बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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२३० | नारदीयपुराणम् ममेति गदितुं यत् तदपि भ्रान्तिरिष्यते । अहंकारो मनोधर्म आत्मनो नहि पंडित ॥६२॥ पुनश्च कोऽहमित्युक्तं वेदमाले त्वया तु यत् । मम जात्यादि शून्यस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६३॥ अनौपम्यस्वभावस्य निर्गुणस्य परमात्मनः । नीरूपस्याप्रमेयस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६४॥ परज्योतिःस्वरूपस्य परिपूर्णव्ययात्मनः । अविच्छिन्नस्वभावस्य कथ्यते च कथं क्रिया ॥६५॥ स्वप्रकाशात्मनो चित्र नित्यस्य परमात्मनः । अनंतस्य क्रिया चैव कथं जन्म च कथ्यते ॥६६॥ ज्ञानैकवेद्यमजरं परं ब्रह्म सनातनम् । परिपूर्णं परानंदं तस्मान्नान्यदिह द्विज ॥६७॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येभ्यो ज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । ज्ञाने त्वनाहते सिद्धे सर्वं ब्रह्ममयं भवेत् ॥६८॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्मुनीश्वर । सुमोद पश्यन्नात्मानमात्मन्येवाच्युतं प्रभुम् ॥६९॥ उपाधिरहितं ब्रह्म स्वप्रकाशं निरंजनम् । अहमेवेति निश्चित्य परां शांतिमवाप्तवान् ॥७०॥ ततश्च व्यवहारार्थं वेदमालिर्मुनीश्वरम् । गुरुं प्रणम्य जानंति सदा ध्यानपरोऽभवत् ॥७१॥ गते बहुतिथे काले वेदमालिर्मुनीश्वर । वाराणसीपुरं प्राप्य परं मोक्षमवाप्तवान् ॥७२॥ य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । स कर्मपाशविच्छेदं प्राप्य सौख्यमवाप्नुयात् ॥७३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे ज्ञाननिरूपणं नाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥३५॥
पंडित ! अहंकार मन का धर्म है आत्मा का नहीं ॥६२॥ वेदमाले ! फिर तुमने जो यह पूछा है कि 'मैं कौन हूँ' तो जाति आदि से शून्य आत्मा का नामकरण मैं कैसे कर सकता हूँ ॥६३॥ अनुपम स्वभाव वाले, निर्गुण, नीरूप, अप्रमेय परात्मा का नाम मैं कैसे बताऊँ ॥६४॥ परज्योतिस्वरूप, परिपूर्ण, अव्ययात्मा, और अविच्छिन्न प्रकृति वाले आत्मा की क्रिया को कैसे बताया जाय ? ॥६५॥ विप्र ! स्वप्रकाशात्मा, नित्य और अनन्त परमात्मा के जन्म कर्म के विषय में कैसे कहा जा सकता है ॥६६॥ द्विज ! ज्ञान के द्वारा ही एक मात्र जानने योग्य, अजर, अमर, परिपूर्ण, परानन्द सनातन ब्रह्म के अतिरिक्त कोई भी पदार्थ इस संसार में नहीं है ॥६७॥ 'तत्त्वमसि' [तुम (आत्मा) वही ब्रह्म हो ] इत्यादि वाक्यों से प्राप्त ज्ञान ही मोक्ष सिद्धि का प्रधान कारण है और इस नित्य ज्ञान के सिद्ध हो जाने पर सारा विश्व ब्रह्ममय दिखाई पड़ता है । मुनीश्वर ! इस प्रकार मुनि के ज्ञानोपदेश से उद्बुद्ध वेदमालि अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसने अपने में ही उपाधिरहित, निर्गुण, निरंजन, स्वप्रकाश ब्रह्म को देखा और 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर उसको अत्यधिक शान्ति मिली ॥६८-७०॥ इसके अनन्तर व्यवहार निर्वाह के लिए गुरु मुनीश्वर को प्रणाम कर वह सदा ध्यानमग्न रहने लगा । मुनीश्वर ! बहुत समय बीत जाने पर वह वेदमाली वाराणसीपुरी में गया जहाँ से उसको पर मोक्ष प्राप्त हो गया । जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता है या सुनता है, वह भी अपने कर्म बन्धन को तोड़कर परम सौख्य (मुक्ति) पाता है ॥७१-७३॥ श्रीनारदीय महापुराण में ज्ञान-निरूपण नामक पैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३५॥