भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 263

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२४४ नारदीयपुराणम् न यस्य रूपं न बलप्रभावो न यस्य कर्माणि न यत्प्रमाणम् जानंति देवा कमलोद्भवादखास्तोष्यास्यहं तं कथमात्मरूपम् ॥३७॥ संसारसिंधौ पतितं कदर्यं मोहाकुलं कामशतेन बद्धम् । अकीर्तिभाजं पिशुनं कृतघ्नं सदाशुचिं पापरतं प्रमन्युम् । ॥३८॥ दयांबुधे पाहि भयाकुलं मां पुनः पुनस्त्वां शरणं प्रपद्ये इति प्रसादितस्तेन दयालुः कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य भगवांस्तेजसां निधिः ॥३६॥ अतसीपुष्पसंकाशं फुल्लपङ्कजलोचनम् । किरीटिनं कुण्डलिनं हारकेयूरभूषितम् ॥४०॥ श्रीवत्सकौस्तुभधरं हेमयज्ञोपवीतिनम् । नासाविन्यस्तमुक्ता भवधर्मानतनुच्छविम् ॥४१॥ पीतांबरधरं देवं वनमालाविभूषितम् । तुलसीकोमलदलैरर्चितांघ्रि महाद्युतिम् ॥४२॥ किंकिणीनू पुराद्यैश्च शोभितं गरुडध्वजम् । दृष्ट्वाऽननाम विप्रेन्द्रो दण्डवत्क्षितिमण्डले ॥४३॥ अभ्यषिञ्चद्धरैः पादावुत्तंको हर्षवारिभिः । मुरारे रक्ष रक्षेति व्याहरन्नान्यधीस्तदा ॥४४॥ तमुत्थाप्य महाविष्णुरालिलिंग दयापरः । वरं वृणुष्व वत्सेति प्रोवाच मुनिपुङ्गवम् ॥४५॥ असाध्यं नास्ति किंचित्ते प्रसन्ने मयि सत्तम । इतीरितं समाकर्ण्य ह्युत्तंकश्चक्रपाणिना । ॥४६॥ पुनः प्रणम्य तं प्राह देवदेवं जनार्दनम् किं मां मोहयसीश त्वं किमन्यैर्देव मे वरैः । त्वयि भक्तिर्दृढा मेऽस्तु जन्मजन्मांतरेष्वपि ॥४७॥ कीटेपु पक्षिषु मृगेषु सरीसृपेषु रक्षःपिशाचमनुषेष्वपि यत्र तत्र जातस्य मे भवतु केशव ते प्रसादात्त्वय्येव भक्तिरचलाव्यभिचारिणी च ॥४८॥ कर्म और प्रमाण का ज्ञान नहीं, जिसको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते उस आत्मरूप की स्तुति कैसे कर सकता हूँ ॥३७॥ हे दयासागर ! इस संसार-सागर में डूबे हुए, मेरे समान कायर, मोहाकुल, अनेकों कामनाओं में फँसे, निन्दित, चुगलखोर, कृतघ्न, अपवित्र, पाप में रत, क्रोधी और भयत्रस्त की आप रक्षा करें और मुझे अपनी शरण में रखें ॥३८॥ महामुनि उत्तंक की इतनी प्रार्थना सुनकर दयालु, तेज निधि भगवान् कमलापति प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुए । उसने अतसी-कुसुम के समान नील वर्ण, खिले कमल के समान नेत्र वाले, किरीट, कुण्डल, केयूर और हार से सुशोभित, श्रीवत्स और कौस्तुभ को धारण किये हुए, सोने का यज्ञोपवीत पहने हुए, नाक में पहने हुए मोती की आभा से बढ़ती हुई शोभा वाले, पीताम्बरधारी भगवान् गरुड़ध्वज को देखा; जो वन- माला, किंकिणी और नूपुर से सुशोभित थे, जिनके युगल चरण तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजित थे, जिनकी देह- कान्ति चारों ओर फैल रही थी । विप्रवर्य ने भगवान् को देखकर पृथिवी पर गिरकर साष्टांग दण्डवत् किया और अपने आनन्द के आंसुओं से उनके चरणों को धो दिया ॥३६-४३१॥ उस समय अनन्य भाव से हे मुरारे ! रक्षा करो, रक्षा करो, यही शब्द उसके मुंह से निकले । दयालु महाविष्णु ने उठाकर उस मुनि को गले लगाया और कहा कि 'वत्स ! वर मांगो ।।४४-४५।। सज्जनवर्य ! मेरे प्रसन्न हो जाने पर तुम्हारे लिए कुछ भी असाध्य नहीं । भगवान् चक्रपाणि की इन बातों को सुनकर उत्तंक ने फिर प्रणाम किया और देव-देव जनार्दन से कहा ॥४६॥ ईश, देव ! तुम मुझको अन्य वरदान का लोभ दिखाकर क्यों मोह में डाल रहे हो ? जन्मजन्मान्तर में भी तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अचला भक्ति बनी रहे ॥४७॥ केशव ! कीट, पक्षी, राक्षस, पिशाच, मृग, सरीसृप, मनुष्य आदि किसी भी योनि में जन्म ग्रहण करूँ, परन्तु तुम्हारी कृपा से तुम में ही मेरी अटल दृढ़ भक्ति बनी