बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चत्रिंशोऽध्यायः २२७ असत्प्रतिग्रहैश्चैव अपण्यानां च विक्रयैः । मया तपो विक्रयाद्यैरेतद्धनमुपार्जितम् ॥१८॥ नाद्यापि शांतिमापन्ना मम तृष्णातिदुःसहा । मेरुतुल्यसुवर्णानि ह्यसंख्यातानि वांछति ॥१९॥ अहो मन्ये महाकष्टं समस्तक्लेशसाधनम् । सर्वान्कामानवाप्नोति पुनरन्यच्च कांक्षति ॥२०॥ जीर्यति जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः । चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥२१॥ ममेंद्रियाणि सर्वाणि मंदभावं व्रजंति च । बलं हतं च जरसा तृष्णा तरुणतां गता ॥२२॥ कष्टआशा वर्त्तते यस्य स विद्वानथ पंडितः । सुशांतोऽपि प्रमन्युः स्याद्धीमानप्यतिमूढधीः ॥२३॥ आशा भंगकरी पुंसामजेयारातिसन्निभा । तस्मादाशां त्यजेत्प्राज्ञो यदिच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥२४॥ बलं तेजो यशश्चैव विद्यां मानं च वृद्धताम् । तथैव सत्कुले जन्म आशा हंत्यतिवेगतः ॥२५॥ नृणामाशाभिभूतानामाश्चर्यमिदमुच्यते । किंचिद्दातापि चांडालस्तस्मादधिकतां गतः ॥२६॥ आशाभिभूता ये मर्त्या महामोहा महोद्धताः । अवमानादिकं दुःखं न जानंति कदाप्यहो ॥२७॥ मयाप्येवं बहुक्लेशैरेतद्धनमुपार्जितम् । शरीरमपि जीर्णं च जरसापहृतं बलम् ॥२८॥ इतः परं यतिष्यामि परलोकार्थमादरात् । एवं निश्चित्य विप्रेंद्र धर्ममार्गरतोऽभवत् ॥२९॥ तदैव तद्धनं सर्वं चतुर्द्धा व्यभजत्तथा । स्वयं तु भागद्वितयं स्वार्जितादर्थादपाहरत् ॥३०॥ शेषं च भागद्वितयं पुत्रयोरुभयोर्ददौ । स्वेनार्जितानां पापानां नाशं कर्तुमनास्तदा ॥३१॥ प्रपातडागारामंश्च तथा देवगृहान्बहून् । अन्नादीनां च दानानि गंगातीरे चकार सः ॥३२॥ "आश्चर्य है कि मैंने असत् पात्रों से दान लिया, निषिद्ध वस्तुओं को बेंचा और अपनी तपस्या को बेंचा । इसप्रकार मैंने इतनी संपत्ति प्राप्त की । परन्तु अब तक मुझको शान्ति नहीं मिली प्रत्युत दिनानुदिन दुःसह तृष्णा होती जाती है । सुमेरु के बराबर असंख्य सुवर्ण राशि की इच्छा होती है ॥१८-१९॥ अहो ! यह बड़े कष्ट की बात है और समस्त दुःखों का यही एक मात्र कारण है कि मनुष्य ज्यों-ज्यों अपने मनोरथों को पाता जाता है त्यों-त्यों नई-नई आकांक्षायें बढ़ती जाती हैं । बुढ़ापे में बाल सफेद हो जाते, दांत टूट जाते, आँखें और कान भी जवाब दे देते हैं परन्तु केवल एक तृष्णा ही तरुण होती जाती है, अर्थात् बुढ़ापे में सब अंग तो शिथिल हो जाते पर तृष्णा बढ़ती ही जाती है ॥२०-२१॥ मेरी सब इन्द्रियाँ तो धीरे-धीरे शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे के कारण शक्ति भी नहीं रह गई परन्तु केवल तृष्णा नवीन होती जा रही है जिसको यह कष्ट दायिनी आशा (तृष्णा) हो जाती है चाहे वह विद्वान् हो, पंडित हो, परमधीर हो परन्तु वह भी क्रोधी हो जाता है, बुद्धिमान् भी इसके आगे मूढ़ हो जाता है ॥२२-२३॥ आशा पुरुषों को विनष्ट करने वाली है, अजेय है और शत्रु के समानघातक है; इसलिए शाश्वत सुख की इच्छा करने वाले मनस्वी जन यदि अपना कल्याण चाहते हों तो तृष्णा को अवश्य छोड़ दें ॥२४॥ बल, तेज, यश, विद्या, गर्व, वृद्धता और उसी प्रकार कुलीनता आदि को आशा शीघ्र नष्ट कर देती है ॥२५॥ आशा के बन्धन में बंधे मनुष्यों की स्थिति देखकर आश्चर्य के साथ कहना पड़ता है कि थोड़ा धन दान करने वाले चाण्डाल से दान लेकर उन्होंने अपने को चाण्डाल से भी हीन बना दिया ॥२६॥ जो मनुष्य आशा से अभिभूत, महामोह में पड़े मदोद्धत हैं वे अपमान आदि के दुःखों को कभी भी नहीं जानते हैं ॥२७॥ मैंने इसी प्रकार अत्यन्त कष्ट सहकर इतनी प्रचुर संपत्ति कमाई है, इसी कार्य में शरीर भी जीर्ण हो गया, बुढ़ापे से सारी शक्ति भी नष्ट हो गई ॥२८॥ अब इसके बाद मैं अवश्य श्रद्धापूर्वक परलोक-कल्याण के लिए प्रयत्न करूँगा । विप्रेन्द्र ! ऐसा निश्चय कर वह धर्म-कार्यों में लग गया ॥२९॥ उसी समय उसने अपने धन को चार भागों में बाँटा । अपनी अर्जित संपत्ति में से दो भाग स्वयं लिये और शेष दो भाग अपने दोनों पुत्रों को दे दिये । अपने किये हुए पापों को नष्ट करने के उद्देश्य से उसने बहुत स्थानों पर प्याऊ बैठाए, धर्मशालायें, उपवन और देवमन्दिर बनवाये,