प्रवक्ष्यामि समासेन दुर्लभं त्वकृतात्मनाम् ॥४२॥ भज विष्णुं परं नित्यं स्मर नारायणं प्रभुम् । परापवादं पैशुन्यं कदाचिदपि मा कृथाः ॥४३॥ परोपकारनिरतः सदा भव महामते । हरिपूजाकरश्चैव त्यज मूर्खसमागमम् ॥४४॥ कामं क्रोधं च लोभं च मोहं च मदमत्सरौ । परित्यज्यात्मवल्लोकं दृष्ट्वा शांतिं गमिष्यसि ॥४५॥ असूयां परनिन्दां च कदाचिदपि मा कुरु । दंभाचारमहंकारं नैष्ठुर्यं च परित्यज ॥४६॥ दयां कुरुष्व भूतेषु शुश्रूषां च तथा सताम् । त्वया कृतांश्च धर्मान्त्वं मा प्रकाशय पृच्छताम् ॥४७॥ गंगा के तट पर अन्नदान की व्यवस्था की ॥३०-३२॥ इस प्रकार अपना सारा धन हरिभक्तों को बाँट दिया और स्वयं नरनारायण के स्थान की ओर (बदरिकाश्रम) में तपस्या करने के लिए चला गया ॥३३॥ वहाँ वन में जाकर उसने मुनियों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय आश्रम को देखा, जो फलफूलों से लदे हुए मनोहर वृक्षों से और अधिक रम्य जान पड़ता था ॥३४॥ उस आश्रम में परम ब्रह्म के गुणगान में निरत, शास्त्र चिन्तन में तल्लीन, भगवदाराधना में बेसुध वृद्ध तपस्वी मुनियों और शिष्यों से घिरे हुए जानंति नामक मुनि को देखा जिनकी सभी सेवा कर रहे थे । और जो स्वयं परम ब्रह्म का नाम जप करते हुए तेज पुंज के समान थे ॥३५-३६॥ हे मुनि ! शम आदि गुणों से युक्त, रागरहित और केवल सूखी पत्तियों को खाकर ही जीवन बिताने वाले उस मुनि को देखकर वेदमालि ने उन्हें प्रणाम किया और जानन्ति ने भी उस अतिथि वेदमाली का नारायण-भाव से कन्द मूल फल आदि के द्वारा सत्कार किया । वेदमाली मुनि का आतिथ्य स्वीकार करने के पश्चात् हाथ जोड़कर विनम्र भाव से उस वाग्मी शिरोमणि मुनि से बोला ॥३७-३६॥ भगवन् ! मैं कृतकृत्य हो गया, आपके दर्शन से मेरे सारे पाप दूर हो गए । पंडित ! महाभाग ! अब आप ज्ञान की दीक्षा देकर मेरा उद्धार कीजिए ॥४०॥ वेदमाली की इतनी बातें सुनकर वाग्मी मुनिवर हँस पड़े और उन्होंने उस गुणी अतिथि से कहा-॥४१॥ विप्रशार्दूल ! सुनो मैं भव बन्धन से मुक्त करने वाले उस ज्ञान को संक्षेप में सुना रहा हूँ, जो अविवेकियों के लिए सर्वथा दुर्लभ है । विष्णु का नित्य प्रति भजन करो, प्रभु नारायण का स्मरण करो और परनिन्दा तथा पिशुनता कभी भी न करो ॥४२-४३॥ महामति ! सदा परोपकार में लगे रहो, हरि पूजा को ही ध्येय समझो और मूर्खो की संगति न करो ॥४४॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को छोड़कर संसार को आत्मवत् समझो, ऐसे करने से तुम अवश्य शान्ति प्राप्त करोगे ॥४५॥ असूया और परनिन्दा कभी न करो । दंभ, अहंकार एवं निष्ठुरता को छोड़ दो, प्राणियों पर दया करो, सज्जनों की सेवा करो और अपने किये हुए धर्मों को पूछने पर अपने मुंह से न कहो ॥४६-४७॥ अपने सामने अनाचार होते देखकर शक्ति
