भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

२३८ नारदीयपुराणम् अहो विधिः सुबलवान्बाधते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते हि दुरात्मना ॥३६॥ अहो निष्कारणं लोके बाधंते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते पिशुनैर्जनैः तत्रापि साधून्बाधंते न समानान्कदाचन ॥३७॥ मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥३८॥ अहो बलवती माया मोहयत्यखिलं जगत् । पुत्रमित्रकलत्रार्थं सर्वं दुःखेन योजयेत् ॥३९॥ परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं त्वया । अंते तत्सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै ॥४०॥ मम माता मम पिता मम भार्या ममात्मजाः । ममेदमिति जंतूनां ममता बाधते वृथा ॥४१॥ यावदर्जयति द्रव्यं बांधवास्तावदेव हि । धर्माधर्मौ सहैवास्तामिहामुत्र न चापरः ॥४२॥ धर्माधर्माजितैर्द्रव्यैः पोषिता येन ये नराः । मृतमग्निमुखे हुत्वा घृतान्नं भुंजते हि ते ॥४३॥ गच्छंतं परलोकं च नरं तु ह्यनुतिष्ठतः । धर्माधर्मा न च धनं न पुत्रा न च बांधवाः ॥४४॥ कामः समृद्धिमायाति नराणां पापकर्मणाम् । कामः संक्षयमायाति नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥४५॥ वृथैव व्याकुला लोका धनादीनां सदार्जने ॥४६॥ यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत् । इति निश्चितबुद्धीनां न चिंता बाधते क्वचित् ॥४७॥ दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माज्जन्म च मृत्युं च दैवं जानाति नापरः ॥४८॥ यत्र कुत्र स्थितस्यापि यद्भाव्यं तद्भवेद् ध्रुवम् । लोकस्तु तत्र विज्ञाय वृथायासं करोति हि ॥४९॥ अहो दुःखं मनुष्याणां ममताकुलचेतसाम् । महापापानि कृत्वापि परिपुष्यंति यत्नतः ॥५०॥ जो कि प्रायः सब सज्जनों को कष्ट देता रहता है, क्यों कि किसी से कुछ भी संबन्ध न रखने वाले को भी दुष्ट पीड़ा पहुँचाते रहते हैं ॥३६॥ आश्चर्य है कि प्रायः संसार में अकारण लोगों को कष्ट दिया जाता है । किसी का कुछ भी न बिगाड़ने वालों को दुष्ट जन व्यर्थ में पीड़ा पहुँचाते रहते हैं । दुष्ट केवल साधुजन को पीड़ित करते हैं, अपने समान दुष्ट का वे कुछ बिगाड़ नहीं पाते ॥३७॥ तृण, जल और केवल सन्तोष पर ही जीवन बिताने वाले मृग, मछली और सज्जनों का ब्याध, मल्लाह और चुगलखोर अकारण बैरी होते होते हैं ॥३८॥ माया भी कितनी प्रबल होती है जो सारे संसार को वश में कर लेती है, जिससे सभी पुत्र मित्र और स्त्री के लिए दुःख उठाते हैं ॥३९॥ तुमने दूसरों का धन चुरा कर स्त्री का पालन किया, परन्तु अन्त में सबको छोड़कर तुमको अकेला ही जाना पड़ेगा ॥४०॥ यह मेरी माता, यह मेरे पिता, यह मेरी स्त्री और ये मेरे पुत्र हैं, ऐसी ममता व्यर्थ में होती है क्योंकि जब तक लोग धन कमाते रहते हैं तभी तक सब भाई-बन्धु हैं । इस लोक और परलोक दोनों में केवल धर्म और अधर्म ही साथ रहते हैं ॥४१-४२॥ धर्म अथवा अधर्म से कमाई हुई संपत्ति से मनुष्य जिनका पोषण करता है वे ही उसके मर जाने पर उसे अग्नि के मुख में डालकर घृतान्न खाते हैं ॥४३॥ परलोक जाते हुए मनुष्य का धर्म और अधर्म ही अनुगमन करते हैं, धन, पुत्र और बान्धव नहीं । पापी मनुष्यों की इच्छायें सदा बढ़ती रहती हैं और पुण्य कर्म करने वाले की इच्छायें स्वयं शान्त हो जाती हैं ॥४४-४५॥ मनुष्य व्यर्थ ही सर्वदा धन कमाने के लिए व्याकुल रहते हैं । जो होने को होगा वह होगा ही और जो नहीं होने को है वह प्रयत्न करने पर भी नहीं होगा । इस प्रकार का विश्वास रखने वालों को चिन्ता कभी नहीं सताती है ॥४६-४७॥ जगत् के सब स्थावर जंगम दैव के ही अधीन हैं । इसलिए जन्म और मृत्यु की केवल दैव ही जानता है दूसरा कोई नहीं ॥४८॥ जहाँ कहीं रहने पर भी मनुष्य को उसके भाग्य की वस्तुयें निश्चय ही मिल जाती हैं । संसार इन बातों को जानकर भी व्यर्थ परिश्रम करता है ॥४९॥ माया से आतुर मनुष्यों की दशा देखकर, दुःख होता है कि मनुष्य महापाप