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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

२२८ नारदीयपुराणम् एवं धनमशेषं च विश्राण्य हरिभक्तिमान् । नरनारायणस्थानं जगाम तपसे वनम् ॥३३॥ तत्रापश्यन्महार्म्यमाश्रमं मुनिसेवितम् । फलितैः पुष्पितैश्चैव शोभितं वृक्षसंचयैः ॥३४॥ गृणद्भिः परमं ब्रह्म शास्त्रचिंतापरैस्तथा । परिचर्यापरैर्वृद्धैर्मतिभिः परिशोभितम् ॥३५॥ शिष्यैः परिवृतं तत्र मुनिं जानंति संज्ञकम् । गृणंतं परमं ब्रह्म तेजोराशिं ददर्श ह ॥३६॥ शमादिगुणसंयुक्तं रागादिरहितं मुनिम् । शीर्णपर्णाशनं दृष्ट्वा वेदमालिर्ननाम तम् ॥३७॥ तस्य जानन्तिरागतोः कल्पयामास चार्हणम् । कंदमूलफलाद्यैस्तु नारायणधिया मुने ॥३८॥ कृतातिथ्यक्रियस्तेन वेदमाली कृतांजलिः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाच वदतां वरम् ॥३९॥ भगवन्कृतकृत्योऽस्मि विगते कल्मषं मम । मामुद्धर महाभाग ज्ञानदानेन पंडित ॥४०॥ एवमुक्तस्ततस्तेन जानन्तिर्मु निसत्तमः । प्रोवाच प्रहसन्वाग्मी वेदमालिं गुणान्वितम् ॥४१॥ शृणुष्व विप्रशार्दूल संसारच्छेदकारणम् । प्रवक्ष्यामि समासेन दुर्लभं त्वकृतात्मनाम् ॥४२॥ भज विष्णुं परं नित्यं स्मर नारायणं प्रभुम् । परापवादं पैशुन्यं कदाचिदपि मा कृथाः ॥४३॥ परोपकारनिरतः सदा भव महामते । हरिपूजाकरश्चैव त्यज मूर्खसमागमम् ॥४४॥ कामं क्रोधं च लोभं च मोहं च मदमत्सरौ । परित्यज्यात्मवल्लोकं दृष्ट्वा शांतिं गमिष्यसि ॥४५॥ असूयां परनिन्दां च कदाचिदपि मा कुरु । दंभाचारमहंकारं नैष्ठुर्यं च परित्यज ॥४६॥ दयां कुरुष्व भूतेषु शुश्रूषां च तथा सताम् । त्वया कृतांश्च धर्मान्त्वं मा प्रकाशय पृच्छताम् ॥४७॥ गंगा के तट पर अन्नदान की व्यवस्था की ॥३०-३२॥ इस प्रकार अपना सारा धन हरिभक्तों को बाँट दिया और स्वयं नरनारायण के स्थान की ओर (बदरिकाश्रम) में तपस्या करने के लिए चला गया ॥३३॥ वहाँ वन में जाकर उसने मुनियों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय आश्रम को देखा, जो फलफूलों से लदे हुए मनोहर वृक्षों से और अधिक रम्य जान पड़ता था ॥३४॥ उस आश्रम में परम ब्रह्म के गुणगान में निरत, शास्त्र चिन्तन में तल्लीन, भगवदाराधना में बेसुध वृद्ध तपस्वी मुनियों और शिष्यों से घिरे हुए जानंति नामक मुनि को देखा जिनकी सभी सेवा कर रहे थे । और जो स्वयं परम ब्रह्म का नाम जप करते हुए तेज पुंज के समान थे ॥३५-३६॥ हे मुनि ! शम आदि गुणों से युक्त, रागरहित और केवल सूखी पत्तियों को खाकर ही जीवन बिताने वाले उस मुनि को देखकर वेदमालि ने उन्हें प्रणाम किया और जानन्ति ने भी उस अतिथि वेदमाली का नारायण-भाव से कन्द मूल फल आदि के द्वारा सत्कार किया । वेदमाली मुनि का आतिथ्य स्वीकार करने के पश्चात् हाथ जोड़कर विनम्र भाव से उस वाग्मी शिरोमणि मुनि से बोला ॥३७-३६॥ भगवन् ! मैं कृतकृत्य हो गया, आपके दर्शन से मेरे सारे पाप दूर हो गए । पंडित ! महाभाग ! अब आप ज्ञान की दीक्षा देकर मेरा उद्धार कीजिए ॥४०॥ वेदमाली की इतनी बातें सुनकर वाग्मी मुनिवर हँस पड़े और उन्होंने उस गुणी अतिथि से कहा-॥४१॥ विप्रशार्दूल ! सुनो मैं भव बन्धन से मुक्त करने वाले उस ज्ञान को संक्षेप में सुना रहा हूँ, जो अविवेकियों के लिए सर्वथा दुर्लभ है । विष्णु का नित्य प्रति भजन करो, प्रभु नारायण का स्मरण करो और परनिन्दा तथा पिशुनता कभी भी न करो ॥४२-४३॥ महामति ! सदा परोपकार में लगे रहो, हरि पूजा को ही ध्येय समझो और मूर्खो की संगति न करो ॥४४॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को छोड़कर संसार को आत्मवत् समझो, ऐसे करने से तुम अवश्य शान्ति प्राप्त करोगे ॥४५॥ असूया और परनिन्दा कभी न करो । दंभ, अहंकार एवं निष्ठुरता को छोड़ दो, प्राणियों पर दया करो, सज्जनों की सेवा करो और अपने किये हुए धर्मों को पूछने पर अपने मुंह से न कहो ॥४६-४७॥ अपने सामने अनाचार होते देखकर शक्ति

पंचविंशोऽध्यायः २२६ अनाचारपरान्दृष्ट्वा नोपेक्षां कुरु शक्तितः । पूजयस्वातिथिं नित्यं स्वकुटुंबाविरोधतः ॥४८॥ पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि दूर्वाभिः पल्लवैरथ । पूजयस्व जगन्नाथं नारायणमकामतः ॥४९॥ देवान्ऋषीन्पितॄंश्चापि तर्पयस्व यथाविधि । अग्नेश्च विधिवद्विप्रं परिचर्यापरो भव ॥५०॥ देवतायतने नित्यं संमार्जनपरो भव । तथोपलेपनं चैव कुरुष्व सुसमाहितः ॥५१॥ शीर्णस्फुटितसंधानं कुरु देवगृहे सदा । मार्गशोभां च दीपं च विष्णोरायतने कुरु ॥५२॥ कंदमूलफलैर्वापि सदा पूजय माधवम् । प्रदक्षिणनमस्कारैः स्तोत्राणां पठनैस्तथा ॥५३॥ पुराणश्रवणं चैव पुराणपठनं तथा । वेदांतपठनं चैव प्रत्यहं कुरु शक्तितः ॥५४॥ एवं स्थिते तव ज्ञानं भविष्यत्युत्तमोत्तमम् । ज्ञानात्समस्तपापानां मोक्षो भवति निश्चितम् ॥५५॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्महामतिः । तथा ज्ञानरतो नित्यं ज्ञानलेशमवाप्तवान् ॥५६॥ वेदमालिः कदाचित्तु ज्ञानलेशप्रचोदितः । कोऽहं मम क्रिया केति स्वयमेव व्यचिंतयत् ॥५७॥ मम जन्म कथं जातं रूपं कीदृग्विधं मम । एवं निवारणपरो दिवानिशमतंद्रितः ॥५८॥ अनिश्चितमतिर्भूत्वा वेदमालिद्विजोत्तमः । पुनर्जानंतिमागम्य प्रणम्येदमुवाच ह ॥५९॥ वेदमालिरुवाच ममचित्तमतिभ्रांतं गुरो ब्रह्मविदां वर । कोऽहं मम क्रिया का च मम जन्म कथं वद ॥६०॥ जानंतिरुवाच सत्यं सत्यं महाभाग चित्तं भ्रांतं सुनिश्चितम् । अविद्यानिलयं चित्तं कथं सद्भावमेष्यति ॥६१॥ रहते उपेक्षा न करो। अपने कुटुम्ब को कुछ हानि किये बिना अतिथि को नित्य सेवा करो । निष्काम भाव से पत्र, पुष्प, फल, दूर्वा और पल्लव से विधिपूर्वक भगवान् को पूजा करो। विधिपूर्वक देव, ऋषि और पितरों का तर्पण करो। विप्र ! विधिवत् अग्नि की पूजा करो ॥४८-५०॥ देवमन्दिर में जाकर नित्य प्रति झाडू लगाओ और एकाग्र होकर उसको लीपो-पोतो। सदा देवमन्दिर की दरार या जीर्ण भाग की मरम्मत करो, विष्णु-मन्दिर में दीपक जलाओ और वन्दनबार लगाकर द्वारों को सजाओ ॥५१-५२॥ कन्दमूल, फल, प्रदक्षिणा नमस्कार, स्तुतिपाठ आदि से माधव की पूजा करो। प्रतिदिन शक्ति के अनुसार पुराण श्रवण, पुराण पाठ और वेदान्त का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने पर तुमको परमोत्तम ज्ञान प्राप्त होगा और ज्ञान द्वारा समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है यह निश्चित है ॥५३-५५॥ मुनि से इस प्रकार का उपदेश पाकर महामति वेदमालि जो पहले अज्ञानान्धकार में ही डूबा रहता था, ज्ञान का एक हल्का सा प्रकाश पा गया। किसी समय वह अपने उसी स्वल्पज्ञान की प्रेरणा से, मैं कौन हूँ, मेरा कर्त्तव्य क्या है, आदि बातों पर विचार करने लगा ॥५६-५७॥ (अनन्तर वह) प्रतिदिन आलस्य त्यागकर यही सोचा करता था कि 'मेरा जन्म कैसे हुआ, मेरा स्वरूप क्या है ? द्विजवर वेदमालि इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर न पाकर पुनः जानंति के पास आया और प्रणाम करके पूछा--॥५८-५९॥ वेदमालि ने पूछा-ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ! गुरुदेव ! मेरा कर्त्तव्य क्या है, मुझे सन्देह हो गया है कि मैं कौन हूँ, मेरा जन्म कैसे हुआ और आप कृपा करके इस सन्देह का निराकरण कीजिए ॥६०॥ जानन्ति बोले-महाभाग ! यह सत्य है, तुम्हारा चित्त भ्रम में पड़ गया यह निश्चित हो है। अज्ञान का स्थान चित्त भला कैसे सद्भाव प्राप्त करेगा ॥६१॥ जो 'यह मेरा है' ऐसा कहा जाता है यह भी भ्रम है।

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२३० | नारदीयपुराणम् ममेति गदितुं यत् तदपि भ्रान्तिरिष्यते । अहंकारो मनोधर्म आत्मनो नहि पंडित ॥६२॥ पुनश्च कोऽहमित्युक्तं वेदमाले त्वया तु यत् । मम जात्यादि शून्यस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६३॥ अनौपम्यस्वभावस्य निर्गुणस्य परमात्मनः । नीरूपस्याप्रमेयस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६४॥ परज्योतिःस्वरूपस्य परिपूर्णव्ययात्मनः । अविच्छिन्नस्वभावस्य कथ्यते च कथं क्रिया ॥६५॥ स्वप्रकाशात्मनो चित्र नित्यस्य परमात्मनः । अनंतस्य क्रिया चैव कथं जन्म च कथ्यते ॥६६॥ ज्ञानैकवेद्यमजरं परं ब्रह्म सनातनम् । परिपूर्णं परानंदं तस्मान्नान्यदिह द्विज ॥६७॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येभ्यो ज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । ज्ञाने त्वनाहते सिद्धे सर्वं ब्रह्ममयं भवेत् ॥६८॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्मुनीश्वर । सुमोद पश्यन्नात्मानमात्मन्येवाच्युतं प्रभुम् ॥६९॥ उपाधिरहितं ब्रह्म स्वप्रकाशं निरंजनम् । अहमेवेति निश्चित्य परां शांतिमवाप्तवान् ॥७०॥ ततश्च व्यवहारार्थं वेदमालिर्मुनीश्वरम् । गुरुं प्रणम्य जानंति सदा ध्यानपरोऽभवत् ॥७१॥ गते बहुतिथे काले वेदमालिर्मुनीश्वर । वाराणसीपुरं प्राप्य परं मोक्षमवाप्तवान् ॥७२॥ य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । स कर्मपाशविच्छेदं प्राप्य सौख्यमवाप्नुयात् ॥७३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे ज्ञाननिरूपणं नाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥३५॥


