भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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अथ ष‌ट्त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच वेदमालेः सुतौ प्रोक्तौ यावुभौ मुनिसत्तम । यज्ञमाली सुमाली च तयोः कर्माधुनोच्यते ॥१॥ तयोराद्यो यज्ञमाली विभेद पितृसंचितम् । धनं द्विधा कनिष्ठस्य भागमेकं ददौ तदा ॥२॥ सुमाली च धनं सर्वं व्यसनाभिरतः सदा । अपात्रानादिभिश्चैव नाशयामास भो द्विज ॥३॥ गीतवाद्यरतो नित्यं मद्यपानरतोऽभवत् । वेश्याविभ्रमलुब्धोऽसौ परदाररतोऽभवत् ॥४॥ सर्वस्मिन्नाशमायाते हिरण्ये पितृसंचिते । अपहृत्य परं द्रव्यं वारस्त्रीनिरतोऽभवत् ॥५॥ दृष्ट्वा सुमालिनः शीलं यज्ञमाली महामतिः । बभूव दुःखितोऽत्यर्थं भ्रातरं चेदमब्रवीत् ॥६॥ अलमत्यंतकष्टेन वृत्तेनास्मात्कुलेऽनुज । त्वमेक एव दुष्टात्मा महापापरतोऽभवः ॥७॥ एवं निवारयंतं तं बहुशो ज्येष्ठसोदरम् । हनिष्यामीति निश्चित्य खड्गहस्तः कचेऽग्रहीत् ॥८॥ ततो महारवो जज्ञे नगरे भृशदारुणः । बबंधुर्नागराश्चैनं कुपितास्ते सुमालिनम् ॥६॥ यज्ञमाली ह्युपेत्यात्मा पौरात्संप्रार्थ्य दुःखितः । बंधनान्मोचयामास भ्रातृस्नेहविमोहितः ॥१०॥ यज्ञमाली पुनश्चापि विभिदे स्वधनं द्विधा । आददे स्वयमर्द्धं च ददावर्द्धं यवीयसे ॥११॥ सुमाली त्वतिमूढात्मा तद्धनं चापि नारद । मूर्खैः पाखंडचंडालैर्बुभुजे च सहोद्धतः ॥१२॥ असतामुपभोगाय दुर्जनानां विभूतयः । पिचुमंदः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते ॥१३॥ अध्याय ३६ यज्ञमाली और सुमाली को उत्तम लोक की प्राप्ति सनक बोले--मुनिश्रेष्ठ ! वेदमालि के जिन यज्ञमाली और सुमाली नामक दो पुत्रों की चर्चा हुई है, अब इन दोनों के कर्मों के विषय में कह रहा हूँ ॥१॥ उन दोनों में से ज्येष्ठ पुत्र यज्ञमाली ने पितृसंचित संपत्ति को दो भागों में बाँट दिया। उनमें से एक भाग कनिष्ठ भ्राता सुमाली को दे दिया ॥२॥ द्विज, सर्वदा व्यसन में ही लगे रहने वाले सुमाली ने अपनी सारी संपत्ति व्यर्थ में लुटा दी । नित्य प्रति वह गाने बजाने में लगा रहता था । मदिरापान में निरत रहता था। वेश्याओं के विलास में फँसने के कारण परस्त्री गमन भी करता था ॥३-४॥ पिता के द्वारा संचित सब धन नष्ट हो जाने पर दूसरों का धन हरण कर वह वेश्यागमन में निरत रहने लगा ॥५॥ सुमाली के इस स्वभाव को देखकर महामति यज्ञमाली अत्यन्त दुःखी हो गया । उसने अपने भाई से कहा- 'हे भाई, इस कुल-विरुद्ध पापाचरण से अपने को रोको। देखो, तुम्हीं एक ऐसे अपने कुल में दुष्ट निकले जो इस प्रकार पापपरायण हो गए ॥६-७॥ ज्येष्ठ सहोदर के इस प्रकार बार बार मना करने पर उसने बड़े भाई को मार डालने का निश्चय कर हाथ में खड्ग लेकर केश पकड़ लिया ॥८॥ यह देखकर नगर में दारुण कोलाहल मच गया। नागरिकों ने कुपित होकर उस दुष्ट को बाँध दिया ॥९॥ भाई के प्रेम से वशीभूत होकर विशुद्ध मति ने नागरिकों को समझा बुझाकर भाई को छुड़ा दिया ॥१०॥ फिर उसने अपनी संपत्ति को दो भागों में बाँटा एक भाग तो स्वयं अपने ले लिया और शेष आधा भाग छोटे भाई को दे दिया ॥११॥ नारद ! मूढात्मा सुमाली ने उस धन को पाकर मूर्ख, पाखंडी और चाण्डालों में उसे उड़ा दिया। क्योंकि दुष्टों की संपत्ति का भोग प्रायः दुर्जन ही करते हैं, जैसे फल से लदे हुए नीम की निबौरी कौओं के ही काम आती है ॥१२-१३॥