बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ नारदीयपुराणम् यन्मायया मोहितचेतसस्तं पश्यंति नात्मानमपि प्रसिद्धम् । त एव मायारहितास्तदेव पश्यन्ति सर्वात्मकमात्मरूपम् ॥११॥ विभुं ज्योतिरनौपम्यं विष्णुसंज्ञं नमाम्यहम् । समस्तमेतदुद्भूतं यतो यत्र प्रतिष्ठितम् ॥१२॥ यतश्चैतन्यमायातं यद्रूपं तस्य वै नमः । अप्रमेयमनाधारमाधाराधेयरूपकम् ॥१३॥ परमानन्दचिन्मात्रं वासुदेवं नतोऽस्म्यहम् । हृद्गुहानिलयं देवं योगिभिः परिसेवितम् ॥१४॥ योगानामादिभूतं तं नमामि प्रणवस्थितम् । नादात्मकं नादबीजं प्रणवात्मकमव्ययम् ॥१५॥ सद्भावं सच्चिदानन्दं तं वन्दे तिग्मचक्रिणम् । अजरं साक्षिणं त्वस्य ह्यवाङ्मनसगोचरम् ॥१६॥ निरञ्जनमनंताख्यं विष्णुरूपं नतोऽस्म्यहम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ॥१७॥ वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । विद्याविद्यात्मकं प्राहुः परात्परतरं तथा ॥१८॥ अनादिनिधनं शांतं सर्वधातारमच्युतम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१९॥ वरं वरेण्यं वरदं पुराणं सनातनं सर्वगतं समस्तम् । नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयो नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयः ॥२०॥ यत्पादतोयं भवरोगवैद्यो यत्पादपांशुर्विमलत्वसिद्ध्यै । यन्नाम दुष्कर्मनिवारणाय तमप्रमेयं पुरुषं भजामि ॥२१॥ सद्रूपं तमसद्रूपं सदसद्रूपमव्ययम् । तत्तद्विलक्षणं श्रेष्ठं श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतरं भजे ॥२२॥ निरञ्जनं निराकारं पूर्णमाकाशमध्यगम् । परं च विद्याविद्याभ्यां हृदंबुजनिवासिनम् ॥२३॥ स्वप्रकाशमनिर्देश्यं महतां च महत्तरम् । अणोरणीयांसमजं सर्वोपाधिविवर्जितम् ॥२४॥ आत्मा को भी नहीं देख पाते और वे ही मनुष्य जब भगवत्कृपा से मायामुक्त हो जाते हैं तब तत्काल सब प्राणियों में व्याप्त आत्मा के रूप को देखने लगते हैं ॥११॥ व्यापक, ज्योति, अनुपम विष्णु नामक परमात्मा को नमस्कार करता हूँ, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह प्रतिष्ठित है। ॥१२॥ विष्णु के उस रूप को नमस्कार करता हूँ जिससे चैतन्य की प्राप्ति होती है। अप्रमेय, अनाधार, आधाराधेय रूप परानंद चिन्मात्र वासुदेव को नमस्कार है। हृदयरूपी गुहा में रहने वाले, योगियों से पूजित और योगों के एक मात्र आदि आधार, प्रणव में रहने वाले, नादात्मक, नादबीज, प्रणवरूप, अव्यय, सद्भाव, तीक्ष्ण चक्र धारण करने वाले सच्चिदानन्द की वन्दना करता हूँ ॥१३-१५½॥ भगवान् के अजर साक्षी, वाणी और मन की पहुँच से परे रहने वाले, निरंजन, अनन्त नामक विष्णु रूप को नमस्कार करता हूँ। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सत्त्व, तेज, बल, धृति क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) सब वासुदेव के ही रूप हैं और वही विद्याविद्यात्मक परात्परतर है ॥१६-१८॥ जो महात्मा उस अनादि, अनन्त, शान्त, सबके पालक की शरण में जाते हैं उनको अवश्य शाश्वत मुक्ति मिल जाती है ॥१९॥ वर, वरेण्य, वरद, पुराण, सनातन, सर्व व्यापक भगवान् को नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ और बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥२०॥ जिसका चरणोदक संसार की आधियों को नष्ट करने के लिए एक वैद्य है, जिसकी चरणरेणु मानव को निर्मल बुद्धि प्रदान करती है और जिसका नाम दुष्कर्मों के निवारण के लिए समर्थ है उस अप्रमेय पुरुष की वन्दना करता हूँ ॥२१॥ सद्रूप असद्रूप, सदसद्रूप, अव्यय, सदसद्विलक्षण, श्रेष्ठ और श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ को नमस्कार है ॥२२॥ निरंजन, निराकार, पूर्ण आकाश के मध्य विचरण करने वाले, स्वप्रकाश, अनिर्देश्य, महान् से भी महान्,