पंडित ! अहंकार मन का धर्म है आत्मा का नहीं ॥६२॥ वेदमाले ! फिर तुमने जो यह पूछा है कि 'मैं कौन हूँ' तो जाति आदि से शून्य आत्मा का नामकरण मैं कैसे कर सकता हूँ ॥६३॥ अनुपम स्वभाव वाले, निर्गुण, नीरूप, अप्रमेय परात्मा का नाम मैं कैसे बताऊँ ॥६४॥ परज्योतिस्वरूप, परिपूर्ण, अव्ययात्मा, और अविच्छिन्न प्रकृति वाले आत्मा की क्रिया को कैसे बताया जाय ? ॥६५॥ विप्र ! स्वप्रकाशात्मा, नित्य और अनन्त परमात्मा के जन्म कर्म के विषय में कैसे कहा जा सकता है ॥६६॥ द्विज ! ज्ञान के द्वारा ही एक मात्र जानने योग्य, अजर, अमर, परिपूर्ण, परानन्द सनातन ब्रह्म के अतिरिक्त कोई भी पदार्थ इस संसार में नहीं है ॥६७॥ 'तत्त्वमसि' [तुम (आत्मा) वही ब्रह्म हो ] इत्यादि वाक्यों से प्राप्त ज्ञान ही मोक्ष सिद्धि का प्रधान कारण है और इस नित्य ज्ञान के सिद्ध हो जाने पर सारा विश्व ब्रह्ममय दिखाई पड़ता है । मुनीश्वर ! इस प्रकार मुनि के ज्ञानोपदेश से उद्बुद्ध वेदमालि अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसने अपने में ही उपाधिरहित, निर्गुण, निरंजन, स्वप्रकाश ब्रह्म को देखा और 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर उसको अत्यधिक शान्ति मिली ॥६८-७०॥ इसके अनन्तर व्यवहार निर्वाह के लिए गुरु मुनीश्वर को प्रणाम कर वह सदा ध्यानमग्न रहने लगा । मुनीश्वर ! बहुत समय बीत जाने पर वह वेदमाली वाराणसीपुरी में गया जहाँ से उसको पर मोक्ष प्राप्त हो गया । जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता है या सुनता है, वह भी अपने कर्म बन्धन को तोड़कर परम सौख्य (मुक्ति) पाता है ॥७१-७३॥ श्रीनारदीय महापुराण में ज्ञान-निरूपण नामक पैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३५॥

अथ ष‌ट्त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच वेदमालेः सुतौ प्रोक्तौ यावुभौ मुनिसत्तम । यज्ञमाली सुमाली च तयोः कर्माधुनोच्यते ॥१॥ तयोराद्यो यज्ञमाली विभेद पितृसंचितम् । धनं द्विधा कनिष्ठस्य भागमेकं ददौ तदा ॥२॥ सुमाली च धनं सर्वं व्यसनाभिरतः सदा । अपात्रानादिभिश्चैव नाशयामास भो द्विज ॥३॥ गीतवाद्यरतो नित्यं मद्यपानरतोऽभवत् । वेश्याविभ्रमलुब्धोऽसौ परदाररतोऽभवत् ॥४॥ सर्वस्मिन्नाशमायाते हिरण्ये पितृसंचिते । अपहृत्य परं द्रव्यं वारस्त्रीनिरतोऽभवत् ॥५॥ दृष्ट्वा सुमालिनः शीलं यज्ञमाली महामतिः । बभूव दुःखितोऽत्यर्थं भ्रातरं चेदमब्रवीत् ॥६॥ अलमत्यंतकष्टेन वृत्तेनास्मात्कुलेऽनुज । त्वमेक एव दुष्टात्मा महापापरतोऽभवः ॥७॥ एवं निवारयंतं तं बहुशो ज्येष्ठसोदरम् । हनिष्यामीति निश्चित्य खड्गहस्तः कचेऽग्रहीत् ॥८॥ ततो महारवो जज्ञे नगरे भृशदारुणः । बबंधुर्नागराश्चैनं कुपितास्ते सुमालिनम् ॥६॥ यज्ञमाली ह्युपेत्यात्मा पौरात्संप्रार्थ्य दुःखितः । बंधनान्मोचयामास भ्रातृस्नेहविमोहितः ॥१०॥ यज्ञमाली पुनश्चापि विभिदे स्वधनं द्विधा । आददे स्वयमर्द्धं च ददावर्द्धं यवीयसे ॥११॥ सुमाली त्वतिमूढात्मा तद्धनं चापि नारद । मूर्खैः पाखंडचंडालैर्बुभुजे च सहोद्धतः ॥१२॥ असतामुपभोगाय दुर्जनानां विभूतयः । पिचुमंदः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते ॥१३॥ अध्याय ३६ यज्ञमाली और सुमाली को उत्तम लोक की प्राप्ति सनक बोले--मुनिश्रेष्ठ ! वेदमालि के जिन यज्ञमाली और सुमाली नामक दो पुत्रों की चर्चा हुई है, अब इन दोनों के कर्मों के विषय में कह रहा हूँ ॥१॥ उन दोनों में से ज्येष्ठ पुत्र यज्ञमाली ने पितृसंचित संपत्ति को दो भागों में बाँट दिया। उनमें से एक भाग कनिष्ठ भ्राता सुमाली को दे दिया ॥२॥ द्विज, सर्वदा व्यसन में ही लगे रहने वाले सुमाली ने अपनी सारी संपत्ति व्यर्थ में लुटा दी । नित्य प्रति वह गाने बजाने में लगा रहता था । मदिरापान में निरत रहता था। वेश्याओं के विलास में फँसने के कारण परस्त्री गमन भी करता था ॥३-४॥ पिता के द्वारा संचित सब धन नष्ट हो जाने पर दूसरों का धन हरण कर वह वेश्यागमन में निरत रहने लगा ॥५॥ सुमाली के इस स्वभाव को देखकर महामति यज्ञमाली अत्यन्त दुःखी हो गया । उसने अपने भाई से कहा- 'हे भाई, इस कुल-विरुद्ध पापाचरण से अपने को रोको। देखो, तुम्हीं एक ऐसे अपने कुल में दुष्ट निकले जो इस प्रकार पापपरायण हो गए ॥६-७॥ ज्येष्ठ सहोदर के इस प्रकार बार बार मना करने पर उसने बड़े भाई को मार डालने का निश्चय कर हाथ में खड्ग लेकर केश पकड़ लिया ॥८॥ यह देखकर नगर में दारुण कोलाहल मच गया। नागरिकों ने कुपित होकर उस दुष्ट को बाँध दिया ॥९॥ भाई के प्रेम से वशीभूत होकर विशुद्ध मति ने नागरिकों को समझा बुझाकर भाई को छुड़ा दिया ॥१०॥ फिर उसने अपनी संपत्ति को दो भागों में बाँटा एक भाग तो स्वयं अपने ले लिया और शेष आधा भाग छोटे भाई को दे दिया ॥११॥ नारद ! मूढात्मा सुमाली ने उस धन को पाकर मूर्ख, पाखंडी और चाण्डालों में उसे उड़ा दिया। क्योंकि दुष्टों की संपत्ति का भोग प्रायः दुर्जन ही करते हैं, जैसे फल से लदे हुए नीम की निबौरी कौओं के ही काम आती है ॥१२-१३॥

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२३२ नारदीयपुराणम् भ्रात्रा दत्तं धनं तच्च सुमाली नाशयन्मुने । मद्यपानप्रमत्तश्च गोमांसादीन्यभक्षयत् ॥१४॥ त्यक्तो बंधुजनैः सर्वैश्चांडालस्त्रीसमन्वितः । राज्ञापि बाधितो विप्र प्रपेदे निर्जनं वनम् ॥१५॥ यज्ञमाली सुधीविप्र सदा धर्मरतोऽभवत् । अवारितं ददावन्नं सत्सङ्गतकल्मषः ॥१६॥ पित्रा कृतानि सर्वाणि तडागादीनि सत्तम । अपालयत्प्रयत्नेन सदा धर्मपरायणः ॥१७॥ विश्राणितं धनं सर्वं यज्ञमालेर्महात्मनः । सत्पात्रदाननिष्ठस्य धर्ममार्गप्रवर्तिनः ॥१८॥ अहो सदुपभोगाय सज्जनानां विभूतयः । कल्पवृक्षफलं सर्वममरैरेव भुज्यते ॥१९॥ धनं विश्राण्य धर्मार्थं यज्ञमाली महामतिः । नित्यं विष्णुगृहे सम्यक्परिचर्यापरोऽभवत् ॥२०॥ कालेन गच्छता तौ तु वृद्धभावमुपागतौ । यज्ञमाली सुमाली च ह्येककाले मृतावुभौ ॥२१॥ हरिपूजारतस्यास्य यज्ञमालिमहात्मनः । हरिः संप्रेषयामास विमानं पार्षदैरावृतम् ॥२२॥ दिव्यं विमानमारुह्य यज्ञमाली महामतिः । पूज्यमानः सुरगणैः स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२३॥ गंधर्वैर्गीयमानश्च सेवितश्चाप्सरोगणैः । कामधेन्वा पुष्यमाणश्चित्राभरणभूषितः ॥२४॥ कोमलैस्तुलसीमाल्यैर्भूषितस्तेजसां निधिः । गच्छन्विष्णुपदं दिव्यं मनुजं पथि दृष्टवान् ॥२५॥ ताड्यमानं यमभटैः क्षत्तृड्भ्यां परिपीडितम् । प्रेतभूतं विवस्त्रं च दुःखितं पाशवेष्टितम् । इतस्ततः प्रधावन्तं विलपंतमनाथवत् ॥२६॥ क्रोशन्तं च रुदंतं च दृष्ट्वा मनसि विव्यथे ॥२७॥ यज्ञमालादयायुक्तो विष्णुदूतान्समीपगान् । कोऽयं भटैर्बाध्यमानं इत्यपृच्छत्कृतांजलिः ॥२८॥