पंचविंशोऽध्यायः २२६ अनाचारपरान्दृष्ट्वा नोपेक्षां कुरु शक्तितः । पूजयस्वातिथिं नित्यं स्वकुटुंबाविरोधतः ॥४८॥ पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि दूर्वाभिः पल्लवैरथ । पूजयस्व जगन्नाथं नारायणमकामतः ॥४९॥ देवान्ऋषीन्पितॄंश्चापि तर्पयस्व यथाविधि । अग्नेश्च विधिवद्विप्रं परिचर्यापरो भव ॥५०॥ देवतायतने नित्यं संमार्जनपरो भव । तथोपलेपनं चैव कुरुष्व सुसमाहितः ॥५१॥ शीर्णस्फुटितसंधानं कुरु देवगृहे सदा । मार्गशोभां च दीपं च विष्णोरायतने कुरु ॥५२॥ कंदमूलफलैर्वापि सदा पूजय माधवम् । प्रदक्षिणनमस्कारैः स्तोत्राणां पठनैस्तथा ॥५३॥ पुराणश्रवणं चैव पुराणपठनं तथा । वेदांतपठनं चैव प्रत्यहं कुरु शक्तितः ॥५४॥ एवं स्थिते तव ज्ञानं भविष्यत्युत्तमोत्तमम् । ज्ञानात्समस्तपापानां मोक्षो भवति निश्चितम् ॥५५॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्महामतिः । तथा ज्ञानरतो नित्यं ज्ञानलेशमवाप्तवान् ॥५६॥ वेदमालिः कदाचित्तु ज्ञानलेशप्रचोदितः । कोऽहं मम क्रिया केति स्वयमेव व्यचिंतयत् ॥५७॥ मम जन्म कथं जातं रूपं कीदृग्विधं मम । एवं निवारणपरो दिवानिशमतंद्रितः ॥५८॥ अनिश्चितमतिर्भूत्वा वेदमालिद्विजोत्तमः । पुनर्जानंतिमागम्य प्रणम्येदमुवाच ह ॥५९॥ वेदमालिरुवाच ममचित्तमतिभ्रांतं गुरो ब्रह्मविदां वर । कोऽहं मम क्रिया का च मम जन्म कथं वद ॥६०॥ जानंतिरुवाच सत्यं सत्यं महाभाग चित्तं भ्रांतं सुनिश्चितम् । अविद्यानिलयं चित्तं कथं सद्भावमेष्यति ॥६१॥ रहते उपेक्षा न करो। अपने कुटुम्ब को कुछ हानि किये बिना अतिथि को नित्य सेवा करो । निष्काम भाव से पत्र, पुष्प, फल, दूर्वा और पल्लव से विधिपूर्वक भगवान् को पूजा करो। विधिपूर्वक देव, ऋषि और पितरों का तर्पण करो। विप्र ! विधिवत् अग्नि की पूजा करो ॥४८-५०॥ देवमन्दिर में जाकर नित्य प्रति झाडू लगाओ और एकाग्र होकर उसको लीपो-पोतो। सदा देवमन्दिर की दरार या जीर्ण भाग की मरम्मत करो, विष्णु-मन्दिर में दीपक जलाओ और वन्दनबार लगाकर द्वारों को सजाओ ॥५१-५२॥ कन्दमूल, फल, प्रदक्षिणा नमस्कार, स्तुतिपाठ आदि से माधव की पूजा करो। प्रतिदिन शक्ति के अनुसार पुराण श्रवण, पुराण पाठ और वेदान्त का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने पर तुमको परमोत्तम ज्ञान प्राप्त होगा और ज्ञान द्वारा समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है यह निश्चित है ॥५३-५५॥ मुनि से इस प्रकार का उपदेश पाकर महामति वेदमालि जो पहले अज्ञानान्धकार में ही डूबा रहता था, ज्ञान का एक हल्का सा प्रकाश पा गया। किसी समय वह अपने उसी स्वल्पज्ञान की प्रेरणा से, मैं कौन हूँ, मेरा कर्त्तव्य क्या है, आदि बातों पर विचार करने लगा ॥५६-५७॥ (अनन्तर वह) प्रतिदिन आलस्य त्यागकर यही सोचा करता था कि 'मेरा जन्म कैसे हुआ, मेरा स्वरूप क्या है ? द्विजवर वेदमालि इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर न पाकर पुनः जानंति के पास आया और प्रणाम करके पूछा--॥५८-५९॥ वेदमालि ने पूछा-ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ! गुरुदेव ! मेरा कर्त्तव्य क्या है, मुझे सन्देह हो गया है कि मैं कौन हूँ, मेरा जन्म कैसे हुआ और आप कृपा करके इस सन्देह का निराकरण कीजिए ॥६०॥ जानन्ति बोले-महाभाग ! यह सत्य है, तुम्हारा चित्त भ्रम में पड़ गया यह निश्चित हो है। अज्ञान का स्थान चित्त भला कैसे सद्भाव प्राप्त करेगा ॥६१॥ जो 'यह मेरा है' ऐसा कहा जाता है यह भी भ्रम है।
