भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 1008 में से

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षट्त्रिंशोऽध्यायः २३३ अथ ते हरिदूतास्तं यज्ञमालिमहौजसम् । असौ सुमाली भ्राता ते पापात्मेति समब्रुवन् ॥२६॥ यज्ञमाली समाकर्ण्य व्याख्यातं विष्णुकिंकरैः । मनसा दुःखमापन्नः पुनः पप्रच्छ नारद ॥३०॥ कथमस्य भवेन्मोक्षः संचितैःपापसंचयैः । तदुपायं वदध्वं मे यूयं हि मम बांधवाः ॥३१॥ सख्यं साप्तपदीनं स्यादित्याहुर्धर्मकोविदाः । सतां साप्तपदी मैत्री सत्सतां त्रिपदी तथा ॥३२॥ सत्सतामपि ये संतस्तेषां मैत्री पदे पदे ॥३३॥ तस्मान्मे बांधवा यूयं मां नेतुं समुपागताः । यतोऽयं मम भ्रातापि मुच्यते तदिहोच्यताम् ॥३४॥ यज्ञमालिवचः श्रुत्वा विष्णुदूता दयालवः । पुनः स्मितमुखाः प्रोचुर्यज्ञमालिहरिप्रियम् ॥३५॥ विष्णुदूता ऊचुः । यज्ञमालिन्महाभाग नारायणपरायण । उपायं तव वक्ष्यामः सुमालिप्रेममुक्तिदम् ॥३६॥ कृतं यत्सुमहत्कर्म त्वया प्राक्तनजन्मनि । प्रवक्ष्यामः समासेन तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥ पुरा त्वं वैश्यजातीयो नाम्ना विश्वंभरः स्मृतः । त्वया कृतानि पापानि महांति्यगणितानि वै ॥३८॥ सुकर्मवासनाहीनो मातापित्रोर्विरोधकृत् । एकदा बंधुभिस्त्यक्तः शोकसंतप्तपीडितः ॥३६॥ क्षुधाग्निनापि संतप्तः प्राप्तवान्हरिमंदिरम् । तदा वृष्टिरभूत्तत्र तत्स्थानं पंकिलं ह्यभूत् ॥४०॥ दूरीकृतस्त्वया पंकस्तत्स्थाने स्थातुमिच्छया । उपलेपनतां प्राप्तं तत्स्थानंविष्णुमंदिरे ॥४१॥ त्वयोषितं तु तद्रात्रौ तस्मिन्देवालये द्विज । दंशितश्चैव सर्पेण प्राप्तं पञ्चत्वमेव च ॥४२॥ तेन पुण्यप्रभावेण उपलेपकृतेन च । विप्रजन्म त्वया प्राप्तं हरिभक्तिस्तथाचला ॥४३॥ महातेजस्वी यज्ञमाली के प्रश्न को सुनकर विष्णुदूतों ने कहा कि, 'यह तुम्हारा पापी भाई दुरात्मा सुमाली है; नारद ! विष्णु दूतों के मुख से 'यज्ञमाली' ऐसा नाम सुनकर उसके मन में अत्यन्त पीड़ा हुई । उसने फिर पूछा ॥२९-३०॥ इसके संचित पापों से इसकी मुक्ति कैसे होगी, इसका उपाय तुम लोग बताओ, तुम लोग अब मेरे बन्धु हो गए । धर्ममर्मज्ञों ने कहा कि सात पग साथ चलने पर सज्जनों की मैत्री हो जाती है, यह साधारण नियम है । जो सज्जन होते हैं उनकी मैत्री साप्तपदी होती है, उनसे भी जो अधिक सज्जन होते हैं उनकी मैत्री तीन डग के साथ ही हो जाती है परन्तु जो सर्वश्रेष्ठ सज्जन हैं उनसे मित्रता एक डग साथ चलने से ही हो जाती है ॥३१।३२॥ इसलिए तुम लोग मेरे बन्धु हो और मुझे ले जाने के लिए आये हो, अतएव जिस प्रकार मेरे भाई का उद्धार हो वही उपाय बतलाओ । यज्ञमाली की बातें सुनकर इन दूतों को भी दया आ गई, फिर मुसकराकर उन्होंने विष्णु-प्रिय यज्ञमाली से कहा॥३३-३५॥ विष्णुदूत बोले--महाभाग ! नारायणपरायण ! यज्ञमालिन् ! हम ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसके द्वारा तुम्हारे भाई को पापों से मुक्ति मिल जायगी । इसके पूर्व तुमने पूर्व जन्म में जो महान् शुभ कर्म किया है, उसको संक्षेप में सुना रहा हूँ, सावधान होकर सुनो--॥३६-३७॥ पहले तुम वैश्य कुल में उत्पन्न हुए थे, विश्वम्भर तुम्हारा नाम था, तुमने अगणित महापाप किए थे, शुभ कर्म के संस्कार सर्वथा तुममें नहीं थे तुम माता-पिता के विरोधी थे । एक दिन जब तुमको तुम्हारे परिवार के लोगों ने घर से निकाल दिया, तब तुम शोक सन्तप्त और भूख-प्यास से व्याकुल हो घूमते-फिरते एक हरिमन्दिर में आए। उसी समय जोरों की वर्षा हुई जिससे यह स्थान कीचड़ से भर गया ॥३८-४०॥ तुमने वहाँ रहने की इच्छा से वहाँ से कीचड़ हटा दिया, जिससे अनायास उस मन्दिर का उपलेपन हो गया । द्विज ! तुम रात भर उस देवा- लय में रहे, अकस्मात् साँप के काटने से तुम्हारी मृत्यु हो गई ॥४१-४२॥ उसी मन्दिर के लीपने के पुण्य-प्रभाव से तुमको इस जन्म में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने का सौभाग्य और हरि-चरणों में एकान्त प्रेम मिला है ॥४३॥ ३०-ना० पु०

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