भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२२८ नारदीयपुराणम् एवं धनमशेषं च विश्राण्य हरिभक्तिमान् । नरनारायणस्थानं जगाम तपसे वनम् ॥३३॥ तत्रापश्यन्महार्म्यमाश्रमं मुनिसेवितम् । फलितैः पुष्पितैश्चैव शोभितं वृक्षसंचयैः ॥३४॥ गृणद्भिः परमं ब्रह्म शास्त्रचिंतापरैस्तथा । परिचर्यापरैर्वृद्धैर्मतिभिः परिशोभितम् ॥३५॥ शिष्यैः परिवृतं तत्र मुनिं जानंति संज्ञकम् । गृणंतं परमं ब्रह्म तेजोराशिं ददर्श ह ॥३६॥ शमादिगुणसंयुक्तं रागादिरहितं मुनिम् । शीर्णपर्णाशनं दृष्ट्वा वेदमालिर्ननाम तम् ॥३७॥ तस्य जानन्तिरागतोः कल्पयामास चार्हणम् । कंदमूलफलाद्यैस्तु नारायणधिया मुने ॥३८॥ कृतातिथ्यक्रियस्तेन वेदमाली कृतांजलिः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाच वदतां वरम् ॥३९॥ भगवन्कृतकृत्योऽस्मि विगते कल्मषं मम । मामुद्धर महाभाग ज्ञानदानेन पंडित ॥४०॥ एवमुक्तस्ततस्तेन जानन्तिर्मु निसत्तमः । प्रोवाच प्रहसन्वाग्मी वेदमालिं गुणान्वितम् ॥४१॥ शृणुष्व विप्रशार्दूल संसारच्छेदकारणम् । प्रवक्ष्यामि समासेन दुर्लभं त्वकृतात्मनाम् ॥४२॥ भज विष्णुं परं नित्यं स्मर नारायणं प्रभुम् । परापवादं पैशुन्यं कदाचिदपि मा कृथाः ॥४३॥ परोपकारनिरतः सदा भव महामते । हरिपूजाकरश्चैव त्यज मूर्खसमागमम् ॥४४॥ कामं क्रोधं च लोभं च मोहं च मदमत्सरौ । परित्यज्यात्मवल्लोकं दृष्ट्वा शांतिं गमिष्यसि ॥४५॥ असूयां परनिन्दां च कदाचिदपि मा कुरु । दंभाचारमहंकारं नैष्ठुर्यं च परित्यज ॥४६॥ दयां कुरुष्व भूतेषु शुश्रूषां च तथा सताम् । त्वया कृतांश्च धर्मान्त्वं मा प्रकाशय पृच्छताम् ॥४७॥ गंगा के तट पर अन्नदान की व्यवस्था की ॥३०-३२॥ इस प्रकार अपना सारा धन हरिभक्तों को बाँट दिया और स्वयं नरनारायण के स्थान की ओर (बदरिकाश्रम) में तपस्या करने के लिए चला गया ॥३३॥ वहाँ वन में जाकर उसने मुनियों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय आश्रम को देखा, जो फलफूलों से लदे हुए मनोहर वृक्षों से और अधिक रम्य जान पड़ता था ॥३४॥ उस आश्रम में परम ब्रह्म के गुणगान में निरत, शास्त्र चिन्तन में तल्लीन, भगवदाराधना में बेसुध वृद्ध तपस्वी मुनियों और शिष्यों से घिरे हुए जानंति नामक मुनि को देखा जिनकी सभी सेवा कर रहे थे । और जो स्वयं परम ब्रह्म का नाम जप करते हुए तेज पुंज के समान थे ॥३५-३६॥ हे मुनि ! शम आदि गुणों से युक्त, रागरहित और केवल सूखी पत्तियों को खाकर ही जीवन बिताने वाले उस मुनि को देखकर वेदमालि ने उन्हें प्रणाम किया और जानन्ति ने भी उस अतिथि वेदमाली का नारायण-भाव से कन्द मूल फल आदि के द्वारा सत्कार किया । वेदमाली मुनि का आतिथ्य स्वीकार करने के पश्चात् हाथ जोड़कर विनम्र भाव से उस वाग्मी शिरोमणि मुनि से बोला ॥३७-३६॥ भगवन् ! मैं कृतकृत्य हो गया, आपके दर्शन से मेरे सारे पाप दूर हो गए । पंडित ! महाभाग ! अब आप ज्ञान की दीक्षा देकर मेरा उद्धार कीजिए ॥४०॥ वेदमाली की इतनी बातें सुनकर वाग्मी मुनिवर हँस पड़े और उन्होंने उस गुणी अतिथि से कहा-॥४१॥ विप्रशार्दूल ! सुनो मैं भव बन्धन से मुक्त करने वाले उस ज्ञान को संक्षेप में सुना रहा हूँ, जो अविवेकियों के लिए सर्वथा दुर्लभ है । विष्णु का नित्य प्रति भजन करो, प्रभु नारायण का स्मरण करो और परनिन्दा तथा पिशुनता कभी भी न करो ॥४२-४३॥ महामति ! सदा परोपकार में लगे रहो, हरि पूजा को ही ध्येय समझो और मूर्खो की संगति न करो ॥४४॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को छोड़कर संसार को आत्मवत् समझो, ऐसे करने से तुम अवश्य शान्ति प्राप्त करोगे ॥४५॥ असूया और परनिन्दा कभी न करो । दंभ, अहंकार एवं निष्ठुरता को छोड़ दो, प्राणियों पर दया करो, सज्जनों की सेवा करो और अपने किये हुए धर्मों को पूछने पर अपने मुंह से न कहो ॥४६-४७॥ अपने सामने अनाचार होते देखकर शक्ति