मुनिवर ! भाई की दी हुई संपत्ति को भी उस माली ने उड़ाना प्रारम्भ किया । मदिरापान से मतवाला होकर वह गोमांस-भक्षण और चाण्डाल-स्त्री-गमन भी करने लगा । यह देखकर कुटुम्ब के लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया । राज-बाधा या दण्ड के भय से विवश होकर अन्त में उसको वन की शरण लेनी पड़ी ॥१४-१५॥ उसका ज्येष्ठ भाई महामति यज्ञमाली सर्वदा धर्मानुष्ठान में ही लगा रहता था । सदा अन्न दान देने और सत्संगति के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए ॥१६॥ वह धर्मप्रेमी सदा, पिता के बनवाए हुए सारे तड़ाग आदि की भलीभाँति यत्नपूर्वक रक्षा किया करता था ॥१७॥ उसने अपनी सारी संपत्ति महात्माओं, धर्म प्रेमियों और सत्पात्रों को दान कर दी । सच है, सज्जनों की संपत्ति सज्जनों के उपभोग में ही आती है, कल्पवृक्ष का फल सर्वदा देववृन्दों के ही काम आता है ॥१८-१९॥ इस प्रकार महामति यज्ञमाली ने अपना सारा धन धर्मकार्य में ही खर्च कर दिया और नित्य विष्णु मंदिर में परिचर्या करने लगा । कुछ समय बाद दोनों भाई वृद्धावस्था को प्राप्त हुए और दोनों एक ही साथ मृत्यु को प्राप्त हुए ॥२०-२१॥ हरिपूजा में रत महात्मा यज्ञमाली के लिए भगवान् विष्णु ने सेवकों के सहित एक दिव्यविमान उसके निकट भेजा । महामति यज्ञमाली जिसकी देवगण आरा- धना कर रहे थे, मुनिवर स्तुति कर रहे थे, गन्धर्व गुणगान कर रहे थे और अप्सरायें जिसकी सेवा कर रही थीं, कामधेनु जिसको भोग-सामग्री दे रही थी, जो स्वयं विविध आभूषणों से विभूषित, तेजस्वी तथा सुन्दर तुलसी की मालाओं से शोभित था उस विमान पर चढ़कर दिव्य विष्णु लोक को चला गया ॥२२-२५॥ उसने मार्ग में एक मनुष्य को देखा, जो भूख-प्यास से व्याकुल था । यमदूत उसे मार रहे थे । वस्त्र उसके फटे हुए थे । वह प्रेत के समान भयंकर था और पाश में बंधा हुआ था । वह दुःख से कातार होकर अनाथ की भाँति रो रहा था और इधर-उधर दौड़ रहा था ॥२६॥ उसको इस प्रकार रोते-चिल्लाते देखकर यज्ञमाली को अपार मानसिक व्यथा हुई । उसने दयार्द्र हो हाथ जोड़कर साथ चलने वाले विष्णुदूतों से पूछा—'यह कौन है जिसकी दुर्दशा यमदूत कर रहे हैं ? ॥२७-२८॥

षट्त्रिंशोऽध्यायः २३३ अथ ते हरिदूतास्तं यज्ञमालिमहौजसम् । असौ सुमाली भ्राता ते पापात्मेति समब्रुवन् ॥२६॥ यज्ञमाली समाकर्ण्य व्याख्यातं विष्णुकिंकरैः । मनसा दुःखमापन्नः पुनः पप्रच्छ नारद ॥३०॥ कथमस्य भवेन्मोक्षः संचितैःपापसंचयैः । तदुपायं वदध्वं मे यूयं हि मम बांधवाः ॥३१॥ सख्यं साप्तपदीनं स्यादित्याहुर्धर्मकोविदाः । सतां साप्तपदी मैत्री सत्सतां त्रिपदी तथा ॥३२॥ सत्सतामपि ये संतस्तेषां मैत्री पदे पदे ॥३३॥ तस्मान्मे बांधवा यूयं मां नेतुं समुपागताः । यतोऽयं मम भ्रातापि मुच्यते तदिहोच्यताम् ॥३४॥ यज्ञमालिवचः श्रुत्वा विष्णुदूता दयालवः । पुनः स्मितमुखाः प्रोचुर्यज्ञमालिहरिप्रियम् ॥३५॥ विष्णुदूता ऊचुः । यज्ञमालिन्महाभाग नारायणपरायण । उपायं तव वक्ष्यामः सुमालिप्रेममुक्तिदम् ॥३६॥ कृतं यत्सुमहत्कर्म त्वया प्राक्तनजन्मनि । प्रवक्ष्यामः समासेन तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥ पुरा त्वं वैश्यजातीयो नाम्ना विश्वंभरः स्मृतः । त्वया कृतानि पापानि महांति्यगणितानि वै ॥३८॥ सुकर्मवासनाहीनो मातापित्रोर्विरोधकृत् । एकदा बंधुभिस्त्यक्तः शोकसंतप्तपीडितः ॥३६॥ क्षुधाग्निनापि संतप्तः प्राप्तवान्हरिमंदिरम् । तदा वृष्टिरभूत्तत्र तत्स्थानं पंकिलं ह्यभूत् ॥४०॥ दूरीकृतस्त्वया पंकस्तत्स्थाने स्थातुमिच्छया । उपलेपनतां प्राप्तं तत्स्थानंविष्णुमंदिरे ॥४१॥ त्वयोषितं तु तद्रात्रौ तस्मिन्देवालये द्विज । दंशितश्चैव सर्पेण प्राप्तं पञ्चत्वमेव च ॥४२॥ तेन पुण्यप्रभावेण उपलेपकृतेन च । विप्रजन्म त्वया प्राप्तं हरिभक्तिस्तथाचला ॥४३॥ महातेजस्वी यज्ञमाली के प्रश्न को सुनकर विष्णुदूतों ने कहा कि, 'यह तुम्हारा पापी भाई दुरात्मा सुमाली है; नारद ! विष्णु दूतों के मुख से 'यज्ञमाली' ऐसा नाम सुनकर उसके मन में अत्यन्त पीड़ा हुई । उसने फिर पूछा ॥२९-३०॥ इसके संचित पापों से इसकी मुक्ति कैसे होगी, इसका उपाय तुम लोग बताओ, तुम लोग अब मेरे बन्धु हो गए । धर्ममर्मज्ञों ने कहा कि सात पग साथ चलने पर सज्जनों की मैत्री हो जाती है, यह साधारण नियम है । जो सज्जन होते हैं उनकी मैत्री साप्तपदी होती है, उनसे भी जो अधिक सज्जन होते हैं उनकी मैत्री तीन डग के साथ ही हो जाती है परन्तु जो सर्वश्रेष्ठ सज्जन हैं उनसे मित्रता एक डग साथ चलने से ही हो जाती है ॥३१।३२॥ इसलिए तुम लोग मेरे बन्धु हो और मुझे ले जाने के लिए आये हो, अतएव जिस प्रकार मेरे भाई का उद्धार हो वही उपाय बतलाओ । यज्ञमाली की बातें सुनकर इन दूतों को भी दया आ गई, फिर मुसकराकर उन्होंने विष्णु-प्रिय यज्ञमाली से कहा॥३३-३५॥ विष्णुदूत बोले--महाभाग ! नारायणपरायण ! यज्ञमालिन् ! हम ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसके द्वारा तुम्हारे भाई को पापों से मुक्ति मिल जायगी । इसके पूर्व तुमने पूर्व जन्म में जो महान् शुभ कर्म किया है, उसको संक्षेप में सुना रहा हूँ, सावधान होकर सुनो--॥३६-३७॥ पहले तुम वैश्य कुल में उत्पन्न हुए थे, विश्वम्भर तुम्हारा नाम था, तुमने अगणित महापाप किए थे, शुभ कर्म के संस्कार सर्वथा तुममें नहीं थे तुम माता-पिता के विरोधी थे । एक दिन जब तुमको तुम्हारे परिवार के लोगों ने घर से निकाल दिया, तब तुम शोक सन्तप्त और भूख-प्यास से व्याकुल हो घूमते-फिरते एक हरिमन्दिर में आए। उसी समय जोरों की वर्षा हुई जिससे यह स्थान कीचड़ से भर गया ॥३८-४०॥ तुमने वहाँ रहने की इच्छा से वहाँ से कीचड़ हटा दिया, जिससे अनायास उस मन्दिर का उपलेपन हो गया । द्विज ! तुम रात भर उस देवा- लय में रहे, अकस्मात् साँप के काटने से तुम्हारी मृत्यु हो गई ॥४१-४२॥ उसी मन्दिर के लीपने के पुण्य-प्रभाव से तुमको इस जन्म में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने का सौभाग्य और हरि-चरणों में एकान्त प्रेम मिला है ॥४३॥ ३०-ना० पु०

२३४ नारदीयपुराणम् कल्पकोटिशतं साग्रं संप्राप्य हरिसन्निधिम् । वसाय ज्ञानमासाद्य परं मोक्षं गमिष्यसि ॥४४॥ अनुजं पातकिश्रेष्ठं त्वं समुद्धर्तुमिच्छसि । उपायं तव वक्ष्यामस्तं निबोध महामते ॥४५॥ गोचर्ममात्रभूमेस्तु उपलेपनजं फलम् । दत्वोद्धर महाभाग भ्रातरं कृपयान्वितः ॥४६॥ एवमुक्तो विष्णुदूतैर्यज्ञमाली महामतिः । तत्फलं प्रददौ तस्मै भ्रात्रे पापविमुक्तये ॥४७॥ सुमाली भ्रातृदत्तेन पुण्येन गतकल्मषः । बभूव यमदूतास्तु तं त्यक्त्वा प्रपलायिताः ॥४८॥ विमानं चागतं सद्यः सर्वभोगसमन्वितम् । तदा सुमाली स्वर्यानमारुह्य मुमुदे मुने ॥४९॥ तावुभौ भ्रातरौ विप्र सुरवृन्दनमस्कृतौ । अवापतुर्भृशं प्रीतिं समालिंग्य परस्परम् ॥५०॥ यज्ञमाली सुमाली च स्तूयमानौ महर्षिभिः । गीयमानौ च गंधर्वैर्विष्णुलोकं प्रजग्मतुः ॥५१॥ अवाप्य हरिसालोक्यं सुमाली मुनिसत्तम । यज्ञमाली चोभुतस्तौ कल्पमेकं मुदान्वितौ ॥५२॥ भुक्त्वा भोगान्बहूंस्तत्र यज्ञमाली महामतिः । तत्रैव ज्ञानसंपन्तः परं मोक्षमुपागतः ॥५३॥ सुमाली तु महाभागो विष्णुलोके मुदान्वितः । स्थित्वा भूमिं पुनः प्राप्य विप्रत्वं समुपागतः ॥५४॥ अतिशुद्धे कुले जातो गुणवान्वेदपारगः । सर्वसंपत्समोपेतो हरिभक्तिपरायणः ॥५५॥ व्याहरन्हरिनामानि प्रपेदे जाह्नवीतटम् । तत्र स्नातश्च गंगायां दृष्ट्वा विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥५६॥ अवाप परमं स्थानं योगिनामपि दुर्लभम् । उपलेपनमाहात्म्यं कथितं ते मुनीश्वर ॥५७॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संपूज्यो जगतांपतिः । अकामादपि ये विष्णोः सकृत्पूजां प्रकुर्वते ॥५८॥ न तेषां भवबंधस्तु कदाचिदपि जायते । हरिभक्तिरतान्यस्तु हरिबुद्ध्या समर्चयेत् ॥५६॥ इस समय तो तुम करोड़ों कल्प तक हरि के समीप रहो; पुनः ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष का अधिकार प्राप्त करना । तुम अपने पाप शिरोमणि भाई का उद्धार करना चाहते हो तो महामते ! सुनो, हम उपाय बता रहे हैं ॥४४-४५॥ महाभाग ! तुम अपने पुण्य-पुंज में से गोचर्म के बराबर भूमि के लेपन से जो फल मिलता है उतना ही पुण्य फल देकर कृपा पूर्वक अपने भाई का उद्धार करो ॥४६॥ महामति यज्ञमाली ने विष्णुदूतों की इतनी बातें सुनकर उतना अपना पुण्यफल भ्राता के पापों से उद्धार के लिए उसको दे दिया ॥४७॥ भाई के दिये हुए पुण्य फल को पाकर सुमाली निष्पाप हो गया । यमदूत यह देखकर उसको छोड़कर दूर भाग गये ॥४८॥ तत्काल वहाँ सब उपभोग और प्रसाधन सामग्री से सज्जित देवविमान आया । मुनि ! उस समय उस दिव्य विमान पर चढ़कर सुमाली अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥४९॥ विप्र ! देवों द्वारा आदृत वे दोनों भाई परस्पर गले मिलकर अत्यधिक प्रसन्न हुए ॥५०॥ इस प्रकार वे दोनों भाई विष्णुलोक को चले गये, मार्ग में महर्षियों ने उनकी प्रशंसा की और गन्धर्वों ने अपने मधुर गीत सुनाए ॥५१॥ मुनिवर्य ! हरि-सालोक्य पाकर एक कल्प तक वे यज्ञमाली और सुमाली दोनों भाई बड़े सुख से वहाँ रहे ॥५२॥ वहाँ महामति यज्ञमाली ने विविध भोगों का उपभोग किया और ज्ञान प्राप्त कर पर मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥५३॥ परन्तु महाभाग सुमाली उस लोक में आनन्द पूर्वक रहकर पुनः इस मृत्युलोक में आया और ब्राह्मणकुल में जन्म ग्रहण किया ॥५४॥ उस शुद्ध कुल में जन्म पाकर वह वेदों का पारगामी विद्वान्, गुणी, धनी और हरिभक्त हुआ ॥५५॥ हरिनाम का स्मरण करता हुआ वह जीवन के अन्तिम भाग में गंगा तट पर पहुँचा । वहाँ गंगा में स्नान किया और प्रभु विश्वेश्वर का दर्शन कर उस परम लोक को प्राप्त किया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है ॥५६॥ मुनीश्वर ! देवा- लय के लेपने से जो पुण्य मिलता है उसका माहात्म्य तो कह दिया । इसलिए सब प्रकार से लोकनाथ की पूजा करनी चाहिए । जो अनिच्छा से भी भगवान् की पूजा करता है उसको कभी जन्म-मृत्यु के बन्धन का भय नहीं

