बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४० नारदीयपुराणम् हरिपादोदकं यस्मान्मयि त्वं सिक्तवान्मुने । प्लावितोऽस्मि त्वया तस्मात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६४॥ त्वयाहं तारितो विप्र पापाद्स्माच्छरीरतः । तस्मान्नतोऽस्मि ते विद्वन्मत्कृतं तत्क्षमस्व च ॥६५॥ इत्युक्त्वा देवकुसुमैर्मुनिश्श्रेष्ठं समाकिरन् । प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा नमस्कारं चकार सः ॥६६॥ ततो विमानमारुह्य सर्वकामसमन्वितम् । अप्सरोगणसंकीर्णः प्रपेदे हरिमंदिरम् ॥६७॥ एतद्दृष्ट्वा विस्मितोऽसौ ह्युत्तंकस्तपसांनिधिः । शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टाव कमलापतिम् ॥६८॥ तेन स्तुतो महाविष्णुर्दत्त्वान्वरमनुत्तमम् । वरेण तेनोत्तंकोऽपि प्रपेदे परमं पदम् ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥
अष्टविंशोऽध्यायः
नारद उवाच किं तत्स्तोत्रं महाभाग कथं तुष्टो जनार्दनः । उत्तंकः पुण्यपुरुषः कीदृशं लब्धवान्वरम् ॥१॥ सनक उवाच उत्तंकस्तु तदा विप्रो हरिध्यानपरायणः । पादोदकस्य माहात्म्यं दृष्ट्वा तुष्टाव भक्तितः ॥२॥
शीघ्र नष्ट हो गये। मुने ! तुमने विष्णु के चरणोदक से मेरा अभिषेक किया है इसलिए तुमने मुझे विष्णु के परम पद में पहुँचा दिया ॥६३-६४॥ विप्र ! तुमने इस पापमय शरीर से मुझको मुक्त कर दिया इसलिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ। विद्वन् ! आप मेरे अपराधों को क्षमा कर दें,। यह कह कर उस गुलिक ने उस मुनिपुंगव को- जिसके ऊपर देव गण पुष्प वृष्टि कर रहे थे, तीन प्रदक्षिणा की और हाथ जोड़कर नमस्कार किया ॥६५-६६॥ इसके अनन्तर सब इष्ट पदार्थों से भरे हुए और अप्सराओं से सुशोभित विमान पर चढ़कर हरिलोक को चला गया ॥६७॥ यह देखकर तपोनिधि उत्तंक को परम विस्मय हुआ। उन्होंने शिर पर अंजलि बाँध कर कमलापति की स्तुति की। उस स्तुति से प्रसन्न होकर उन्होंने उत्तम वर प्रदान किया। उस वर के प्रभाव से वह ऋषि भी अनुपम लोक को चला गया ॥६८-६९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्य-वर्णन नामक सैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३७॥
अध्याय ३८ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन नारद बोले- महाभाग ! वह कौन-सा स्तोत्र है जिससे हरि प्रसन्न हो जाते हैं ? पुण्य पुरुष उत्तंक ने कैसा वर प्राप्त किया ? ॥१॥ सनक बोले- विप्र ! उस समय हरिध्यान-परायण उत्तंक ने पादोदक का माहात्म्य देखकर भक्तिपूर्वक भगवान् की स्तुति की ॥२॥