बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२१ संसारपाशे सुदृढं महामोहप्रदाय कम् । हरिभक्तिकुठारेण च्छित्वात्यन्तसुखी भव ॥११॥ तन्मनः संयुक्तं विष्णौ सा वाणी मत्परायणा । ते श्रोत्रे तत्कथासारपूरिते लोकवंदिते ॥१२॥ आनन्दमक्षरं शून्यमवस्थां त्रितयेऽपि । आकाशमध्यगं देवं भज नारद संततम् ॥१३॥ स्थानं न शक्यते यस्य स्वरूपं वा कदाचन । निर्देष्टुं मुनिशार्दूल द्रष्टुं वाथ कृतात्मभिः ॥१४॥ समस्तैः करणैर्युक्तो वर्त्ततेऽसौ यदा तदा । जाग्रदित्यप्युच्यते सद्भीरन्तर्यामी सनातनः ॥१५॥ यदान्तःकरणैर्युक्तः स्वेच्छया विलत्यसौ । स्वप्नन्नित्युच्यते ह्यात्मा यदा स्वापविवर्जितः ॥१६॥ न बाह्यकरणैर्युक्तो न चान्तःकरणैस्तथा । अस्वरूपो यदात्मासौ पुण्यापुण्यविवर्जितः ॥१७॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो ह्यानंदो निर्गुणो विभुः । परब्रह्ममयो देवः सुषुप्त इति गीयते ॥१८॥ भावनामयमेतद्वै जगत्स्थावरजङ्गमम् । विद्युल्लोलं विप्रेन्द्र भज तस्माज्जनार्दनम् ॥१९॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यापरिग्रहौ । वर्त्तते यस्य तस्यैव तुष्यते जगतां पतिः ॥२०॥ सर्व्वभूतदयायुक्तो विप्रपूजापरायणः । तस्य तुष्टो जगन्नाथो मधुकैटभमर्द्दनः ॥२१॥ सत्कथायां च रमते सत्कथां च करोति यः । सत्सङ्गे निरहंकारस्तस्य प्रीतो रमापतिः ॥२२॥ नामसंकीर्त्तनं विष्णो क्षुत्तृट्प्रस्खलितादिषु । करोति सततं यस्तु तस्य प्रीतो ह्यधोक्षजः ॥२३॥ या तु नारी पतिप्राणा पतिपूजापरायणा । तस्यास्तुष्टो जगन्नाथो ददाति स्वपदं मुने ॥२४॥ असूयारहिता ये तु ह्यहंकारविवर्जिताः । देवपूजापरायश्चैव तेषां तुष्यति केशवः ॥२५॥ में हरि पूजा ही सत्य है ॥१०॥ यह संसार का पाश अत्यन्त सुदृढ़ है और महामोह में डालने वाला है । इसलिए हरिभक्ति रूपी कुल्हाड़ी से इसको काटकर अत्यन्त सुखी हो जाओ ॥११॥ वही मन प्रशंसनीय है जो विष्णु में लगा रहता है, वही वाणी वाणी है जो प्रभु का गुणगान करती रहती है। वे ही कान धन्य है जो विष्णु के कथासार से भरे रहते हैं ॥१२॥ नारद ! तीनों अवस्थाओं (जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति) में आनन्द, अक्षर, शून्य और आकाश मध्यगामी देव (विष्णु) का सर्वदा भजन करो । मुनिशार्दूल ! उस ब्रह्म के स्थान, स्वरूप का निर्देश अवश्यात्म। जन कभी भी नहीं कर सकते हैं, (उनके लिए) दर्शन पाना तो दूर की वस्तु है ॥१३-१४.। जिस समय सनातन अन्तर्यामी आत्मा समस्त इन्द्रियों से युक्त रहता है उस अवस्था को सज्जन जाग्रत कहते हैं ॥१५॥ जिस समय आत्मा अन्तःकरण के साथ इच्छा पूर्वक इधर उधर विचरता रहता है सोता नहीं उसको स्वप्नावस्था कहते हैं ॥१६॥ बाह्य और अन्तःकरण से सर्वथा विमुक्त रहकर यह आत्मा जब अस्वरूप, पुण्यापुण्य से रहित हो जाता है तो उस अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं। सब उपाधियों से मुक्त, आनन्द, निर्गुण, विभु, पर ब्रह्ममय देव ही सुषुप्त कहा जाता है ॥१७-१८॥ इसलिए हे विप्रेन्द्र ! यह स्थावर जंगमात्मक जगत् चंचला के समान चंचल है, इसलिए तुम अपनी भावना में सर्वदा ईश्वर का भजन करो ॥१९॥ जिसके पास अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह की निधि है उसी पर लोक-प्रभु प्रसन्न रहते हैं ॥२०॥ सब प्राणियों पर दया करने वाले, विप्र- पूजा परायण व्यक्ति पर मधु कैटभसंहारी विष्णु सर्वदा प्रसन्न रहते हैं ॥२१॥ जो सत्कथा में सर्वदा रमता रहता, सर्वदा सत्कथा को ही सुनता रहता और अहंकार रहित होकर सत्संगति से प्रेम करता है उसके ऊपर रमापति भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥२२॥ जो भूख, प्यास और वाक् स्खलन के समय भी विष्णु का नाम स्मरण करता है, उसके ऊपर भगवान् अधोक्षज प्रसन्न रहते हैं ॥२३॥ मुने ! जो नारी पतिव्रता और पतिपूजा परायण होती है, उस पर भगवान् प्रसन्न होकर परमपद दे देते हैं ॥२४॥ जो ईर्ष्या और अहंकार से दूर रह कर देव-पूजा में सर्वदा लगे रहते