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३५ तस्य तुष्यंति विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । हरिभक्तिपराणां तु संगिनां संगमात्रतः ॥६०॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो महापातुकवानपि । हरिपूजापराणां च हरिनामवतात्मनाम् ॥६१॥ शुश्रूषानिरता यांति पापिनोऽपि परां गतिम् ॥६२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुसेवाप्रभावो नाम षट्‍त्रिंशोऽध्यायः ॥३६॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं कमलापतेः । कस्य नो जायते प्रीतिः श्रोतुं हरिकथामृतम् ॥१॥ नराणां विषयान्धानां ममताकुलचेतसाम् । एकमेव हरेर्नाम सर्वपापप्रणाशनम् ॥२॥ सकृद्वा न नमेद्यस्तु विष्णुं पापहरं नृणाम् । श्वपचं तं विजानीयात्कदाचिन्नालपेच्च तम् ॥३॥ हरिपूजाविहीनं तु यस्य वेश्म द्विजोत्तम । श्मशानसदृशं तद्धि कदाचिदपि नो विशेत् ॥४॥ हरिपूजाविहीनाश्च वेदविद्वेषिणस्तथा । गोद्विजद्वेषनिरता राक्षसाः परिकीर्त्तिताः ॥५॥ यो वा को वापि विप्रेन्द्र विप्रद्वेषपरायणः । समर्चयति गोविन्दं तत्पूजा विफला भवेत् ॥६॥ रहता। जो व्यक्ति भगवद् भावना से हरि-भक्तों का सम्मान करता है, विप्रेन्द्र, उसके ऊपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सब प्रसन्न हो जाते हैं। हरि-भक्तों के संयोजनों के संसर्ग, मात्र से बड़े पापी भी सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। हरि पूजा के प्रेमी और संकीर्तन प्रेमी भक्तों की सेवा में निरत रहने वाले घोर पापी भी परम गति को पा जाते हैं ॥५७-६२॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-सेवा-प्रभाव वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥ अध्याय ३७ विष्णु का माहात्म्य वर्णन सनक बोले— विप्रेन्द्र, फिर और भी भगवान् कमलापति का माहात्म्य सुनो। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो हरि कथा रूपी अमृत का पान करना न चाहेगा ॥१॥ विषयासक्त, मोह से व्याकुल रहने वाले मनुष्यों के सब पापों को दूर करने वाला एकमात्र हरि नाम ही है ॥२॥ जिसने मनुष्यों के सब पापों को दूर करने वाले विष्णु को एक बार भी प्रणाम नहीं किया उसको चाण्डाल समझना चाहिए। और ऐसे व्यक्ति से कभी बातचीत नहीं करनी चाहिए ॥३॥ द्विजोत्तम ! जिसके घर में कभी हरि की पूजा नहीं होती उसको श्मशान समझकर कभी उस घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए ॥४॥ हरि पूजा से विमुख, वेद निन्दक और गौ, ब्राह्मण से द्वेष करने वाले व्यक्ति राक्षस कहे जाते हैं ॥५॥ विप्रेन्द्र ! जो कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण द्वेष करते हुए गोविन्द की पूजा करता है उसकी

२३६ नारदीयपुराणम् अन्यश्रेयोविनाशार्थं येऽर्चयंति जनार्दनम् । सा पूजैव महाभाग पूजकामाशु हंति वै ॥७॥ हरिपूजाकरो यस्तु यदि पापं समाचरेत् । तमेव विष्णुद्वेष्टारं प्राहुस्तत्त्वार्थकोविदाः ॥८॥ ये विष्णुनिरताः संति लोकानुग्रहतत्पराः । धर्मकार्यरताः शश्वद्विष्णुरूपास्तु ते मताः ॥६॥ कोटिजन्मार्जितैः पुण्यैर्विष्णुभक्तिः प्रजायते । दृढभक्तिमतां विष्णौ पापबुद्धिः कथं भवेत् ॥१०॥ जन्मकोटयर्जितं पापं विष्णुपूजारतात्मनाम् । क्षयं याति क्षणादेव तेषां स्यात्पापधीः कथम् ॥११॥ विष्णुभक्तिविहीना ये चंडालाः परिकीर्तिताः । चंडाला अपि वै श्रेष्ठाः हरिभक्तिपरायणाः ॥१२॥ नराणां विषयांधानां सर्वदुःखविनाशिनी । हरिसेवेति विख्याता भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥१३॥ संगात्स्नेहाद्भयाल्लोभादज्ञानाद्वापि यो नरः । विष्णोरुपासनं कुर्यात्सोऽक्षयं सुखमश्नुते ॥१४॥ हरिपादोदकं यस्तु कणमात्रं पिबेदपि । स स्नातः सर्वतीर्थेषु विष्णोः प्रियतरो भवेत् ॥१५॥ अकालमृत्युशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वदुःखोपशमनं हरिपादोदकं स्मृतम् ॥१६॥ नारायणं परं धाम ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१७॥ अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥१८॥ आसीत्पुरा कृतयुगे गुलिको नाम लुब्धकः । परदारपरद्रव्यहरणे सततोग्यतः ॥१६॥ परनिंदापरो नित्यं जन्तूपद्रवकृत्तथा । हतवान्ब्राह्मणान् गाश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥२०॥ देवस्य हरणे नित्यं परस्वहरणे तथा । उद्यक्तः सर्वदा विप्र कीनाशानामधीश्वरः ॥२१॥ पूजा विफल होती है ॥६॥ अन्य लोगों के कल्याण के विनाश के लिए जो भगवान् की पूजा करता है वह पूजा ही उस पूजक को नष्ट कर देती है ॥७॥ हरि पूजा करने वाला व्यक्ति यदि पापाचरण करता है, उसी को तत्त्वज्ञ जन विष्णु-द्वेष्टा कहते हैं ॥८॥ जो विष्णु की सेवा में तथा लोक कल्याण में तत्पर रहकर धर्म संपादन करते हैं, उनको विष्णु रूप ही जानना चाहिए ॥६॥ करोड़ों जन्मों के संचित पुण्य के प्रभाव से ही विष्णु भक्ति प्राप्त होती है, और जिनकी विष्णु में दृढ़ भक्ति होगी उनको पापों की ओर प्रवृत्ति कैसे होगी ? ॥१०॥ विष्णु पूजा में सर्वदा लीन रहने वाले व्यक्ति के कोटि जन्म के पाप स्वतः तत्काल नष्ट हो जाते हैं । तब उनके मन में पाप वासना कैसे रह सकती है ? ॥११॥ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं वे चाण्डाल कहे जाते हैं, और चाण्डाल भी यदि विष्णु भक्ति में लगा रहता है तो वह श्रेष्ठ है ॥१२॥ विषयान्य मनुष्यों के सब दुःखों को दूर करने वाली और उनको भुक्ति और मुक्ति देने वाली हरि-सेवा ही है यह लोक-प्रसिद्ध है ॥१३॥ साहचर्य, स्नेह, भय, लोभ अथवा अज्ञान से भी जो मनुष्य विष्णु की उपासना करता है वह अक्षय सुख का उपभोग करता है ॥१४॥ जो व्यक्ति विष्णु-पादोदक का एक बिन्दु भी पी लेता है वह सब तीर्थों में स्नान करने का फल पाता है और वह विष्णु का प्रिय बन जाता है ॥१५॥ विष्णु का चरण-जल सब दुःखों को दूर करने वाला, अकाल मृत्यु से बचाने वाला और सब व्याधियों से मुक्त करने वाला है ॥१६॥ जो पर धाम, उत्तम प्रकाश, भगवान् नारायण की शरण में जाते हैं वे महात्मा अवश्य शाश्वत पद पा जाते हैं ॥१७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास सुना रहा हूँ, जिसके पाठ और श्रवण से सब पाप अनायास नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आज से बहुत पहले कृत युग में गुलिक नामक एक व्याध रहता था । वह सदा दूसरे का धन और स्त्रियाँ छीन लिया करता था ॥१६॥ नित्य प्रति दूसरे की निन्दा करने वाले और जन्तुओं को आतंकित करने वाले उस व्याध ने सैकड़ों, हजारों गायों और ब्राह्मणों की हत्या की थी ॥२०॥ वह यमराज देव-संपत्ति और दूसरे मनुष्यों के धन को लूटने के लिए सदा तैयार रहता था ॥२१॥

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३७ तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहांति च । न तेषां शक्यते वक्तु संख्या वत्सरकोटिभिः ॥२२॥ स कदाचिन्महापापो जन्तूनामन्तकोपमः । सौवीरराज्ञो नगरं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ॥२३॥ योषिद्भिर्भूषिताभिश्च सरोभिर्निर्मलोदकैः । अलंकृतं विपणिभिर्यौ देवपुरोपमम् ॥२४॥ तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमंदिरम् । छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ ॥२५॥ हरास्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चितम् । जगामाभ्यंतरं तस्य कीनाशश्चौर्यलोलुपः ॥२६॥ तत्रापश्यद्विजवरं शांतं तत्त्वार्थकोविदम् । परिचर्यापरं विष्णोरुत्तंकं तपसां निधिम् ॥२७॥ एकाकिनं दयालुं च निस्पृहं ध्यानलोलुपम् । चौर्यान्तरायकर्तारं तं दृष्ट्वा लुब्धको मुने ॥२८॥ द्रव्यजातं तु देवस्य हर्तुकामोऽतिसाहसी । उत्तं कं हंतुमारेभे विधुतासिर्मदोद्धतः ॥२६॥ पादेनाक्रम्य तद्वक्षो जटाः संगृह्य पाणिना । हंतुं कृतमतिं व्याधमुत्तंकः प्रेक्ष्य चाब्रवीत् ॥३०॥

उत्तंक उवाच भो भो साधो वृथा मां त्वं हनिष्यसि निरागसम् । मया किमपराद्धं ते तद्वदस्व महामते ॥३१॥ कृतापराधिनां लोके शक्ताः शिक्षां प्रकुर्वते । न हि सौम्य वृथा घ्नंति सज्जना अपि पापिनः ॥३२॥ विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान् । विरोधं नहि कुर्वति सज्जनाः शांतचेतसः ॥३३॥ बहुधा बोध्यमानोऽपि यो नरः क्षमयान्वितः । तमुत्तमं नरं प्राहुर्विष्णोः प्रियतरं सदा ॥३४॥ सुजनो न याति वैरं परहितबुद्धिर्विनाशकालेऽपि । छेदेऽपि चंदनतरुः सुरभयति मुखं कुठारस्य ॥३५॥

