भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

पञ्चविंशोऽध्यायः २२५ सत्पात्रदानरहितं यद्द्रव्यं येन रक्षितम् । चौर्येण रक्षितमिव विद्धि लोकेषु निश्चितम् ॥७२॥ तडिल्लोलश्रिया मत्ताः क्षणभंगुरशालिनः । नाराधयंति विश्वेशं पशुपालविमोचकम् ॥७३॥ सृष्टिस्तु द्विविधा प्रोक्ता दैवासुरविभेदतः । हरिभक्तियुता दैवी तद्धीनाह्यासुरो मता ॥७४॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र हरिभक्तपरायणाः । श्रेष्ठाः सर्वत्र विख्याता यतो भक्तिः सुदुर्लभा ॥७५॥ असूयारहिता ये च विप्रत्राणपरायणाः । कामादिरहिता ये च तेषां तुष्यति केशवः ॥७६॥ संमार्जनादिना ये तु विष्णुशुश्रूषणे रताः । सत्पात्रदाननिरताः प्रयांति परमं पदम् ॥७७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे हरिभक्तिलक्षणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३४॥ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच पुनर्वक्ष्यामि माहात्म्यं देवदेवस्य चक्रिणः । पठतां शृण्वतां सद्यः पापराशिः प्रणश्यति ॥१॥ शांता जितारिषड्वर्गा योगेनाप्यनहंकृताः । यजंति ज्ञानयोगेन ज्ञानरूपिणमव्ययम् ॥२॥ तीर्थस्नानर्विशुद्धा ये व्रतदानतपोमखैः । यजंति कर्मयोगेन सर्वधातारमच्युतम् ॥३॥ दान न देकर जिस द्रव्य को सुरक्षित रखा गया उसको संसार में चोर की कमाई हुई और उसके द्वारा रक्षित संपत्ति समझना चाहिए ॥७२॥ बिजली के समान चंचल शोभा वालो लक्ष्मी को पाकर मदमत्त हो जाने वाले मरणशील प्राणी पशु आदि योनियों से मुक्त करने वाले विश्वेश की आराधना नहीं करते हैं, यह एक दुर्भाग्य की बात है ॥७३॥ दैव और आसुर भेद से सृष्टि दो प्रकार की होतो है। हरि भक्ति से युक्त सृष्टि दैवी और इससे शून्य सृष्टि आसुरी मानी जाती है ॥७४॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, हरिभक्तिपरायण मनुष्य सर्वत्र आदर पाते हैं ; क्योंकि भक्ति संसार में अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ है ॥७५॥ जो ईर्ष्या द्वेष से दूर रहते, और सदा ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं और काम आदि दोषों से अलग रहते हैं उनसे केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥७६॥ जो मन्दिर की झाड़ू आदि से सफाई कर भगवान् को सेवा किया करते हैं और सत्पात्रों को दान दिया करते हैं, वे परम पद को प्राप्त करते हैं ॥७७॥ श्रीनारदीयमहापुराण में हरिभक्तिलक्षणवर्णन नामक चौतीसवां अध्याय समाप्त ॥३४॥ अध्याय ३५ ज्ञान का निरूपण सनक बोले--अब इसके बाद फिर मैं देवों के देव भगवान् विष्णु का माहात्म्य कह रहा हूँ जिसको सुनने और पढ़ने से शीघ्र ही पाप-समूह नष्ट हो जाता है ॥१॥ शान्त, काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतने वाले और योग के द्वारा अहंकार पर विजय पाने वाले महापुरुष ज्ञान योग के द्वारा ज्ञान रूप अव्यय परमात्मा की आराधना करते हैं ॥२॥ जिनका तीर्थ, स्नान, व्रत, दान, तपस्या और यज्ञों से अन्तःकरण विशुद्ध है वे कर्मयोग से निखिल भुवन पालक भगवान् की आराधना करते हैं ॥३॥ २९-मार०