बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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२३२ नारदीयपुराणम् भ्रात्रा दत्तं धनं तच्च सुमाली नाशयन्मुने । मद्यपानप्रमत्तश्च गोमांसादीन्यभक्षयत् ॥१४॥ त्यक्तो बंधुजनैः सर्वैश्चांडालस्त्रीसमन्वितः । राज्ञापि बाधितो विप्र प्रपेदे निर्जनं वनम् ॥१५॥ यज्ञमाली सुधीविप्र सदा धर्मरतोऽभवत् । अवारितं ददावन्नं सत्सङ्गतकल्मषः ॥१६॥ पित्रा कृतानि सर्वाणि तडागादीनि सत्तम । अपालयत्प्रयत्नेन सदा धर्मपरायणः ॥१७॥ विश्राणितं धनं सर्वं यज्ञमालेर्महात्मनः । सत्पात्रदाननिष्ठस्य धर्ममार्गप्रवर्तिनः ॥१८॥ अहो सदुपभोगाय सज्जनानां विभूतयः । कल्पवृक्षफलं सर्वममरैरेव भुज्यते ॥१९॥ धनं विश्राण्य धर्मार्थं यज्ञमाली महामतिः । नित्यं विष्णुगृहे सम्यक्परिचर्यापरोऽभवत् ॥२०॥ कालेन गच्छता तौ तु वृद्धभावमुपागतौ । यज्ञमाली सुमाली च ह्येककाले मृतावुभौ ॥२१॥ हरिपूजारतस्यास्य यज्ञमालिमहात्मनः । हरिः संप्रेषयामास विमानं पार्षदैरावृतम् ॥२२॥ दिव्यं विमानमारुह्य यज्ञमाली महामतिः । पूज्यमानः सुरगणैः स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२३॥ गंधर्वैर्गीयमानश्च सेवितश्चाप्सरोगणैः । कामधेन्वा पुष्यमाणश्चित्राभरणभूषितः ॥२४॥ कोमलैस्तुलसीमाल्यैर्भूषितस्तेजसां निधिः । गच्छन्विष्णुपदं दिव्यं मनुजं पथि दृष्टवान् ॥२५॥ ताड्यमानं यमभटैः क्षत्तृड्भ्यां परिपीडितम् । प्रेतभूतं विवस्त्रं च दुःखितं पाशवेष्टितम् । इतस्ततः प्रधावन्तं विलपंतमनाथवत् ॥२६॥ क्रोशन्तं च रुदंतं च दृष्ट्वा मनसि विव्यथे ॥२७॥ यज्ञमालादयायुक्तो विष्णुदूतान्समीपगान् । कोऽयं भटैर्बाध्यमानं इत्यपृच्छत्कृतांजलिः ॥२८॥
मुनिवर ! भाई की दी हुई संपत्ति को भी उस माली ने उड़ाना प्रारम्भ किया । मदिरापान से मतवाला होकर वह गोमांस-भक्षण और चाण्डाल-स्त्री-गमन भी करने लगा । यह देखकर कुटुम्ब के लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया । राज-बाधा या दण्ड के भय से विवश होकर अन्त में उसको वन की शरण लेनी पड़ी ॥१४-१५॥ उसका ज्येष्ठ भाई महामति यज्ञमाली सर्वदा धर्मानुष्ठान में ही लगा रहता था । सदा अन्न दान देने और सत्संगति के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए ॥१६॥ वह धर्मप्रेमी सदा, पिता के बनवाए हुए सारे तड़ाग आदि की भलीभाँति यत्नपूर्वक रक्षा किया करता था ॥१७॥ उसने अपनी सारी संपत्ति महात्माओं, धर्म प्रेमियों और सत्पात्रों को दान कर दी । सच है, सज्जनों की संपत्ति सज्जनों के उपभोग में ही आती है, कल्पवृक्ष का फल सर्वदा देववृन्दों के ही काम आता है ॥१८-१९॥ इस प्रकार महामति यज्ञमाली ने अपना सारा धन धर्मकार्य में ही खर्च कर दिया और नित्य विष्णु मंदिर में परिचर्या करने लगा । कुछ समय बाद दोनों भाई वृद्धावस्था को प्राप्त हुए और दोनों एक ही साथ मृत्यु को प्राप्त हुए ॥२०-२१॥ हरिपूजा में रत महात्मा यज्ञमाली के लिए भगवान् विष्णु ने सेवकों के सहित एक दिव्यविमान उसके निकट भेजा । महामति यज्ञमाली जिसकी देवगण आरा- धना कर रहे थे, मुनिवर स्तुति कर रहे थे, गन्धर्व गुणगान कर रहे थे और अप्सरायें जिसकी सेवा कर रही थीं, कामधेनु जिसको भोग-सामग्री दे रही थी, जो स्वयं विविध आभूषणों से विभूषित, तेजस्वी तथा सुन्दर तुलसी की मालाओं से शोभित था उस विमान पर चढ़कर दिव्य विष्णु लोक को चला गया ॥२२-२५॥ उसने मार्ग में एक मनुष्य को देखा, जो भूख-प्यास से व्याकुल था । यमदूत उसे मार रहे थे । वस्त्र उसके फटे हुए थे । वह प्रेत के समान भयंकर था और पाश में बंधा हुआ था । वह दुःख से कातार होकर अनाथ की भाँति रो रहा था और इधर-उधर दौड़ रहा था ॥२६॥ उसको इस प्रकार रोते-चिल्लाते देखकर यज्ञमाली को अपार मानसिक व्यथा हुई । उसने दयार्द्र हो हाथ जोड़कर साथ चलने वाले विष्णुदूतों से पूछा—'यह कौन है जिसकी दुर्दशा यमदूत कर रहे हैं ? ॥२७-२८॥