भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२३ चंडालोऽपि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तो द्विजाधिकः । विष्णुभक्तिविहीनश्च द्विजोऽपि श्वपचाधमः ॥४१॥ तस्मात्कामादिकं त्यक्त्वा भजेत हरिमव्ययम् । यस्मिंस्तुष्टेऽखिलं तुष्येद्यतः सर्वगतो हरिः ॥४२॥ यथा हस्तिपदे सर्वं पदमात्रं प्रलीयते । तथा चराचरं विश्वं विष्णावेव प्रलीयते ॥४३॥ आकाशेन यथा व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम् । तथैव हरिणा व्याप्तं विश्वमेतच्चराचरम् ॥४४॥ जन्मनो मरणं नृणां जन्म वै मृत्युसाधनम् । उभे ते निकटे विद्धि तन्नाशं हरिसेवया ॥४५॥ ध्यातः स्मृतः पूजितो वा प्रणतो वा जनार्दनः । संसारपाशविच्छेदी कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥४६॥ यन्नामोच्चारणादेव महापातकनाशनम् । यं समभ्यर्च्य विप्रर्षे मोक्षभागी भवेन्नरः ॥४७॥ अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रमिदं द्विज । हरिनाम्नि स्थिते लोकः संसारे परिवर्तते ॥४८॥ भूयोभूयोऽपि वक्ष्यामि सत्यमेतत्तपोधन । नीयमानो यमभटैरशक्तो धर्मसाधनैः ॥४६॥ यावन्नेन्द्रियवैकल्यं यावद्व्याधिर्न बाधते । तावदेवार्चयेद्विष्णुं यदि मुक्तिमभीप्सति ॥५०॥ मातुर्गर्भाद्विनिष्क्रान्तो यदा जन्तुस्तदैव हि । मृत्युः संनिहितो भूयात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ॥५१॥ अहो कष्टमहो कष्टमहोकष्टमिदं वपुः । विनश्वरं समाज्ञाय धर्मं नैवाचरत्ययम् ॥५२॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । दम्भाचारं परित्यज्य वासुदेवं समर्चयेत् ॥५३॥ भूयो भूयो हितं वच्मि भुजमुद्धृत्य नारद । विष्णुः सर्वात्मना पूज्यस्त्याज्यासूया तथानृतम् ॥५४॥ क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् । धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५५॥ भी यदि विष्णु भक्त है तो वह ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है, विष्णु भक्ति के बिना ब्राह्मण श्वपच (चाण्डाल) से भी गया बीता है ॥४१॥ इन कामादि दोषों को छोड़कर अव्यय हरि का भजन करना चाहिए, जिसके प्रसन्न हो जाने पर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि विष्णु तो सर्वदेवमय और व्यापक हैं ॥४२॥ जिस प्रकार हाथी के पैर में सब जन्तुओं के पैर विलीन हो जाते हैं अर्थात् बड़े होने के कारण उसके पदचिह्न में सब जन्तुओं के पद चिह्न समा- विष्ट हो जाते हैं ॥४३॥ जिस प्रकार आकाश से सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् व्याप्त है उसी प्रकार भगवान् से यह सचराचर जगत् व्याप्त है ॥४४॥ मनुष्यों का जन्म मृत्यु का और मृत्यु जन्म का साधन है । इन दोनों का निकटतम संबन्ध है । इस जन्म मृत्यु का नाश केवल हरि की सेवा से ही हो सकता है ॥४५॥ जनार्दन के ध्यान, स्मरण, पूजा और वन्दना से संसार बन्धन से छुटकारा अवश्य मिल जाता है । इसलिए कौन ऐसा अभागा होगा जो उसकी पूजा नहीं करेगा ? जिसके नामोच्चारण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते हैं, विप्रर्षि ! जिसकी अर्चना करने से मनुष्य मोक्षभागी होता है उसकी पूजा मनुष्य क्यों न करे ॥४६-४७॥ द्विज ! यह आश्चर्य की बात है, अत्यन्त आश्चर्य है कि हरिनाम के रहते हुए भी मनुष्य संसार सागर में डूबता रहता है । तपोधन ! यह मैं बार-बार जोर देकर कहा रहा हूँ यह सत्य है कि धर्म साधन से हीन प्राणी यम दूतों द्वारा तो जाया जाता है ॥४८-४६॥ जब तक इन्द्रियां शिथिल नहीं है, जब तक शरीर रोग ग्रस्त नहीं है तब तक ही मोक्षाभिलाषी मनुष्य विष्णु की पूजा कर ले ॥५०॥ ज्यों ही जीव माता के गर्भ से बाहर आता है त्योंही मृत्यु उसके पीछे लग जाती है इसलिए सर्वदा धर्म तत्पर रहना चाहिए ॥५१॥ यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस शरीर को नश्वर समझकर भी मनुष्य धर्माचरण नहीं करता है ॥५२॥ मैं भुजा उठाकर यह घोषणा करता हूँ कि मनुष्य दंभाचार को छोड़ कर वासुदेव की पूजा करे यह एक चिर सत्य सिद्धान्त है ॥५३॥ नारद ! मैं भुजा उठाकर बार बार इस हितकर वचन को कह रहा हूँ कि विष्णु की सर्वतोभावेन पूजा करनी चाहिए, असूया और असत्य को पास नहीं फटकने देना चाहिए ॥५४॥ क्रोध से मनः सन्ताप होता है और क्रोध ही संसार-बन्धन का कारण है । क्रोध से ही धर्म क्षय भी होता है, काम इस जन्म का कारण है और काम ही पाप का कारण है । यश को नष्ट करने वाला भी काम