भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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पृष्ठ 258

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३६ अर्जितं च धनं सर्वं भुंजते बांधवाः सदा। स्वयमेकतमो मूढस्तत्पापफलमश्नुते ॥५१॥ इति ब्रुवाणं तमृषिं विमुच्य भयविह्वलः। गुलिकः प्रांजलिः प्राह क्षमस्वेति पुनः पुनः ॥५२॥ सत्संगस्य प्रभावेण हरिसन्निधिमात्रतः। गतपापो लुब्धकश्च ह्यनुतापेदमब्रवीत् ॥५३॥ मया कृतानि पापानि महांति सुबहूनि च। तानि सर्वाणि नष्टानि विप्रेद्र तव दर्शनात् ॥५४॥ अहोऽहं पापधीर्नित्यं महापापमुपाचरम्। कथं मे निष्कृतिर्भूयो यामि कं शरणं विभोः ॥५५॥ पूर्वजन्मार्जितैः पापैर्लुब्धकत्वमवाप्तवान्। अत्रापि पापजालानि कृत्वा कां गतिमाप्नुयाम् ॥५६॥ अहो ममायुः क्षयमेति शीघ्रं पापान्यनेकानि समर्जितानि। प्रतिक्रिया नैव कृता मयैषां गतिश्च का स्यान्मम जन्म किं वा ॥५७॥ अहो विधिः पापशताकुलं मां किं सृष्टवान्पापतरं च शश्वत्। कथं च यत्पापफलं हि भोक्ष्ये कियत्सु जन्मस्वहमुग्रकर्मा ॥५८॥ एवं विनिन्दन्नात्मानमात्मना लुब्धकस्तदा। अंतस्तापाग्निसंतप्तः सद्यः पंचत्वमागतः ॥५६॥ उत्तंकः पतितं प्रेक्ष्य लुब्धकं तं दयापरः। विष्णुपादोदकेनैवमभ्यषिंचन्महामतिः ॥६०॥ हरिपादोदकस्पर्शात्त्लुब्धको गतकल्मषः। दिव्यं विमानमारुह्य मुनिमेतदथाब्रवीत् ॥६१॥ गुलिक उवाच उत्तंक मुनिशार्दूल गुरुस्त्वं मम सुव्रत। विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातककंचुकात् ॥६२॥ गतस्त्वदुपदेशान्मे संतापो मुनिपुंगव। तथैव सर्वपापानि विनष्टान्यतिवेगतः ॥६३॥ के द्वारा अपने आश्रित जनों का बड़े यत्न से पालन करता है। सदा उसकी कमाई हुई संपत्ति का उसके बन्धु जन उपभोग करते हैं, परन्तु पाप का फल उस मूर्ख को अकेले भोगना पड़ता ॥५०-५१॥ ऋषि के उपर्युक्त उपदेश को सुनकर उस गुलिक व्याधने उस ऋषि को छोड़ दिया और भय-विह्वल हो हाथ जोड़कर बार-बार क्षमा मांगने लगा ॥५२॥ सत्संग और विष्णु सान्निध्य के प्रभाव से वह लुब्धक निष्पाप हो गया, अपने किये पापों का स्मरण कर पछताने लगा। उसने उत्तंक ऋषि से कहा ॥५३॥— विप्रेन्द्र ! मैंने बहुत अधिक महापाप किये हैं परन्तु आपके दर्शन से मेरे वे सब पाप नष्ट हो गये ॥५४॥ आह ! मैं पापात्मा आजतक नित्य महापाप करता रहा, अब मेरा उद्धार कैसे होगा? विभो ! अब किसको शरण में जाऊँ ॥५५॥ पूर्व जन्म के पापों के कारण मुझे व्याध योनि मिली, और इस जन्म में भी मैंने केवल पाप राशि ही कमाई तो अब किस योनि में जाऊँगा ? ॥५६॥ आह ! शीघ्र ही मेरा जीवन भी समाप्त होने वाला है। अब तक अनेक पाप ही कमाये और पापों के लिए कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया। तब मेरी क्या गति होगी और कौन सा जन्म पाऊँगा ॥५७॥ विधि ने सैकड़ों पाप करने वाले मेरे लिए किस शाश्वत पाप योनि को चुना है, जो कुछ मेरे पाप फल हैं उनको भोगने के लिए क्रूर कर्म करने वाले मुझको कितने जन्म ग्रहण करने पड़ेंगे ? ॥५८॥ इस प्रकार स्वयं अपने पापों पर पश्चात्ताप कर ही रहा था कि तत्काल अन्तःकरण के पश्चात्ताप रूपी अग्नि में जलकर वह मर गया ॥५६॥ महामति ऋषि उत्तंक उस व्याध को इस प्रकार भूमि पर गिरते देखकर दयार्द्र हो गये और भगवान् के चरणोदक को उसके ऊपर छिड़क दिया ॥६०॥ भगवान् के चरणोदक के स्पर्श से वह लुब्धक निष्पाप हो गया और दिव्य विमान पर चढ़कर मुनि से बोला ॥६१॥ उत्तंक ! मुनिशार्दूल ! सुव्रत ! तुम मेरे गुरु हो, मुनिपुंगव ! तुम्हारे उपदेश से महापाप के बन्धन से छुटकारा मिला ॥६२॥ मुनिशार्दूल ! तुम्हारे उपदेशों से मेरा संताप दूर हो गया। इसी प्रकार मेरे सब पाप