बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशोऽध्यायः २४३ यन्नित्यं परमानन्दं परं ब्रह्म सनातनम् । विष्णुसंज्ञं जगद्धामतमस्मि शरणं गतः ॥२५॥ यं भजन्ति क्रियानिष्ठा यं पश्यन्ति च योगिनः । पूज्यात्पूज्यतरं शांतं गतोऽस्मि शरणं प्रभुम् ॥२६॥ यं न पश्यन्ति विद्वांसो य एतद्व्याप्य तिष्ठति । सर्वस्मादधिकं नित्यं नतोऽस्मि विभुमव्ययम् ॥२७॥ अन्तःकरणसंयोगाज्जीव इत्युच्यते च यः । अविद्याकार्यरहितः परमात्मेति गीयते ॥२८॥ सर्वात्मकं सर्वहेतुं सर्वकर्मफलप्रदम् । वरं वरेण्यमजनं प्रणतोऽस्मि परात्परम् ॥२९॥ सर्वज्ञं सर्वगं शांतं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । ज्ञानात्मकं ज्ञाननिधिं ज्ञानसंस्थं विभुं भजे ॥३०॥ नमाम्यहं वेदनिधिं मुरारिं वेदांतविज्ञानसुनिश्चितार्थम् । सूर्येन्दुवह्नेरोज्ज्वलनेत्रमिन्द्रं खगस्वरूपं श्वपतिस्वरूपम् ॥३१॥ सर्वेश्वरं सर्वगतं महांर्त वेदात्मकं वेदविदां वरिष्ठम् । तं वाङ्मनोऽचिंत्यमनंतशक्तिं ज्ञानैकवेद्यं पुरुषं भजामि ॥३२॥ इन्द्राग्निकालासुरपाशिवायुसोमेशमार्तण्डपुरंदराद्यैः । यः पाति लोकान्परिपूर्णभावस्तमप्रमेयं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ सहस्रशीर्षं च सहस्रपादं सहस्रबाहुं च सहस्रनेत्रम् । समस्तयज्ञैः परिजुष्टमाद्यं नतोऽस्मि तुष्टिप्रदमुग्रवीर्यम् ॥३४॥ कालात्मकं कालविभागहेतुं गुणत्रयातीतमहं गुणज्ञम् । गुणप्रियं कामदमस्तसंगमतीन्द्रियं विश्वभुजं वितृष्णम् ॥३५॥ निरीहमग्र्यं मनसाप्यगम्यं मनोमयं चान्नमय निरूढम् । विज्ञानभेदं प्रतिपन्नकल्पं न वाङ्मयं प्राणमयं भजामि ॥३६॥ अणु से भी अणु, अज, सब उपाधियों से रहित, नित्य परमानन्द, परब्रह्म सनातन विष्णु हैं उनकी शरण में हूँ ॥२५॥ जिसको केवल क्रियानिष्ठ व्यक्ति ही भजते हैं, जिसको योगी जन ही देख पाते हैं, उस परमपूज्य शान्त भगवान् की शरण में हूँ ॥२६॥ जिसको विद्वान् जन भी नहीं देख सकते, जो सर्वव्यापक है, जो सबसे अधिक नित्य, विभु और अव्यय हैं उसको नमस्कार है ॥२७॥ जो अन्तःकरण के संयोग से जीव और अविद्या कार्य से रहित परमात्मा कहा जाता है, जो सर्वात्मक, सबका कारण, सब कर्मफलों को देने वाला, वर, वरेण्य, अजन और पर से पर है उसको नमस्कार है ॥२८-२९॥ सर्वज्ञ, सर्वग, शान्त, सब के अन्तर्यामी, ज्ञानरूप, ज्ञाननिधि और ज्ञानस्थ व्यापक हरि को भजता हूँ ॥३०॥ मैं वेदनिधि, मुरारि, वेदान्त के ज्ञान से निश्चित अर्थ के रूप में प्रतीत होने वाले, सूर्य- चन्द्र रूप नेत्रवाले, इन्द्र, खग स्वरूप, श्वपति स्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वगत, महान्, वेद स्वरूप, वेद ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, वाणी और मन के चिन्तन से परे रहने वाले, अनन्तशक्ति और एकमात्र ज्ञान से ही जानने योग्य को नमस्कार करता हूँ ॥३१-३२॥ जो परिपूर्ण भाव वाले, परमात्मा, इन्द्र, अग्नि, काल, असुर, वरुण, वायु, सोम, सूर्य, पुरन्दर आदि रूपों से विश्व की रक्षा करते हैं, उन अप्रमेय पुरुष की शरण में आया हूँ ॥३३॥ सहस्र शिर, चरण, बाहु और नेत्र वाले, सब यज्ञों के एक मात्र पूजनीय, आदि, तुष्टि देने वाले उग्र पराक्रमी, कालात्मक, काल विभाग के कारण, त्रिगुणातीत, गुणज्ञ, गुणप्रिय, मनोरथदाता, निर्लेप, अतीन्द्रिय, विश्वभोक्ता, तृष्णा रहित, निरीह, श्रेष्ठ, मन से परे, मनोमय, अन्नमय, अत्यन्त रूढ, विज्ञानभेद, जादृत, वाङ्मय से परे और प्राणमय को नमस्कार करता हूँ ॥३४-३६॥ जिसके रूप नहीं, जिसके बल, प्रभाव,