बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशोऽध्यायः २४५ एवमस्त्विति लोकेशः शङ्खप्रान्तेन संस्पृशन् । दिव्यज्ञानं ददौ तस्मै योगिनामपि दुर्लभम् ॥४६॥ पुनः स्तुवन्तं विप्रेन्द्रं देवदेवो जनार्दनः । इदमाह स्मितमुखो हस्तं तच्छिरसि न्यसन् ॥५०॥ श्रीभगवानुवाच आराध्य क्रियायोगैर्यां सदाद्विजसत्तम । नरनारायणस्थानं व्रज मोक्षं गमिष्यसि ॥५१॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं यः पठेत्सततं नरः । सर्वान्कामानवाप्यांते मोक्षभागी भवेत्ततः ॥५२॥ इत्युक्त्वा माधवो विप्रं तत्रैवांतर्दधे मुने । नरनारायणस्थानमुत्तंकोऽपि ततो ययौ ॥५३॥ तस्माद्भक्तिः सदा कार्या देवदेवस्य चक्रिणः । हरिभक्तिः परा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ॥५४॥ उत्तंको भक्तिभावेन क्रियायोगपरो मुने । पूजयन्माधवं नित्यं नरनारायणाश्रमे ॥५५॥ ज्ञानविज्ञानसंपन्नः संच्छिन्नद्वैतसंशयः । अवाप दुरवापं वै तद्विष्णोः परमं पदम् ॥५६॥ पूजितो नमितो वापि संस्मृतो वापि मोक्षदः । नारायणो जगन्नाथो भक्तानां मानवर्द्धनः ॥५७॥ तस्मान्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥५८॥ यः पठेदिदमाख्यानं शृणुयाद्वा समाहितः । सोऽपि सर्वाघनिर्मुक्तः प्रयाति भवनं हरेः ॥५६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥
रहे ॥४८॥ लोक पति ने शंख से उसको छूते हुए कहा 'ऐसा ही होगा, और योगियों के लिए भी दुर्लभ दिव्य ज्ञान को दिया ॥४६॥ फिर स्तुतिपरायण उस विप्र के शिर पर हाथ फेरते हुए देवदेव जनार्दन ने हँसकर कहा ॥५०॥ द्विजश्रेष्ठ ! कर्मयोग के द्वारा मेरी आराधना करो, नर-नारायण के आश्रम में जाओ, मोक्ष अवश्य पा जाओगे ॥५१॥ जो मनुष्य तुम्हारे इस स्तोत्र का पाठ करेगा; वह सब मनोरथों को प्राप्त कर अन्तकाल में मोक्ष प्राप्त करेगा ॥५२॥ मुने ! यह कह कर माधव वहीं अन्तर्हित हो गये । इसके अनन्तर उत्तंक भी नर-नारायण- आश्रम को गया ॥५३॥ इसलिए देवदेव चक्रधर की भक्ति सदा करनी चाहिए । हरि-भक्ति अत्यन्त उत्कृष्ट और सब फलों को देने वाली है ॥५४॥ मुने ! उत्तंक ने नारायण-आश्रम में जाकर क्रियायोगपरायण होकर भक्ति- पूर्वक माधव की पूजा की, ज्ञान विज्ञान से युक्त हो द्वैत भाव पर विजय प्राप्त की और दुर्लभ विष्णु के दुर्लभ परमपद को प्राप्त किया ॥५५-५६॥ भक्तों के मान बढ़ाने वाले नारायण जगन्नाथ की पूजा, स्तुति, नमस्कार, अथवा स्मरण करने पर अवश्य मोक्ष प्राप्त होता है । इसलिए उभय लोक में सुख की कामना करने वाला व्यक्ति अवश्य अनन्त, अपराजित नारायण की पूजा करे ॥५७-५८॥ जो व्यक्ति इस आख्यान को ध्यानपूर्वक पढ़ता है या सुनता है वह भी सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है ॥५६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३८॥