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२३० | नारदीयपुराणम् ममेति गदितुं यत् तदपि भ्रान्तिरिष्यते । अहंकारो मनोधर्म आत्मनो नहि पंडित ॥६२॥ पुनश्च कोऽहमित्युक्तं वेदमाले त्वया तु यत् । मम जात्यादि शून्यस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६३॥ अनौपम्यस्वभावस्य निर्गुणस्य परमात्मनः । नीरूपस्याप्रमेयस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६४॥ परज्योतिःस्वरूपस्य परिपूर्णव्ययात्मनः । अविच्छिन्नस्वभावस्य कथ्यते च कथं क्रिया ॥६५॥ स्वप्रकाशात्मनो चित्र नित्यस्य परमात्मनः । अनंतस्य क्रिया चैव कथं जन्म च कथ्यते ॥६६॥ ज्ञानैकवेद्यमजरं परं ब्रह्म सनातनम् । परिपूर्णं परानंदं तस्मान्नान्यदिह द्विज ॥६७॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येभ्यो ज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । ज्ञाने त्वनाहते सिद्धे सर्वं ब्रह्ममयं भवेत् ॥६८॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्मुनीश्वर । सुमोद पश्यन्नात्मानमात्मन्येवाच्युतं प्रभुम् ॥६९॥ उपाधिरहितं ब्रह्म स्वप्रकाशं निरंजनम् । अहमेवेति निश्चित्य परां शांतिमवाप्तवान् ॥७०॥ ततश्च व्यवहारार्थं वेदमालिर्मुनीश्वरम् । गुरुं प्रणम्य जानंति सदा ध्यानपरोऽभवत् ॥७१॥ गते बहुतिथे काले वेदमालिर्मुनीश्वर । वाराणसीपुरं प्राप्य परं मोक्षमवाप्तवान् ॥७२॥ य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । स कर्मपाशविच्छेदं प्राप्य सौख्यमवाप्नुयात् ॥७३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे ज्ञाननिरूपणं नाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥३५॥
पंडित ! अहंकार मन का धर्म है आत्मा का नहीं ॥६२॥ वेदमाले ! फिर तुमने जो यह पूछा है कि 'मैं कौन हूँ' तो जाति आदि से शून्य आत्मा का नामकरण मैं कैसे कर सकता हूँ ॥६३॥ अनुपम स्वभाव वाले, निर्गुण, नीरूप, अप्रमेय परात्मा का नाम मैं कैसे बताऊँ ॥६४॥ परज्योतिस्वरूप, परिपूर्ण, अव्ययात्मा, और अविच्छिन्न प्रकृति वाले आत्मा की क्रिया को कैसे बताया जाय ? ॥६५॥ विप्र ! स्वप्रकाशात्मा, नित्य और अनन्त परमात्मा के जन्म कर्म के विषय में कैसे कहा जा सकता है ॥६६॥ द्विज ! ज्ञान के द्वारा ही एक मात्र जानने योग्य, अजर, अमर, परिपूर्ण, परानन्द सनातन ब्रह्म के अतिरिक्त कोई भी पदार्थ इस संसार में नहीं है ॥६७॥ 'तत्त्वमसि' [तुम (आत्मा) वही ब्रह्म हो ] इत्यादि वाक्यों से प्राप्त ज्ञान ही मोक्ष सिद्धि का प्रधान कारण है और इस नित्य ज्ञान के सिद्ध हो जाने पर सारा विश्व ब्रह्ममय दिखाई पड़ता है । मुनीश्वर ! इस प्रकार मुनि के ज्ञानोपदेश से उद्बुद्ध वेदमालि अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसने अपने में ही उपाधिरहित, निर्गुण, निरंजन, स्वप्रकाश ब्रह्म को देखा और 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर उसको अत्यधिक शान्ति मिली ॥६८-७०॥ इसके अनन्तर व्यवहार निर्वाह के लिए गुरु मुनीश्वर को प्रणाम कर वह सदा ध्यानमग्न रहने लगा । मुनीश्वर ! बहुत समय बीत जाने पर वह वेदमाली वाराणसीपुरी में गया जहाँ से उसको पर मोक्ष प्राप्त हो गया । जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता है या सुनता है, वह भी अपने कर्म बन्धन को तोड़कर परम सौख्य (मुक्ति) पाता है ॥७१-७३॥ श्रीनारदीय महापुराण में ज्ञान-निरूपण नामक पैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३५॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच वेदमालेः सुतौ प्रोक्तौ यावुभौ मुनिसत्तम । यज्ञमाली सुमाली च तयोः कर्माधुनोच्यते ॥१॥ तयोराद्यो यज्ञमाली विभेद पितृसंचितम् । धनं द्विधा कनिष्ठस्य भागमेकं ददौ तदा ॥२॥ सुमाली च धनं सर्वं व्यसनाभिरतः सदा । अपात्रानादिभिश्चैव नाशयामास भो द्विज ॥३॥ गीतवाद्यरतो नित्यं मद्यपानरतोऽभवत् । वेश्याविभ्रमलुब्धोऽसौ परदाररतोऽभवत् ॥४॥ सर्वस्मिन्नाशमायाते हिरण्ये पितृसंचिते । अपहृत्य परं द्रव्यं वारस्त्रीनिरतोऽभवत् ॥५॥ दृष्ट्वा सुमालिनः शीलं यज्ञमाली महामतिः । बभूव दुःखितोऽत्यर्थं भ्रातरं चेदमब्रवीत् ॥६॥ अलमत्यंतकष्टेन वृत्तेनास्मात्कुलेऽनुज । त्वमेक एव दुष्टात्मा महापापरतोऽभवः ॥७॥ एवं निवारयंतं तं बहुशो ज्येष्ठसोदरम् । हनिष्यामीति निश्चित्य खड्गहस्तः कचेऽग्रहीत् ॥८॥ ततो महारवो जज्ञे नगरे भृशदारुणः । बबंधुर्नागराश्चैनं कुपितास्ते सुमालिनम् ॥६॥ यज्ञमाली ह्युपेत्यात्मा पौरात्संप्रार्थ्य दुःखितः । बंधनान्मोचयामास भ्रातृस्नेहविमोहितः ॥१०॥ यज्ञमाली पुनश्चापि विभिदे स्वधनं द्विधा । आददे स्वयमर्द्धं च ददावर्द्धं यवीयसे ॥११॥ सुमाली त्वतिमूढात्मा तद्धनं चापि नारद । मूर्खैः पाखंडचंडालैर्बुभुजे च सहोद्धतः ॥१२॥ असतामुपभोगाय दुर्जनानां विभूतयः । पिचुमंदः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते ॥१३॥ अध्याय ३६ यज्ञमाली और सुमाली को उत्तम लोक की प्राप्ति सनक बोले--मुनिश्रेष्ठ ! वेदमालि के जिन यज्ञमाली और सुमाली नामक दो पुत्रों की चर्चा हुई है, अब इन दोनों के कर्मों के विषय में कह रहा हूँ ॥१॥ उन दोनों में से ज्येष्ठ पुत्र यज्ञमाली ने पितृसंचित संपत्ति को दो भागों में बाँट दिया। उनमें से एक भाग कनिष्ठ भ्राता सुमाली को दे दिया ॥२॥ द्विज, सर्वदा व्यसन में ही लगे रहने वाले सुमाली ने अपनी सारी संपत्ति व्यर्थ में लुटा दी । नित्य प्रति वह गाने बजाने में लगा रहता था । मदिरापान में निरत रहता था। वेश्याओं के विलास में फँसने के कारण परस्त्री गमन भी करता था ॥३-४॥ पिता के द्वारा संचित सब धन नष्ट हो जाने पर दूसरों का धन हरण कर वह वेश्यागमन में निरत रहने लगा ॥५॥ सुमाली के इस स्वभाव को देखकर महामति यज्ञमाली अत्यन्त दुःखी हो गया । उसने अपने भाई से कहा- 'हे भाई, इस कुल-विरुद्ध पापाचरण से अपने को रोको। देखो, तुम्हीं एक ऐसे अपने कुल में दुष्ट निकले जो इस प्रकार पापपरायण हो गए ॥६-७॥ ज्येष्ठ सहोदर के इस प्रकार बार बार मना करने पर उसने बड़े भाई को मार डालने का निश्चय कर हाथ में खड्ग लेकर केश पकड़ लिया ॥८॥ यह देखकर नगर में दारुण कोलाहल मच गया। नागरिकों ने कुपित होकर उस दुष्ट को बाँध दिया ॥९॥ भाई के प्रेम से वशीभूत होकर विशुद्ध मति ने नागरिकों को समझा बुझाकर भाई को छुड़ा दिया ॥१०॥ फिर उसने अपनी संपत्ति को दो भागों में बाँटा एक भाग तो स्वयं अपने ले लिया और शेष आधा भाग छोटे भाई को दे दिया ॥११॥ नारद ! मूढात्मा सुमाली ने उस धन को पाकर मूर्ख, पाखंडी और चाण्डालों में उसे उड़ा दिया। क्योंकि दुष्टों की संपत्ति का भोग प्रायः दुर्जन ही करते हैं, जैसे फल से लदे हुए नीम की निबौरी कौओं के ही काम आती है ॥१२-१३॥