उस पापी ने इतने अधिक महान् पापों को किया था कि उसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं हो सकती है ॥२२॥ किसी समय प्राणियों के लिए यमराज के समान वह महापापी व्याध सब ऐश्वर्यों से परिपूर्ण देवनगरी के समान सौवीर राजा के नगर में गया । वहाँ की स्त्रियाँ आभूषणों से सुशोभित थीं। विमल जल वाली वावलियां और सजी हुई दूकानों से उस नगर की शोभा दुगुनी हो जाती थी । उस नगर के किसी उपवन के बीच एक रम्य केशव मन्दिर को, जो सुवर्णकलश से सुशोभित था, देखकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया । वह यमरा : "आज इस सुवर्ण-राशि को चुराऊँगा" ऐसा दृढ़ निश्चय कर चोरी के लोभ से उस मन्दिर के भीतर गया ॥२३-२६॥ वहां उसने एक परम तत्त्व के जानने वाले तपोनिधि, परम शान्त उत्तं क नामक ब्राह्मण को देखा जो विष्णु की आराधना में तल्लीन था । मुने ! उस निःस्पृह ध्यानलोलुप, दयालु और असहाय विप्र को चोरी में बाधक समझ कर उसे देव- संपत्ति को चुराने की इच्छा करने वाले साहसी मदांधत व्याध ने हाथों में खड्ग लेकर मारने को उद्यत हुआ ॥२७-२६॥ जब वह उसकी छाती पर पैर रखकर जटा को हाथ में पकड़कर मारने को तैयार हुआ तो उसको देखकर उत्तंक ने कहा ॥३०॥ उत्तंक बोले--हे साधो! क्यों व्यर्थ में मुझ निरपराध को मार रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? हे महामति उसको बताओ ॥३१॥ इस लोक में बलवान् व्यक्ति अपराधी को दण्ड देते हैं, और सज्जन पापियों को भी व्यर्थ दण्ड नहीं देते हैं ॥३२॥ जो सज्जन शान्त स्वभाव के होते हैं अपने विरोधी में भी चाहे वह मूर्ख ही क्यों न हो-गुणों को देखकर उसका विरोध नहीं करते ॥३३॥ जो बहुधा उत्तेजित करने पर क्षमा का त्याग नहीं करता उसी को उत्तम व्यक्ति कहा जाता है और सदा विष्णु का प्रिय पात्र बना रहता है ॥३४॥ विनाश काल में भी परोपकार की भावना रखने वाले सुजन वैर नहीं करते । चन्दन वृक्ष काटा जाने पर भी कुठार के मुख को सुगन्धित ही बनाता है ॥३५॥ अहो, दैव बड़ा प्रबल है

२३८ नारदीयपुराणम् अहो विधिः सुबलवान्बाधते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते हि दुरात्मना ॥३६॥ अहो निष्कारणं लोके बाधंते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते पिशुनैर्जनैः तत्रापि साधून्बाधंते न समानान्कदाचन ॥३७॥ मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥३८॥ अहो बलवती माया मोहयत्यखिलं जगत् । पुत्रमित्रकलत्रार्थं सर्वं दुःखेन योजयेत् ॥३९॥ परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं त्वया । अंते तत्सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै ॥४०॥ मम माता मम पिता मम भार्या ममात्मजाः । ममेदमिति जंतूनां ममता बाधते वृथा ॥४१॥ यावदर्जयति द्रव्यं बांधवास्तावदेव हि । धर्माधर्मौ सहैवास्तामिहामुत्र न चापरः ॥४२॥ धर्माधर्माजितैर्द्रव्यैः पोषिता येन ये नराः । मृतमग्निमुखे हुत्वा घृतान्नं भुंजते हि ते ॥४३॥ गच्छंतं परलोकं च नरं तु ह्यनुतिष्ठतः । धर्माधर्मा न च धनं न पुत्रा न च बांधवाः ॥४४॥ कामः समृद्धिमायाति नराणां पापकर्मणाम् । कामः संक्षयमायाति नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥४५॥ वृथैव व्याकुला लोका धनादीनां सदार्जने ॥४६॥ यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत् । इति निश्चितबुद्धीनां न चिंता बाधते क्वचित् ॥४७॥ दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माज्जन्म च मृत्युं च दैवं जानाति नापरः ॥४८॥ यत्र कुत्र स्थितस्यापि यद्भाव्यं तद्भवेद् ध्रुवम् । लोकस्तु तत्र विज्ञाय वृथायासं करोति हि ॥४९॥ अहो दुःखं मनुष्याणां ममताकुलचेतसाम् । महापापानि कृत्वापि परिपुष्यंति यत्नतः ॥५०॥ जो कि प्रायः सब सज्जनों को कष्ट देता रहता है, क्यों कि किसी से कुछ भी संबन्ध न रखने वाले को भी दुष्ट पीड़ा पहुँचाते रहते हैं ॥३६॥ आश्चर्य है कि प्रायः संसार में अकारण लोगों को कष्ट दिया जाता है । किसी का कुछ भी न बिगाड़ने वालों को दुष्ट जन व्यर्थ में पीड़ा पहुँचाते रहते हैं । दुष्ट केवल साधुजन को पीड़ित करते हैं, अपने समान दुष्ट का वे कुछ बिगाड़ नहीं पाते ॥३७॥ तृण, जल और केवल सन्तोष पर ही जीवन बिताने वाले मृग, मछली और सज्जनों का ब्याध, मल्लाह और चुगलखोर अकारण बैरी होते होते हैं ॥३८॥ माया भी कितनी प्रबल होती है जो सारे संसार को वश में कर लेती है, जिससे सभी पुत्र मित्र और स्त्री के लिए दुःख उठाते हैं ॥३९॥ तुमने दूसरों का धन चुरा कर स्त्री का पालन किया, परन्तु अन्त में सबको छोड़कर तुमको अकेला ही जाना पड़ेगा ॥४०॥ यह मेरी माता, यह मेरे पिता, यह मेरी स्त्री और ये मेरे पुत्र हैं, ऐसी ममता व्यर्थ में होती है क्योंकि जब तक लोग धन कमाते रहते हैं तभी तक सब भाई-बन्धु हैं । इस लोक और परलोक दोनों में केवल धर्म और अधर्म ही साथ रहते हैं ॥४१-४२॥ धर्म अथवा अधर्म से कमाई हुई संपत्ति से मनुष्य जिनका पोषण करता है वे ही उसके मर जाने पर उसे अग्नि के मुख में डालकर घृतान्न खाते हैं ॥४३॥ परलोक जाते हुए मनुष्य का धर्म और अधर्म ही अनुगमन करते हैं, धन, पुत्र और बान्धव नहीं । पापी मनुष्यों की इच्छायें सदा बढ़ती रहती हैं और पुण्य कर्म करने वाले की इच्छायें स्वयं शान्त हो जाती हैं ॥४४-४५॥ मनुष्य व्यर्थ ही सर्वदा धन कमाने के लिए व्याकुल रहते हैं । जो होने को होगा वह होगा ही और जो नहीं होने को है वह प्रयत्न करने पर भी नहीं होगा । इस प्रकार का विश्वास रखने वालों को चिन्ता कभी नहीं सताती है ॥४६-४७॥ जगत् के सब स्थावर जंगम दैव के ही अधीन हैं । इसलिए जन्म और मृत्यु की केवल दैव ही जानता है दूसरा कोई नहीं ॥४८॥ जहाँ कहीं रहने पर भी मनुष्य को उसके भाग्य की वस्तुयें निश्चय ही मिल जाती हैं । संसार इन बातों को जानकर भी व्यर्थ परिश्रम करता है ॥४९॥ माया से आतुर मनुष्यों की दशा देखकर, दुःख होता है कि मनुष्य महापाप

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३६ अर्जितं च धनं सर्वं भुंजते बांधवाः सदा। स्वयमेकतमो मूढस्तत्पापफलमश्नुते ॥५१॥ इति ब्रुवाणं तमृषिं विमुच्य भयविह्वलः। गुलिकः प्रांजलिः प्राह क्षमस्वेति पुनः पुनः ॥५२॥ सत्संगस्य प्रभावेण हरिसन्निधिमात्रतः। गतपापो लुब्धकश्च ह्यनुतापेदमब्रवीत् ॥५३॥ मया कृतानि पापानि महांति सुबहूनि च। तानि सर्वाणि नष्टानि विप्रेद्र तव दर्शनात् ॥५४॥ अहोऽहं पापधीर्नित्यं महापापमुपाचरम्। कथं मे निष्कृतिर्भूयो यामि कं शरणं विभोः ॥५५॥ पूर्वजन्मार्जितैः पापैर्लुब्धकत्वमवाप्तवान्। अत्रापि पापजालानि कृत्वा कां गतिमाप्नुयाम् ॥५६॥ अहो ममायुः क्षयमेति शीघ्रं पापान्यनेकानि समर्जितानि। प्रतिक्रिया नैव कृता मयैषां गतिश्च का स्यान्मम जन्म किं वा ॥५७॥ अहो विधिः पापशताकुलं मां किं सृष्टवान्पापतरं च शश्वत्। कथं च यत्पापफलं हि भोक्ष्ये कियत्सु जन्मस्वहमुग्रकर्मा ॥५८॥ एवं विनिन्दन्नात्मानमात्मना लुब्धकस्तदा। अंतस्तापाग्निसंतप्तः सद्यः पंचत्वमागतः ॥५६॥ उत्तंकः पतितं प्रेक्ष्य लुब्धकं तं दयापरः। विष्णुपादोदकेनैवमभ्यषिंचन्महामतिः ॥६०॥ हरिपादोदकस्पर्शात्त्लुब्धको गतकल्मषः। दिव्यं विमानमारुह्य मुनिमेतदथाब्रवीत् ॥६१॥ गुलिक उवाच उत्तंक मुनिशार्दूल गुरुस्त्वं मम सुव्रत। विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातककंचुकात् ॥६२॥ गतस्त्वदुपदेशान्मे संतापो मुनिपुंगव। तथैव सर्वपापानि विनष्टान्यतिवेगतः ॥६३॥ के द्वारा अपने आश्रित जनों का बड़े यत्न से पालन करता है। सदा उसकी कमाई हुई संपत्ति का उसके बन्धु जन उपभोग करते हैं, परन्तु पाप का फल उस मूर्ख को अकेले भोगना पड़ता ॥५०-५१॥ ऋषि के उपर्युक्त उपदेश को सुनकर उस गुलिक व्याधने उस ऋषि को छोड़ दिया और भय-विह्वल हो हाथ जोड़कर बार-बार क्षमा मांगने लगा ॥५२॥ सत्संग और विष्णु सान्निध्य के प्रभाव से वह लुब्धक निष्पाप हो गया, अपने किये पापों का स्मरण कर पछताने लगा। उसने उत्तंक ऋषि से कहा ॥५३॥— विप्रेन्द्र ! मैंने बहुत अधिक महापाप किये हैं परन्तु आपके दर्शन से मेरे वे सब पाप नष्ट हो गये ॥५४॥ आह ! मैं पापात्मा आजतक नित्य महापाप करता रहा, अब मेरा उद्धार कैसे होगा? विभो ! अब किसको शरण में जाऊँ ॥५५॥ पूर्व जन्म के पापों के कारण मुझे व्याध योनि मिली, और इस जन्म में भी मैंने केवल पाप राशि ही कमाई तो अब किस योनि में जाऊँगा ? ॥५६॥ आह ! शीघ्र ही मेरा जीवन भी समाप्त होने वाला है। अब तक अनेक पाप ही कमाये और पापों के लिए कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया। तब मेरी क्या गति होगी और कौन सा जन्म पाऊँगा ॥५७॥ विधि ने सैकड़ों पाप करने वाले मेरे लिए किस शाश्वत पाप योनि को चुना है, जो कुछ मेरे पाप फल हैं उनको भोगने के लिए क्रूर कर्म करने वाले मुझको कितने जन्म ग्रहण करने पड़ेंगे ? ॥५८॥ इस प्रकार स्वयं अपने पापों पर पश्चात्ताप कर ही रहा था कि तत्काल अन्तःकरण के पश्चात्ताप रूपी अग्नि में जलकर वह मर गया ॥५६॥ महामति ऋषि उत्तंक उस व्याध को इस प्रकार भूमि पर गिरते देखकर दयार्द्र हो गये और भगवान् के चरणोदक को उसके ऊपर छिड़क दिया ॥६०॥ भगवान् के चरणोदक के स्पर्श से वह लुब्धक निष्पाप हो गया और दिव्य विमान पर चढ़कर मुनि से बोला ॥६१॥ उत्तंक ! मुनिशार्दूल ! सुव्रत ! तुम मेरे गुरु हो, मुनिपुंगव ! तुम्हारे उपदेश से महापाप के बन्धन से छुटकारा मिला ॥६२॥ मुनिशार्दूल ! तुम्हारे उपदेशों से मेरा संताप दूर हो गया। इसी प्रकार मेरे सब पाप

