भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

२३४ नारदीयपुराणम् कल्पकोटिशतं साग्रं संप्राप्य हरिसन्निधिम् । वसाय ज्ञानमासाद्य परं मोक्षं गमिष्यसि ॥४४॥ अनुजं पातकिश्रेष्ठं त्वं समुद्धर्तुमिच्छसि । उपायं तव वक्ष्यामस्तं निबोध महामते ॥४५॥ गोचर्ममात्रभूमेस्तु उपलेपनजं फलम् । दत्वोद्धर महाभाग भ्रातरं कृपयान्वितः ॥४६॥ एवमुक्तो विष्णुदूतैर्यज्ञमाली महामतिः । तत्फलं प्रददौ तस्मै भ्रात्रे पापविमुक्तये ॥४७॥ सुमाली भ्रातृदत्तेन पुण्येन गतकल्मषः । बभूव यमदूतास्तु तं त्यक्त्वा प्रपलायिताः ॥४८॥ विमानं चागतं सद्यः सर्वभोगसमन्वितम् । तदा सुमाली स्वर्यानमारुह्य मुमुदे मुने ॥४९॥ तावुभौ भ्रातरौ विप्र सुरवृन्दनमस्कृतौ । अवापतुर्भृशं प्रीतिं समालिंग्य परस्परम् ॥५०॥ यज्ञमाली सुमाली च स्तूयमानौ महर्षिभिः । गीयमानौ च गंधर्वैर्विष्णुलोकं प्रजग्मतुः ॥५१॥ अवाप्य हरिसालोक्यं सुमाली मुनिसत्तम । यज्ञमाली चोभुतस्तौ कल्पमेकं मुदान्वितौ ॥५२॥ भुक्त्वा भोगान्बहूंस्तत्र यज्ञमाली महामतिः । तत्रैव ज्ञानसंपन्तः परं मोक्षमुपागतः ॥५३॥ सुमाली तु महाभागो विष्णुलोके मुदान्वितः । स्थित्वा भूमिं पुनः प्राप्य विप्रत्वं समुपागतः ॥५४॥ अतिशुद्धे कुले जातो गुणवान्वेदपारगः । सर्वसंपत्समोपेतो हरिभक्तिपरायणः ॥५५॥ व्याहरन्हरिनामानि प्रपेदे जाह्नवीतटम् । तत्र स्नातश्च गंगायां दृष्ट्वा विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥५६॥ अवाप परमं स्थानं योगिनामपि दुर्लभम् । उपलेपनमाहात्म्यं कथितं ते मुनीश्वर ॥५७॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संपूज्यो जगतांपतिः । अकामादपि ये विष्णोः सकृत्पूजां प्रकुर्वते ॥५८॥ न तेषां भवबंधस्तु कदाचिदपि जायते । हरिभक्तिरतान्यस्तु हरिबुद्ध्या समर्चयेत् ॥५६॥ इस समय तो तुम करोड़ों कल्प तक हरि के समीप रहो; पुनः ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष का अधिकार प्राप्त करना । तुम अपने पाप शिरोमणि भाई का उद्धार करना चाहते हो तो महामते ! सुनो, हम उपाय बता रहे हैं ॥४४-४५॥ महाभाग ! तुम अपने पुण्य-पुंज में से गोचर्म के बराबर भूमि के लेपन से जो फल मिलता है उतना ही पुण्य फल देकर कृपा पूर्वक अपने भाई का उद्धार करो ॥४६॥ महामति यज्ञमाली ने विष्णुदूतों की इतनी बातें सुनकर उतना अपना पुण्यफल भ्राता के पापों से उद्धार के लिए उसको दे दिया ॥४७॥ भाई के दिये हुए पुण्य फल को पाकर सुमाली निष्पाप हो गया । यमदूत यह देखकर उसको छोड़कर दूर भाग गये ॥४८॥ तत्काल वहाँ सब उपभोग और प्रसाधन सामग्री से सज्जित देवविमान आया । मुनि ! उस समय उस दिव्य विमान पर चढ़कर सुमाली अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥४९॥ विप्र ! देवों द्वारा आदृत वे दोनों भाई परस्पर गले मिलकर अत्यधिक प्रसन्न हुए ॥५०॥ इस प्रकार वे दोनों भाई विष्णुलोक को चले गये, मार्ग में महर्षियों ने उनकी प्रशंसा की और गन्धर्वों ने अपने मधुर गीत सुनाए ॥५१॥ मुनिवर्य ! हरि-सालोक्य पाकर एक कल्प तक वे यज्ञमाली और सुमाली दोनों भाई बड़े सुख से वहाँ रहे ॥५२॥ वहाँ महामति यज्ञमाली ने विविध भोगों का उपभोग किया और ज्ञान प्राप्त कर पर मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥५३॥ परन्तु महाभाग सुमाली उस लोक में आनन्द पूर्वक रहकर पुनः इस मृत्युलोक में आया और ब्राह्मणकुल में जन्म ग्रहण किया ॥५४॥ उस शुद्ध कुल में जन्म पाकर वह वेदों का पारगामी विद्वान्, गुणी, धनी और हरिभक्त हुआ ॥५५॥ हरिनाम का स्मरण करता हुआ वह जीवन के अन्तिम भाग में गंगा तट पर पहुँचा । वहाँ गंगा में स्नान किया और प्रभु विश्वेश्वर का दर्शन कर उस परम लोक को प्राप्त किया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है ॥५६॥ मुनीश्वर ! देवा- लय के लेपने से जो पुण्य मिलता है उसका माहात्म्य तो कह दिया । इसलिए सब प्रकार से लोकनाथ की पूजा करनी चाहिए । जो अनिच्छा से भी भगवान् की पूजा करता है उसको कभी जन्म-मृत्यु के बन्धन का भय नहीं