भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 1008 में से

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः २४१ उत्तंक उवाच नतोऽस्मि नारायणमादिदेवं जगन्निवासं जगदेकबंधुम् । चक्राब्जशाङ्गीसिधरं महांर्त स्मृतार्तिनिघ्नं शरणं प्रपद्ये ॥३॥ यन्नाभिजान्जप्रभवो विधाता सृजत्यमुं लोकसमुच्चयं च । यत्क्रोधजो हंति जगच्च रुद्रस्तमादिदेवं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥४॥ पद्मापतिं पद्मदलायताक्षं विचित्रवीर्यं निखिलैकहेतुम् वेदांतवेद्यं पुरुषं पुराणं तेजोनिधिं विष्णुमहं प्रपन्नः ॥५॥ आत्माक्षरः सर्वगतोऽच्युताख्यो ज्ञानात्मको ज्ञानविदां शरण्यः । ज्ञानैकवेद्यो भगवाननादिः प्रसीदतां व्यष्टिसमष्टिरूपः ॥६॥ अनंतवीर्यो गुणजातिहीनो गुणात्मको ज्ञानविदां वरिष्ठः । नित्यः प्रपन्नार्तिहरः परात्मा दयांबुधिर्मे वरदस्तु भूयात् ॥७॥ यः स्थूलसूक्ष्मादिविशेषभेदैर्जगद्यथावत्स्वकृतं प्रविष्टः । त्वमेव तत्सर्वमनंतसारं त्वत्तः परं नास्ति यतः परात्मन ॥८॥ अगोचरं यत्तव शुद्धरूपं मायाविहीनं गुणजातिहीनम् । निरञ्जनं निर्मलमप्रमेयं पश्यंति सन्तः परमार्थसंज्ञम् ॥६॥ एकेन हेम्नैव विभूषणानि यातानि भेदत्वमुपाधिभेदात् । तथैव सर्वेश्वर एक एव प्रदृश्यते भिन्न इवाखिलात्मा ॥१०॥

उत्तंक बोले — नारायण, आदिदेव, जगन्निवास और जगद्वन्धु को नमस्कार है । चक्र, कमल, धनुष्, और खड्ग को धारण करने वाले और स्मरण मात्र से सब बाधाओं को दूर करने वाले भगवान् की शरण में हूँ ॥३॥ जिसके नाभिकमल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा इस त्रिलोकी की सृष्टि करता है, जिसके क्रोध से उत्पन्न होकर रुद्र सारे संसार को जला देते हैं उस आदिदेव विष्णु को प्रणाम करता हूँ ॥४॥ पद्मापति, पद्मदल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाले, विचित्र प्रभाव और पराक्रम वाले, वेदान्त वेद्य, अखिल लोक के एक मात्र कारण तेजो निधि विष्णु की शरण में आया हूँ॥५॥ समष्टि और व्यष्टि उभय रूपवाले, आत्मा, अक्षर, सर्वव्यापक, अच्युत, ज्ञानरूप, ज्ञानियों के आश्रय तथा केवल ज्ञान से प्राप्त होने योग्य अनादि भगवान् प्रसन्न हो जाइए ॥६॥ अनन्त पराक्रम-शील, गुण जाति हीन, गुण रूप, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, नित्य, भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, परात्मा, दया- सागर आप मुझे वर प्रदान करें ॥७॥ तुम स्थूल, सूक्ष्म आदि अनेक रूपों में जगत् का निर्माण कर पुनः अपनी सृष्टि में प्रवेश कर जाते हो, और तुम्हीं अनन्त तत्त्वों से परिपूर्ण सम्पूर्ण पदार्थ हो । परात्मन् ! तुमसे बढ़कर इस संसार में और कोई पदार्थ नहीं ॥८॥ जो तुम्हारा अगोचर माया, गुण, जाति से हीन शुद्ध रूप है उसी निरंजन, निर्मल, अप्रमेय परमार्थ नामक तुमको सन्त सर्वदा देखते हैं ॥९॥ जिस प्रकार एक ही सुवर्ण से अनेक आभूषण बनते हैं और उपाधि (विशेषण) भेद से उसके अनेक नाम हो जाते हैं उसी प्रकार अखिल पदार्थों में रहने वाला एक ही सर्वेश्वर एक होता हुआ भी अनेक दिखाई पड़ता है ॥१०॥ जिसकी माया से मोहित होकर मनुष्य उस प्रसिद्ध ३१--ना० पु०

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