२४० नारदीयपुराणम् हरिपादोदकं यस्मान्मयि त्वं सिक्तवान्मुने । प्लावितोऽस्मि त्वया तस्मात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६४॥ त्वयाहं तारितो विप्र पापाद्स्माच्छरीरतः । तस्मान्नतोऽस्मि ते विद्वन्मत्कृतं तत्क्षमस्व च ॥६५॥ इत्युक्त्वा देवकुसुमैर्मुनिश्श्रेष्ठं समाकिरन् । प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा नमस्कारं चकार सः ॥६६॥ ततो विमानमारुह्य सर्वकामसमन्वितम् । अप्सरोगणसंकीर्णः प्रपेदे हरिमंदिरम् ॥६७॥ एतद्दृष्ट्वा विस्मितोऽसौ ह्युत्तंकस्तपसांनिधिः । शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टाव कमलापतिम् ॥६८॥ तेन स्तुतो महाविष्णुर्दत्त्वान्वरमनुत्तमम् । वरेण तेनोत्तंकोऽपि प्रपेदे परमं पदम् ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥

अष्टविंशोऽध्यायः

नारद उवाच किं तत्स्तोत्रं महाभाग कथं तुष्टो जनार्दनः । उत्तंकः पुण्यपुरुषः कीदृशं लब्धवान्वरम् ॥१॥ सनक उवाच उत्तंकस्तु तदा विप्रो हरिध्यानपरायणः । पादोदकस्य माहात्म्यं दृष्ट्वा तुष्टाव भक्तितः ॥२॥

शीघ्र नष्ट हो गये। मुने ! तुमने विष्णु के चरणोदक से मेरा अभिषेक किया है इसलिए तुमने मुझे विष्णु के परम पद में पहुँचा दिया ॥६३-६४॥ विप्र ! तुमने इस पापमय शरीर से मुझको मुक्त कर दिया इसलिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ। विद्वन् ! आप मेरे अपराधों को क्षमा कर दें,। यह कह कर उस गुलिक ने उस मुनिपुंगव को- जिसके ऊपर देव गण पुष्प वृष्टि कर रहे थे, तीन प्रदक्षिणा की और हाथ जोड़कर नमस्कार किया ॥६५-६६॥ इसके अनन्तर सब इष्ट पदार्थों से भरे हुए और अप्सराओं से सुशोभित विमान पर चढ़कर हरिलोक को चला गया ॥६७॥ यह देखकर तपोनिधि उत्तंक को परम विस्मय हुआ। उन्होंने शिर पर अंजलि बाँध कर कमलापति की स्तुति की। उस स्तुति से प्रसन्न होकर उन्होंने उत्तम वर प्रदान किया। उस वर के प्रभाव से वह ऋषि भी अनुपम लोक को चला गया ॥६८-६९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्य-वर्णन नामक सैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३७॥

अध्याय ३८ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन नारद बोले- महाभाग ! वह कौन-सा स्तोत्र है जिससे हरि प्रसन्न हो जाते हैं ? पुण्य पुरुष उत्तंक ने कैसा वर प्राप्त किया ? ॥१॥ सनक बोले- विप्र ! उस समय हरिध्यान-परायण उत्तंक ने पादोदक का माहात्म्य देखकर भक्तिपूर्वक भगवान् की स्तुति की ॥२॥

अष्टात्रिंशोऽध्यायः २४१ उत्तंक उवाच नतोऽस्मि नारायणमादिदेवं जगन्निवासं जगदेकबंधुम् । चक्राब्जशाङ्गीसिधरं महांर्त स्मृतार्तिनिघ्नं शरणं प्रपद्ये ॥३॥ यन्नाभिजान्जप्रभवो विधाता सृजत्यमुं लोकसमुच्चयं च । यत्क्रोधजो हंति जगच्च रुद्रस्तमादिदेवं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥४॥ पद्मापतिं पद्मदलायताक्षं विचित्रवीर्यं निखिलैकहेतुम् वेदांतवेद्यं पुरुषं पुराणं तेजोनिधिं विष्णुमहं प्रपन्नः ॥५॥ आत्माक्षरः सर्वगतोऽच्युताख्यो ज्ञानात्मको ज्ञानविदां शरण्यः । ज्ञानैकवेद्यो भगवाननादिः प्रसीदतां व्यष्टिसमष्टिरूपः ॥६॥ अनंतवीर्यो गुणजातिहीनो गुणात्मको ज्ञानविदां वरिष्ठः । नित्यः प्रपन्नार्तिहरः परात्मा दयांबुधिर्मे वरदस्तु भूयात् ॥७॥ यः स्थूलसूक्ष्मादिविशेषभेदैर्जगद्यथावत्स्वकृतं प्रविष्टः । त्वमेव तत्सर्वमनंतसारं त्वत्तः परं नास्ति यतः परात्मन ॥८॥ अगोचरं यत्तव शुद्धरूपं मायाविहीनं गुणजातिहीनम् । निरञ्जनं निर्मलमप्रमेयं पश्यंति सन्तः परमार्थसंज्ञम् ॥६॥ एकेन हेम्नैव विभूषणानि यातानि भेदत्वमुपाधिभेदात् । तथैव सर्वेश्वर एक एव प्रदृश्यते भिन्न इवाखिलात्मा ॥१०॥

उत्तंक बोले — नारायण, आदिदेव, जगन्निवास और जगद्वन्धु को नमस्कार है । चक्र, कमल, धनुष्, और खड्ग को धारण करने वाले और स्मरण मात्र से सब बाधाओं को दूर करने वाले भगवान् की शरण में हूँ ॥३॥ जिसके नाभिकमल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा इस त्रिलोकी की सृष्टि करता है, जिसके क्रोध से उत्पन्न होकर रुद्र सारे संसार को जला देते हैं उस आदिदेव विष्णु को प्रणाम करता हूँ ॥४॥ पद्मापति, पद्मदल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाले, विचित्र प्रभाव और पराक्रम वाले, वेदान्त वेद्य, अखिल लोक के एक मात्र कारण तेजो निधि विष्णु की शरण में आया हूँ॥५॥ समष्टि और व्यष्टि उभय रूपवाले, आत्मा, अक्षर, सर्वव्यापक, अच्युत, ज्ञानरूप, ज्ञानियों के आश्रय तथा केवल ज्ञान से प्राप्त होने योग्य अनादि भगवान् प्रसन्न हो जाइए ॥६॥ अनन्त पराक्रम-शील, गुण जाति हीन, गुण रूप, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, नित्य, भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, परात्मा, दया- सागर आप मुझे वर प्रदान करें ॥७॥ तुम स्थूल, सूक्ष्म आदि अनेक रूपों में जगत् का निर्माण कर पुनः अपनी सृष्टि में प्रवेश कर जाते हो, और तुम्हीं अनन्त तत्त्वों से परिपूर्ण सम्पूर्ण पदार्थ हो । परात्मन् ! तुमसे बढ़कर इस संसार में और कोई पदार्थ नहीं ॥८॥ जो तुम्हारा अगोचर माया, गुण, जाति से हीन शुद्ध रूप है उसी निरंजन, निर्मल, अप्रमेय परमार्थ नामक तुमको सन्त सर्वदा देखते हैं ॥९॥ जिस प्रकार एक ही सुवर्ण से अनेक आभूषण बनते हैं और उपाधि (विशेषण) भेद से उसके अनेक नाम हो जाते हैं उसी प्रकार अखिल पदार्थों में रहने वाला एक ही सर्वेश्वर एक होता हुआ भी अनेक दिखाई पड़ता है ॥१०॥ जिसकी माया से मोहित होकर मनुष्य उस प्रसिद्ध ३१--ना० पु०

२४२ नारदीयपुराणम् यन्मायया मोहितचेतसस्तं पश्यंति नात्मानमपि प्रसिद्धम् । त एव मायारहितास्तदेव पश्यन्ति सर्वात्मकमात्मरूपम् ॥११॥ विभुं ज्योतिरनौपम्यं विष्णुसंज्ञं नमाम्यहम् । समस्तमेतदुद्भूतं यतो यत्र प्रतिष्ठितम् ॥१२॥ यतश्चैतन्यमायातं यद्रूपं तस्य वै नमः । अप्रमेयमनाधारमाधाराधेयरूपकम् ॥१३॥ परमानन्दचिन्मात्रं वासुदेवं नतोऽस्म्यहम् । हृद्गुहानिलयं देवं योगिभिः परिसेवितम् ॥१४॥ योगानामादिभूतं तं नमामि प्रणवस्थितम् । नादात्मकं नादबीजं प्रणवात्मकमव्ययम् ॥१५॥ सद्भावं सच्चिदानन्दं तं वन्दे तिग्मचक्रिणम् । अजरं साक्षिणं त्वस्य ह्यवाङ्मनसगोचरम् ॥१६॥ निरञ्जनमनंताख्यं विष्णुरूपं नतोऽस्म्यहम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ॥१७॥ वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । विद्याविद्यात्मकं प्राहुः परात्परतरं तथा ॥१८॥ अनादिनिधनं शांतं सर्वधातारमच्युतम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१९॥ वरं वरेण्यं वरदं पुराणं सनातनं सर्वगतं समस्तम् । नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयो नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयः ॥२०॥ यत्पादतोयं भवरोगवैद्यो यत्पादपांशुर्विमलत्वसिद्ध्यै । यन्नाम दुष्कर्मनिवारणाय तमप्रमेयं पुरुषं भजामि ॥२१॥ सद्रूपं तमसद्रूपं सदसद्रूपमव्ययम् । तत्तद्विलक्षणं श्रेष्ठं श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतरं भजे ॥२२॥ निरञ्जनं निराकारं पूर्णमाकाशमध्यगम् । परं च विद्याविद्याभ्यां हृदंबुजनिवासिनम् ॥२३॥ स्वप्रकाशमनिर्देश्यं महतां च महत्तरम् । अणोरणीयांसमजं सर्वोपाधिविवर्जितम् ॥२४॥ आत्मा को भी नहीं देख पाते और वे ही मनुष्य जब भगवत्कृपा से मायामुक्त हो जाते हैं तब तत्काल सब प्राणियों में व्याप्त आत्मा के रूप को देखने लगते हैं ॥११॥ व्यापक, ज्योति, अनुपम विष्णु नामक परमात्मा को नमस्कार करता हूँ, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह प्रतिष्ठित है। ॥१२॥ विष्णु के उस रूप को नमस्कार करता हूँ जिससे चैतन्य की प्राप्ति होती है। अप्रमेय, अनाधार, आधाराधेय रूप परानंद चिन्मात्र वासुदेव को नमस्कार है। हृदयरूपी गुहा में रहने वाले, योगियों से पूजित और योगों के एक मात्र आदि आधार, प्रणव में रहने वाले, नादात्मक, नादबीज, प्रणवरूप, अव्यय, सद्भाव, तीक्ष्ण चक्र धारण करने वाले सच्चिदानन्द की वन्दना करता हूँ ॥१३-१५½॥ भगवान् के अजर साक्षी, वाणी और मन की पहुँच से परे रहने वाले, निरंजन, अनन्त नामक विष्णु रूप को नमस्कार करता हूँ। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सत्त्व, तेज, बल, धृति क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) सब वासुदेव के ही रूप हैं और वही विद्याविद्यात्मक परात्परतर है ॥१६-१८॥ जो महात्मा उस अनादि, अनन्त, शान्त, सबके पालक की शरण में जाते हैं उनको अवश्य शाश्वत मुक्ति मिल जाती है ॥१९॥ वर, वरेण्य, वरद, पुराण, सनातन, सर्व व्यापक भगवान् को नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ और बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥२०॥ जिसका चरणोदक संसार की आधियों को नष्ट करने के लिए एक वैद्य है, जिसकी चरणरेणु मानव को निर्मल बुद्धि प्रदान करती है और जिसका नाम दुष्कर्मों के निवारण के लिए समर्थ है उस अप्रमेय पुरुष की वन्दना करता हूँ ॥२१॥ सद्रूप असद्रूप, सदसद्रूप, अव्यय, सदसद्विलक्षण, श्रेष्ठ और श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ को नमस्कार है ॥२२॥ निरंजन, निराकार, पूर्ण आकाश के मध्य विचरण करने वाले, स्वप्रकाश, अनिर्देश्य, महान् से भी महान्,

