बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ नारदीयपुराणम् लुब्धा व्यसनिनोऽज्ञाश्च न यजन्ति जगत्पतिम् । अजरामरवन्मूढास्तिष्ठंति नरकीटकाः ॥४॥ तडिल्लेखाश्रिया मत्ता वृथाहंकारदूषिताः । न यजन्ति जगन्नाथं सर्वश्रेयोविधायकम् ॥५॥ हरिधर्मरताः शांता हरिपादाम्बुजसेवकाः । दैवात्केऽपीह जायंते लोकानुग्रहतत्पराः ॥६॥ कर्मणा मनसा वाचा यो यजेद्भक्तितो हरिम् । स याति परमं स्थानं सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥७॥ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥८॥ तत्प्रवक्ष्यामि चरितं यज्ञमालिसुमालिनोः । यस्य श्रवणमात्रेण वाजिमेधफलं लभेत् ॥९॥ कश्चिदासीत्पुरा विप्र ब्राह्मणो रैवतेंऽतरे । वेदमालिरिति ख्यातो वेदवेदांगपारगः ॥१०॥ सर्वभूतदयायुक्तो हरिपूजापरायणः । पुत्रमित्रकलत्रार्थं धनार्जनपरोऽभवत् ॥११॥ अपण्यविक्रयं चक्रे तथा च रसविक्रयम् । चंडालाद्यैरपि तथा संभावी तत्प्रतिग्रही ॥१२॥ तपसां विक्रयं चक्रे व्रतानां विक्रयं तथा । परार्थे तीर्थगमनं कलत्रार्थमकारयत् ॥१३॥ कालेन गच्छता विप्र जातौ तस्य सुतावुभौ । यज्ञमाली सुमाली च यमलावतिशोभनौ ॥१४॥ ततः पिता कुमारौ तावतिस्नेहसमन्वितः । पोषयामास वात्सल्याद्बहुभिः साधनैस्तदा ॥१५॥ वेदमालिर्बहुपायैर्धनं संपाद्य यत्नतः । स्वधनं गणयामास कियत्स्यादिति वेदितुम् ॥१६॥ निधिकोटिसहस्राणां कोटिकोटिगुणान्वितम् । विगणय्य स्वयं हृष्टो विस्मितश्चार्थचिंतया ॥१७॥ लोभी, व्यसनप्रिय और अज्ञानी जगत्पति की पूजा नहीं करते। ऐसे नरपशु उलटे अपने को अजर-अमर समझकर जड़ की भाँति पड़े रहते हैं। विद्युल्लेखा के समान चंचल लक्ष्मी से मतवाले और व्यर्थ अहंकार से दूषित लोग सर्वकल्याणकारी संसार के स्वामी भगवान् की पूजा नहीं करते हैं ॥४॥ भगवान् की कृपा से ही वैष्णव, शान्त, भगवान्, के चरण कमल की सेवा करने वाले, तथा लोककल्याणकारी कुछ महापुरुष इस लोक में जन्म लेते हैं ॥५-६॥ जो मन, वचन और कर्म से भगवान् हरि की उपासना करते हैं वे सब लोकों से श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करते हैं ॥७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसके पठन और श्रवण से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं उस यज्ञमाली और सुमाली के चरित्र को सुना रहा हूँ जिसके सुनने से ही अश्वमेध का फल प्राप्त हो जाता है ॥८-६॥ विप्र ! बहुत दिनों की बात है, रैवत प्रदेश में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम वेदमालि था जो वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् था। वह हरि-पूजा का प्रेमी और सब प्राणियों पर दया करने वाला व्यक्ति था। कुछ समय के बाद वह पुत्र, मित्र और स्त्री के पालन के लिए धन कमाने के फेर में पड़ा ॥१०-११॥ अपने कुल-धर्म की ओर ध्यान न देकर उसने निषिद्ध वस्तुओं और रस (मद्य) को बेचा। लोभ में पड़कर चाण्डाल आदि से बात-चीत करता और उनसे दान भी लेता था। पैसे के लिए दूसरे के निमित्त तीर्थ यात्रा भी करता था ॥१२-१३॥ विप्र ! कुछ समय बीतने पर उसको यज्ञमाली और सुमाली नामक दो अत्यन्त सुन्दर जुड़वां पुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर वेद माली ने उन दोनों पुत्रों को बड़े प्यार से प्रत्येक सम्भवसाधनों से पालन पोषण किया ॥१४-१५॥ उसने बड़े परिश्रम से अनेकों उपायों से धन कमाया। एक दिन वह अपनी उपार्जित सम्पति का ठीक ठीक परिमाण जानने के लिए अपने धन को गिनने लगा। हजारों करोड़ों की संख्या में अपनी संपत्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर भी अर्थलोभ की ओर अपने मन को खिचाव देखकर विस्मित होकर सोचने लगा ॥१६-१७॥