भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

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२२४ नारदीयपुराणम् काममूलमिदं जन्म कामः पापस्य कारणम् । यशः क्षयकरः कामस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५६॥ समस्तदुःखजालानां मात्सर्यं कारणं स्मृतम् । नरकाणां साधनं च तस्मात्तदपि संत्यजेत् ॥५७॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । तस्मात्तदमिसंयोज्य परात्मनि सुखी भवेत् ॥५८॥ अहो धैर्पमहो धैर्यमहो धैर्यमहो नृणाम् । विष्णौ स्थिते जगन्नाथे न भजंति मदोद्धता ॥५६॥ अनाराध्य जगन्नाथं सर्वधातारमच्युतम् । संसारसागरे मग्नाः कथं पारं प्रयांति हि ॥६०॥ अच्युतानंदगोविंदनामोच्चारणभेषजात् । नश्यंति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥६१॥ नारायण जगन्नाथ वासुदेव जनार्दन । इतीरयन्ति ये नित्यं ते वै सर्वत्र वन्दिताः ॥६२॥ अद्यापि च मुनिश्रेष्ठ ब्रह्माद्या अपि देवताः । यत्प्रभावं न जानन्ति तं याहि शरणं मुने ॥६३॥ अहो मौर्यमहो मौर्यमहो मौर्य दुरात्मनाम् । हृत्पद्मसंस्थितं विष्णुं न विजानन्ति नारद ॥६४॥ शृणुष्व मुनिशार्दूल भूयोभूयो वदाम्यहम् । हरिः श्रद्धावतां तुष्येन्न धनेर्न च बान्धवैः ॥६५॥ बन्धुमत्त्वं धनाढ्यत्वं पुत्रवत्त्वं च सत्तम । विष्णुभक्तिमतां नॄणां भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥६६॥ पापमूलमयं देहः पापकर्मरतस्तथा । एतद्विदित्वा सततं पूजनीयो जनार्दनः ॥६७॥ पुत्रमित्रकलत्राद्या बहवः स्युश्च संपदः । हरिपूजारतानां तु भवत्येव न संशयः ॥६८॥ इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेत्सततं हरिम् । इहामुत्रासुखप्रेप्सुः परनिन्दापरो भवेत् ॥६६॥ धिग्जन्म भक्तिहीनानां देवदेवे जनार्दने । सत्पात्रदानशून्यं यत्तद्धनं धिक्पुनः पुनः ॥७०॥ न नमेद्विष्णवे यस्य शरीरं कर्मभेदिने । पापानामाकरं तद्वै विज्ञेयं मुनिसत्तम ॥७१॥ ही है, इसलिए काम को कभी भी पास न आने दो ॥५५-५६॥ मात्सर्य समस्त दुःख-समूह का एक मात्र कारण है। यही नरकों की ओर भी ले जाने वाला है। इसलिए इसको भी छोड़ दो ॥५७॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है इसलिए इसको परमात्मा में लगा कर सुखी होना चाहिए ॥५८॥ अहो ! यह मनुष्यों की आश्च- चर्य जनक जड़ता या धीरता है कि जगत्पति विष्णु के रहते हुए भी मनुष्य मदोद्धत होकर उनका भजन नहीं करते ॥५६॥ सबके पालक जगन्नाथ की आराधना के बिना संसार-सागर में डूबे हुए मनुष्य कैसे भवसागर के पार जा सकते हैं ? ॥६०॥ यह सत्य कह रहा हूँ, सत्य कह रहा हूँ कि अच्युतानन्द, गोविन्दनामोच्चारण रूपी ओषधि से ही संसार के सब रोग नष्ट होते हैं ॥६१॥ नारायण, जगन्नाथ, वासुदेव, जनार्दन आदि नामों का जो उच्चारण करते हैं वे सर्वत्र सम्मानित होते हैं ॥६२॥ मुनिश्रेष्ठ ! आजतक ब्रह्मा आदि देवता जिसके प्रभाव को नहीं जानते हैं, मुने ! उसी की शरण में जाओ ॥६३॥ नारद ! दुष्टों की यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि हृदय रूपी कमल में स्थित विष्णु को वे नहीं जानते ॥६४॥ मुनिशार्दूल ! सुनो, मैं यह बार बार कह रहा हूँ कि भगवान् श्रद्धालु भक्तों पर ही प्रसन्न होते हैं धन और बड़े परिवार वाले मनुष्य पर नहीं ॥६५॥ सज्जनाग्रणी ! विष्णु-भक्तों को जन्म जन्मान्तर में कुटुम्ब, धन, पुत्र आदि प्राप्त होते हैं ॥६६॥ यह मानव शरीर पापों का मूल है और इसके द्वारा सर्वदा पाप कर्मों में अभिरुचि बनी रहती है, यह जानकर जनार्दन की सर्वदा पूजा करनी चाहिए ॥६७॥ पुत्र, मित्र, कलत्र आदि और बहुत प्रकार की संपत्तियां हरिपूजापरायण व्यक्तियों को अवश्य प्राप्त होती हैं ॥६८॥ लोक, परलोक सर्वत्र सुख चाहने वाला व्यक्ति हरि की सर्वदा पूजा करे और कष्ट चाहने वाला दूसरों की निन्दा किया करे ॥६९॥ देवाधिदेव जनार्दन की भक्ति न करने वाले व्यक्ति के जीवन को धिक्कार है और सत्पात्र को दान न देने वाले के धन को बार बार धिक्कार है ॥७०॥ मुनिश्रेष्ठ ! कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने वाले विष्णु के सामने जिसका शरीर नहीं झुका उसको पापों की खान समझना चाहिए ॥७१॥ सत्पात्र को