अष्टत्रिंशोऽध्यायः २४३ यन्नित्यं परमानन्दं परं ब्रह्म सनातनम् । विष्णुसंज्ञं जगद्धामतमस्मि शरणं गतः ॥२५॥ यं भजन्ति क्रियानिष्ठा यं पश्यन्ति च योगिनः । पूज्यात्पूज्यतरं शांतं गतोऽस्मि शरणं प्रभुम् ॥२६॥ यं न पश्यन्ति विद्वांसो य एतद्व्याप्य तिष्ठति । सर्वस्मादधिकं नित्यं नतोऽस्मि विभुमव्ययम् ॥२७॥ अन्तःकरणसंयोगाज्जीव इत्युच्यते च यः । अविद्याकार्यरहितः परमात्मेति गीयते ॥२८॥ सर्वात्मकं सर्वहेतुं सर्वकर्मफलप्रदम् । वरं वरेण्यमजनं प्रणतोऽस्मि परात्परम् ॥२९॥ सर्वज्ञं सर्वगं शांतं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । ज्ञानात्मकं ज्ञाननिधिं ज्ञानसंस्थं विभुं भजे ॥३०॥ नमाम्यहं वेदनिधिं मुरारिं वेदांतविज्ञानसुनिश्चितार्थम् । सूर्येन्दुवह्नेरोज्ज्वलनेत्रमिन्द्रं खगस्वरूपं श्वपतिस्वरूपम् ॥३१॥ सर्वेश्वरं सर्वगतं महांर्त वेदात्मकं वेदविदां वरिष्ठम् । तं वाङ्मनोऽचिंत्यमनंतशक्तिं ज्ञानैकवेद्यं पुरुषं भजामि ॥३२॥ इन्द्राग्निकालासुरपाशिवायुसोमेशमार्तण्डपुरंदराद्यैः । यः पाति लोकान्परिपूर्णभावस्तमप्रमेयं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ सहस्रशीर्षं च सहस्रपादं सहस्रबाहुं च सहस्रनेत्रम् । समस्तयज्ञैः परिजुष्टमाद्यं नतोऽस्मि तुष्टिप्रदमुग्रवीर्यम् ॥३४॥ कालात्मकं कालविभागहेतुं गुणत्रयातीतमहं गुणज्ञम् । गुणप्रियं कामदमस्तसंगमतीन्द्रियं विश्वभुजं वितृष्णम् ॥३५॥ निरीहमग्र्यं मनसाप्यगम्यं मनोमयं चान्नमय निरूढम् । विज्ञानभेदं प्रतिपन्नकल्पं न वाङ्मयं प्राणमयं भजामि ॥३६॥ अणु से भी अणु, अज, सब उपाधियों से रहित, नित्य परमानन्द, परब्रह्म सनातन विष्णु हैं उनकी शरण में हूँ ॥२५॥ जिसको केवल क्रियानिष्ठ व्यक्ति ही भजते हैं, जिसको योगी जन ही देख पाते हैं, उस परमपूज्य शान्त भगवान् की शरण में हूँ ॥२६॥ जिसको विद्वान् जन भी नहीं देख सकते, जो सर्वव्यापक है, जो सबसे अधिक नित्य, विभु और अव्यय हैं उसको नमस्कार है ॥२७॥ जो अन्तःकरण के संयोग से जीव और अविद्या कार्य से रहित परमात्मा कहा जाता है, जो सर्वात्मक, सबका कारण, सब कर्मफलों को देने वाला, वर, वरेण्य, अजन और पर से पर है उसको नमस्कार है ॥२८-२९॥ सर्वज्ञ, सर्वग, शान्त, सब के अन्तर्यामी, ज्ञानरूप, ज्ञाननिधि और ज्ञानस्थ व्यापक हरि को भजता हूँ ॥३०॥ मैं वेदनिधि, मुरारि, वेदान्त के ज्ञान से निश्चित अर्थ के रूप में प्रतीत होने वाले, सूर्य- चन्द्र रूप नेत्रवाले, इन्द्र, खग स्वरूप, श्वपति स्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वगत, महान्, वेद स्वरूप, वेद ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, वाणी और मन के चिन्तन से परे रहने वाले, अनन्तशक्ति और एकमात्र ज्ञान से ही जानने योग्य को नमस्कार करता हूँ ॥३१-३२॥ जो परिपूर्ण भाव वाले, परमात्मा, इन्द्र, अग्नि, काल, असुर, वरुण, वायु, सोम, सूर्य, पुरन्दर आदि रूपों से विश्व की रक्षा करते हैं, उन अप्रमेय पुरुष की शरण में आया हूँ ॥३३॥ सहस्र शिर, चरण, बाहु और नेत्र वाले, सब यज्ञों के एक मात्र पूजनीय, आदि, तुष्टि देने वाले उग्र पराक्रमी, कालात्मक, काल विभाग के कारण, त्रिगुणातीत, गुणज्ञ, गुणप्रिय, मनोरथदाता, निर्लेप, अतीन्द्रिय, विश्वभोक्ता, तृष्णा रहित, निरीह, श्रेष्ठ, मन से परे, मनोमय, अन्नमय, अत्यन्त रूढ, विज्ञानभेद, जादृत, वाङ्मय से परे और प्राणमय को नमस्कार करता हूँ ॥३४-३६॥ जिसके रूप नहीं, जिसके बल, प्रभाव,

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२४४ नारदीयपुराणम् न यस्य रूपं न बलप्रभावो न यस्य कर्माणि न यत्प्रमाणम् जानंति देवा कमलोद्भवादखास्तोष्यास्यहं तं कथमात्मरूपम् ॥३७॥ संसारसिंधौ पतितं कदर्यं मोहाकुलं कामशतेन बद्धम् । अकीर्तिभाजं पिशुनं कृतघ्नं सदाशुचिं पापरतं प्रमन्युम् । ॥३८॥ दयांबुधे पाहि भयाकुलं मां पुनः पुनस्त्वां शरणं प्रपद्ये इति प्रसादितस्तेन दयालुः कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य भगवांस्तेजसां निधिः ॥३६॥ अतसीपुष्पसंकाशं फुल्लपङ्कजलोचनम् । किरीटिनं कुण्डलिनं हारकेयूरभूषितम् ॥४०॥ श्रीवत्सकौस्तुभधरं हेमयज्ञोपवीतिनम् । नासाविन्यस्तमुक्ता भवधर्मानतनुच्छविम् ॥४१॥ पीतांबरधरं देवं वनमालाविभूषितम् । तुलसीकोमलदलैरर्चितांघ्रि महाद्युतिम् ॥४२॥ किंकिणीनू पुराद्यैश्च शोभितं गरुडध्वजम् । दृष्ट्वाऽननाम विप्रेन्द्रो दण्डवत्क्षितिमण्डले ॥४३॥ अभ्यषिञ्चद्धरैः पादावुत्तंको हर्षवारिभिः । मुरारे रक्ष रक्षेति व्याहरन्नान्यधीस्तदा ॥४४॥ तमुत्थाप्य महाविष्णुरालिलिंग दयापरः । वरं वृणुष्व वत्सेति प्रोवाच मुनिपुङ्गवम् ॥४५॥ असाध्यं नास्ति किंचित्ते प्रसन्ने मयि सत्तम । इतीरितं समाकर्ण्य ह्युत्तंकश्चक्रपाणिना । ॥४६॥ पुनः प्रणम्य तं प्राह देवदेवं जनार्दनम् किं मां मोहयसीश त्वं किमन्यैर्देव मे वरैः । त्वयि भक्तिर्दृढा मेऽस्तु जन्मजन्मांतरेष्वपि ॥४७॥ कीटेपु पक्षिषु मृगेषु सरीसृपेषु रक्षःपिशाचमनुषेष्वपि यत्र तत्र जातस्य मे भवतु केशव ते प्रसादात्त्वय्येव भक्तिरचलाव्यभिचारिणी च ॥४८॥ कर्म और प्रमाण का ज्ञान नहीं, जिसको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते उस आत्मरूप की स्तुति कैसे कर सकता हूँ ॥३७॥ हे दयासागर ! इस संसार-सागर में डूबे हुए, मेरे समान कायर, मोहाकुल, अनेकों कामनाओं में फँसे, निन्दित, चुगलखोर, कृतघ्न, अपवित्र, पाप में रत, क्रोधी और भयत्रस्त की आप रक्षा करें और मुझे अपनी शरण में रखें ॥३८॥ महामुनि उत्तंक की इतनी प्रार्थना सुनकर दयालु, तेज निधि भगवान् कमलापति प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुए । उसने अतसी-कुसुम के समान नील वर्ण, खिले कमल के समान नेत्र वाले, किरीट, कुण्डल, केयूर और हार से सुशोभित, श्रीवत्स और कौस्तुभ को धारण किये हुए, सोने का यज्ञोपवीत पहने हुए, नाक में पहने हुए मोती की आभा से बढ़ती हुई शोभा वाले, पीताम्बरधारी भगवान् गरुड़ध्वज को देखा; जो वन- माला, किंकिणी और नूपुर से सुशोभित थे, जिनके युगल चरण तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजित थे, जिनकी देह- कान्ति चारों ओर फैल रही थी । विप्रवर्य ने भगवान् को देखकर पृथिवी पर गिरकर साष्टांग दण्डवत् किया और अपने आनन्द के आंसुओं से उनके चरणों को धो दिया ॥३६-४३१॥ उस समय अनन्य भाव से हे मुरारे ! रक्षा करो, रक्षा करो, यही शब्द उसके मुंह से निकले । दयालु महाविष्णु ने उठाकर उस मुनि को गले लगाया और कहा कि 'वत्स ! वर मांगो ।।४४-४५।। सज्जनवर्य ! मेरे प्रसन्न हो जाने पर तुम्हारे लिए कुछ भी असाध्य नहीं । भगवान् चक्रपाणि की इन बातों को सुनकर उत्तंक ने फिर प्रणाम किया और देव-देव जनार्दन से कहा ॥४६॥ ईश, देव ! तुम मुझको अन्य वरदान का लोभ दिखाकर क्यों मोह में डाल रहे हो ? जन्मजन्मान्तर में भी तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अचला भक्ति बनी रहे ॥४७॥ केशव ! कीट, पक्षी, राक्षस, पिशाच, मृग, सरीसृप, मनुष्य आदि किसी भी योनि में जन्म ग्रहण करूँ, परन्तु तुम्हारी कृपा से तुम में ही मेरी अटल दृढ़ भक्ति बनी

