बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२२ नारदीयपुराणम्
तस्माच्छृणुष्व देवर्षे भजस्व सततं हरिम् । मा कुरुष्व ह्यहंकारं विद्युल्लोलश्रिया वृथा ॥२६॥ शरीरं मृत्युसंयुक्तं जीवितं चातिचञ्चलम् । राजादिभिर्धनं बाध्यं सम्पदः क्षणभंगुराः ॥२७॥ किं न पश्यसि देवर्षे ह्यायुषार्द्धं तु निद्रया । हृतं च भोजनाद्यैश्च कियदायुः समाहृतम् ॥२८॥ कियदायुर्बालभावाद् वृद्धावाक्यिद्वृथा । कियदिन्द्रियभोगैश्च कदा धर्मान्करिष्यति ॥२९॥ बालभावे च वार्द्धक्ये न घटेताच्युतार्चनम् । वयस्येव ततो धर्मान्कुरु त्वमनहंकृतः ॥३०॥ मा विनाशं व्रज मुने मग्नः संसारगह्वरे । वपुर्विनाशनिलयमपदां परमं पदम् ॥३१॥ शरीरं भोगनिलयं मलाद्यैः परिदूषितम् । किमर्थं शाश्वतधिया कुर्यात्पापं नरो वृथा ॥३२॥ आसारभूते संसारे नानादुःखसमन्विते । विश्वासो नात्र कर्तव्यो निश्चितं मृत्युसंकुले ॥३३॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् । देहयोगनिवृत्त्यर्थं सद्य एव जनार्दनम् ॥३४॥ मानं त्यक्त्वा तथा लोभं कामक्रोधविवर्जितः । भजस्व सततं विष्णुं मानुष्यमतिदुर्लभम् ॥३५॥ कोटिजन्मसहस्रेषु स्थावरादिषु सत्तम । संभ्रांतस्य तु मानुष्यं कथंचित्परिलभ्यते ॥३६॥ तत्रापि देवताबुद्धिर्दानबुद्धिश्च सत्तम । भोगबुद्धिस्तथा नृणां जन्मान्तरतपःफलम् ॥३७॥ मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य यो हरिं नार्चयेत्सकृत् । मूर्खः कोऽस्ति परस्तस्माज्जडबुद्धिरचेतनः ॥३८॥ दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं नार्चयन्ति च ये हरिम् । तेषामतीव मूर्खाणां विवेकः कुत्र तिष्ठति ॥३९॥ आराधितो जगन्नाथो ददात्यभिमतं फलम् । कस्तं न पूजयेद्विप्रसंसाराग्निप्रदीपितः ॥४०॥
हैं उन पर केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥२५॥ इसलिए, देवर्षिनारद ! सुनो, तुम सर्वदा हरि को भजो, विद्युत के समान क्षणभंगुर सम्पत्ति को पाकर कभी भी अहंकार न करो ॥२६॥ यह शरीर सर्वदा मृत्यु से घिरा रहता है, जीवन अत्यन्त चंचल है, राजा आदि से प्राप्त धन और संपत्ति सब कुछ क्षणभंगुर है ॥२७॥ देवर्षि ! क्या यह नहीं देखते कि आयु का आधा भाग निद्रा में ही चला जाता है, भोजन आदि में आयु का कितना अंश बीत जाता है यह भी प्रत्यक्ष ही है ॥२८॥ शैशव और बुढ़ापे में कितना व्यर्थ समय बीत जाता है ? कितना अंश तो विषय भोग में ही नष्ट हो जाता है तो बताओ कब तुम धर्माचरण करोगे ? ॥२९॥ बचपन और बुढ़ापे में भगवान् की पूजा तो हो नहीं सकती, इसलिए तुम युवावस्था में ही धर्माचरण करो ॥३०॥ मुनिवर ! इस संसार- कुण्ड में मग्न होकर आत्मविनाश मत करो। यह शरीर विनाश का घर है और आपत्तियों का परम स्थान है ॥३१॥ यह शरीर विषय भोग का अड्डा है और मलमूत्र आदि से दूषित है। इसलिए मनुष्य व्यर्थ में इसको शाश्वत समझकर क्यों पाप करे ? ॥३२॥ इस असार, नाना दुःखों से भरे और मृत्यु पाश में बँधे हुए संसार का विश्वास नहीं करना चाहिए ॥३३॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, तुमसे यथार्थ बात बता रहा हूँ। इस जन्म मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए तत्काल अहंकार और लोभ को छोड़कर कामक्रोध को दूर हटाकर जनार्दन विष्णु को सर्वदा भजो । मानव-जीवन सचमुच ही अत्यन्त दुर्लभ है ॥३४-३५॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्थावरादि योनियों में करोड़ों जन्म तक भ्रमण करने के बाद कहीं किसी प्रकार मानव-जीवन प्राप्त होता है। इस जीवन में भी देवों में श्रद्धा, दान की प्रवृत्ति और भोगबुद्धि मनुष्यों को जन्मान्तर की तपस्या से प्राप्त होती है ॥३६-३७॥ जो दुर्लभ मनुष्य देह प्राप्त करके हरि की एक बार भी पूजा नहीं करता उससे बढ़कर जड़बुद्धि, चेतनाहीन और मूर्ख कौन होगा ? ॥३८॥ जो दुर्लभ मानव जीवन को पाकर हरि की पूजा नहीं करते उन प्रचण्ड मूर्खों का विवेक कहाँ रहता है ? ॥३९॥ पूजा द्वारा भगवान् जगन्नाथ संतुष्ट होकर मनुष्य को इष्ट फल प्रदान करते हैं, विप्र ! तो कौन ऐसा होगा जो संसार ज्वाला से दग्ध होकर भी भगवदाराधना करना नहीं चाहेगा ? ॥४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! चाण्डाल