अष्टत्रिंशोऽध्यायः २४५ एवमस्त्विति लोकेशः शङ्खप्रान्तेन संस्पृशन् । दिव्यज्ञानं ददौ तस्मै योगिनामपि दुर्लभम् ॥४६॥ पुनः स्तुवन्तं विप्रेन्द्रं देवदेवो जनार्दनः । इदमाह स्मितमुखो हस्तं तच्छिरसि न्यसन् ॥५०॥ श्रीभगवानुवाच आराध्य क्रियायोगैर्यां सदाद्विजसत्तम । नरनारायणस्थानं व्रज मोक्षं गमिष्यसि ॥५१॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं यः पठेत्सततं नरः । सर्वान्कामानवाप्यांते मोक्षभागी भवेत्ततः ॥५२॥ इत्युक्त्वा माधवो विप्रं तत्रैवांतर्दधे मुने । नरनारायणस्थानमुत्तंकोऽपि ततो ययौ ॥५३॥ तस्माद्भक्तिः सदा कार्या देवदेवस्य चक्रिणः । हरिभक्तिः परा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ॥५४॥ उत्तंको भक्तिभावेन क्रियायोगपरो मुने । पूजयन्माधवं नित्यं नरनारायणाश्रमे ॥५५॥ ज्ञानविज्ञानसंपन्नः संच्छिन्नद्वैतसंशयः । अवाप दुरवापं वै तद्विष्णोः परमं पदम् ॥५६॥ पूजितो नमितो वापि संस्मृतो वापि मोक्षदः । नारायणो जगन्नाथो भक्तानां मानवर्द्धनः ॥५७॥ तस्मान्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥५८॥ यः पठेदिदमाख्यानं शृणुयाद्वा समाहितः । सोऽपि सर्वाघनिर्मुक्तः प्रयाति भवनं हरेः ॥५६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥

रहे ॥४८॥ लोक पति ने शंख से उसको छूते हुए कहा 'ऐसा ही होगा, और योगियों के लिए भी दुर्लभ दिव्य ज्ञान को दिया ॥४६॥ फिर स्तुतिपरायण उस विप्र के शिर पर हाथ फेरते हुए देवदेव जनार्दन ने हँसकर कहा ॥५०॥ द्विजश्रेष्ठ ! कर्मयोग के द्वारा मेरी आराधना करो, नर-नारायण के आश्रम में जाओ, मोक्ष अवश्य पा जाओगे ॥५१॥ जो मनुष्य तुम्हारे इस स्तोत्र का पाठ करेगा; वह सब मनोरथों को प्राप्त कर अन्तकाल में मोक्ष प्राप्त करेगा ॥५२॥ मुने ! यह कह कर माधव वहीं अन्तर्हित हो गये । इसके अनन्तर उत्तंक भी नर-नारायण- आश्रम को गया ॥५३॥ इसलिए देवदेव चक्रधर की भक्ति सदा करनी चाहिए । हरि-भक्ति अत्यन्त उत्कृष्ट और सब फलों को देने वाली है ॥५४॥ मुने ! उत्तंक ने नारायण-आश्रम में जाकर क्रियायोगपरायण होकर भक्ति- पूर्वक माधव की पूजा की, ज्ञान विज्ञान से युक्त हो द्वैत भाव पर विजय प्राप्त की और दुर्लभ विष्णु के दुर्लभ परमपद को प्राप्त किया ॥५५-५६॥ भक्तों के मान बढ़ाने वाले नारायण जगन्नाथ की पूजा, स्तुति, नमस्कार, अथवा स्मरण करने पर अवश्य मोक्ष प्राप्त होता है । इसलिए उभय लोक में सुख की कामना करने वाला व्यक्ति अवश्य अनन्त, अपराजित नारायण की पूजा करे ॥५७-५८॥ जो व्यक्ति इस आख्यान को ध्यानपूर्वक पढ़ता है या सुनता है वह भी सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है ॥५६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३८॥

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः सनक उवाच भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं परमेष्ठिनः । सर्वपापहरं पुण्यं भुवितमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥ अहो हरिकथालोके पापघ्नी पुण्यदायिनी । शृण्वतां वदतां चैव तद्भक्तानां विशेषतः ॥२॥ हरिभक्तिरसास्वादमुदिता ये नरोत्तमाः । नमस्करोम्यहं तेभ्यो यत्संगान्मुक्तिभाङ्नरः ॥३॥ हरिभक्तिपरा ये तु हरिनामपरायणाः । दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥४॥ संसारसागरं तर्तुं य इच्छेन्मुनिपुङ्गव । स भजेद्धरिभक्तानां भक्तांश्चै पापहरिणः ॥५॥ दृष्टः स्मृतः पूजितो वा ध्यातः प्रणमितोऽपि वा । समुद्धरति गोविन्दो दुस्तराद्भवसागरात् ॥६॥ स्वपन्भुञ्जन् व्रजंस्तिष्ठन्नुत्तिष्ठंश्च वदंस्तथा । चिंतयेद्यो हरेर्नाम तस्मै नित्यं नमो नमः ॥७॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं विष्णुभक्तिरतात्मनाम् । येषां मुक्तिः करस्थैव योगिनामपि दुर्लभा ॥८॥ अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रनाशनम् ॥६॥ आसीत्पुरा महीपालः सोमवंशसमुद्भवः । जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥१०॥ विष्णोर्देवालये नित्यं संमार्जनपरायणः । दीपदानरतश्चैव सर्वभूतदयापरः ॥११॥

अध्याय ३६ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन सनक बोले— विप्रेन्द्र ! अब पुनः परमेष्ठी के माहात्म्य को सुनो, जो मनुष्यों के सब पापों को हरने वाला, पवित्र और भुक्ति मुक्ति दोनों को देने वाला है ॥१॥ इस लोक में हरि-कथा पापों को हरने वाली और पुण्य प्रदान करने वाली है । इस कथा को श्रवण करने वाले, पाठ करने वाले और इसके भक्तों को विशेष फल मिलता है ॥२॥ जो नरपुंगव हरि-भक्ति का रसास्वादन कर सर्वदा मुदित रहते हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ, उनकी संगति मात्र से मनुष्य मुक्ति पा जाता है ॥३॥ जो हरिभक्ति में रत रहने वाले या हरि नाम का स्मरण करने वाले हैं उनकी भी मैं वन्दना करता हूँ चाहे वे दुराचारी हों या सदाचारी ॥४॥ मुनिपुंगव ! जो इस संसार- सागर को पार करना चाहते हैं, वे हरि-भक्तों का सम्मान अवश्य करें । क्योंकि भक्त मनुष्यों के सब पापों के हरने वाले हैं ॥५॥ गोविन्द की पूजा, दर्शन, ध्यान और प्रणाम करने से वे इस दुस्तर भवसागर से अवश्य पार लगा देते हैं ॥६॥ जो सोते, खाते, चलते, बैठते और बोलते समय हरि-नाम का चिन्तन करते हैं उनको नित्य नमस्कार है ॥७॥ विष्णु-भक्ति में निष्ठा रखने वाले महापुरुषों के भाग्य की जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है, जिनके लिए योगिदुर्लभ मुक्ति भी हस्तामलकवत् है ॥८॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जिसके श्रवण और पाठ से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥६॥ प्राचीन काल में जयध्वज नामक सोमवंशीय राजा था, जो विष्णु में अटल भक्ति रखता था ॥१०॥ वह प्रति दिन विष्णु मन्दिर में अपने हाथ से झाडू लगाता, दीप जलाता और सब प्राणियों पर दया भाव

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४७ स कदाचिन्महीपालो रेवातीरे मनोरमे । विचित्रकुसुमोपेतं कृतवान्विष्णुमंदिरम् ॥१२॥ स तत्र नृपशार्दूलः सदा संमार्जने रतः । दीपदानपरश्चैव विशेषेण हरिप्रियः ॥१३॥ हरिनामपरो नित्यं हरिसंसक्तमानसः । हरिप्रणामनिरतो हरिभक्तजनप्रियः ॥१४॥ वीतिहोत्र इति ख्यातो ह्यासीत्तस्य पुरोहितः । जयध्वजस्य चरितं दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥१५॥ कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम् । अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तु वेदवेदांगपारगः ॥१६॥ वीतिहोत्र उवाच राजनपरमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण । विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि भरतर्षभ ॥१७॥ संमार्जनपरो नित्यं दीपदानरतस्तथा । तन्मे वद महाभाग किंत्वया विदितं फलम् ॥१८॥ संपादनेन वर्त्तीनां तैलसंपादनेन च । संयुक्तोऽसि सदा भद्र यद्विष्णोर्गृहमार्जने ॥१९॥ कर्माण्यन्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रीतिकराणि च । तथापि किं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥२०॥ सर्वात्मना महापुण्य नरेश विदितं च यत् । तद् ब्रूहि मे गुह्यतमं प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥२१॥ पुरोधसैवमुक्तस्तु प्रहसन्स जयध्वजः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥२२॥ जयध्वज उवाच शृणुष्व विप्रशार्दूल मयैवाचरितं पुरा । जातिस्मरत्वान्जानामि श्रोतृणां विस्मयप्रदम् ॥२३॥ आसीत्पुरा कृतयुगे ब्रह्मन्स्वारोचिषेंऽतरे । रैवतो नाम विप्रेन्द्रो वेदवेदांगपारगः ॥२४॥ अयाज्ययाजकश्चैव सदैव ग्रामयाजकः । पिशुनो निष्ठुरश्चैव ह्यपण्यानां च विक्रयी ॥२५॥ रखता था ॥११॥ किसी समय उसने विचित्र फूलों से सुशोभित नर्मदा के मनोहर तट पर एक विष्णु- मन्दिर बनवाया ॥१२॥ वह हरिभक्त नृपशार्दूल सदा उस देव मन्दिर की सफाई किया करता और भगवान् को दीपक दिखाया करता था ॥१३॥ इस प्रकार वह अपनी साधना से भगवान् का परम प्रिय भक्त हो गया । वह नित्य हरि-नाम का जप करता, हरि का ही ध्यान करता और भगवान् की स्तुति किया करता था ॥१४॥ उस हरिभक्त-प्रेमो राजा का वीतिहोत्र नामक एक पुरोहित था । वह जयध्वज का चरित्र देखकर आश्चर्यचकित था । एक दिन वेद-वेदांग के पारगामी उस पुरोहित ने विष्णु- सेवा में लगे हुए उस राजा से पूछा ॥१५-१६॥ वीतिहोत्र बोले-परमधर्म के ज्ञाता, हरि-भक्ति में निष्ठा रखने वाले हे राजन् ! तुम विष्णु- भक्तों में श्रेष्ठ हो, प्रतिदिन मन्दिर की सफाई में लगे रहते हो और दीपक भी दिखाते हो ॥१७॥ इसलिए इस दीर्घ साधना से क्या फल मिला, यह मुझे बताओ ॥१७-१८॥ भद्र ! तुम सदा बत्तियां बनाने, तेल जुटाने और मन्दिर में झाडू लगाने में लगे रहते हो ॥१९॥ महाभाग ! हरि-सेवा तो और प्रकार से भी की जा सकती है तथापि तुम क्यों इन्हीं कार्यों में सदा लगे रहते हो ॥२०॥ यदि तुम्हारा मेरे प्रति कुछ प्रेम है तो नरेश ! अपने अब तक के अनुभव से जो कुछ अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्य जान पाये हो उसको कहो ॥२१॥ पुरोहित की उपर्युक्त बातों को सुनकर जयध्वज हँस पड़ा और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से बोला ॥२२॥ जयध्वज बोले- प्राचीन काल में मैंने जो कुछ किया है उसको सुनो । जातिस्मर के कारण मैं पूर्व जन्म की उन बातों को जानता हूँ जिनको सुनकर पाठकों को आश्चर्य होगा॥२३॥ ब्रह्मन् ! स्वारोचिष मन्वन्तर में कृतयुग में वेद-वेदांगों का ज्ञाता रैवत नामक एक विप्र था । वह सदा अपात्रों से यज्ञ कराता