भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४७ स कदाचिन्महीपालो रेवातीरे मनोरमे । विचित्रकुसुमोपेतं कृतवान्विष्णुमंदिरम् ॥१२॥ स तत्र नृपशार्दूलः सदा संमार्जने रतः । दीपदानपरश्चैव विशेषेण हरिप्रियः ॥१३॥ हरिनामपरो नित्यं हरिसंसक्तमानसः । हरिप्रणामनिरतो हरिभक्तजनप्रियः ॥१४॥ वीतिहोत्र इति ख्यातो ह्यासीत्तस्य पुरोहितः । जयध्वजस्य चरितं दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥१५॥ कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम् । अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तु वेदवेदांगपारगः ॥१६॥ वीतिहोत्र उवाच राजनपरमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण । विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि भरतर्षभ ॥१७॥ संमार्जनपरो नित्यं दीपदानरतस्तथा । तन्मे वद महाभाग किंत्वया विदितं फलम् ॥१८॥ संपादनेन वर्त्तीनां तैलसंपादनेन च । संयुक्तोऽसि सदा भद्र यद्विष्णोर्गृहमार्जने ॥१९॥ कर्माण्यन्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रीतिकराणि च । तथापि किं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥२०॥ सर्वात्मना महापुण्य नरेश विदितं च यत् । तद् ब्रूहि मे गुह्यतमं प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥२१॥ पुरोधसैवमुक्तस्तु प्रहसन्स जयध्वजः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥२२॥ जयध्वज उवाच शृणुष्व विप्रशार्दूल मयैवाचरितं पुरा । जातिस्मरत्वान्जानामि श्रोतृणां विस्मयप्रदम् ॥२३॥ आसीत्पुरा कृतयुगे ब्रह्मन्स्वारोचिषेंऽतरे । रैवतो नाम विप्रेन्द्रो वेदवेदांगपारगः ॥२४॥ अयाज्ययाजकश्चैव सदैव ग्रामयाजकः । पिशुनो निष्ठुरश्चैव ह्यपण्यानां च विक्रयी ॥२५॥ रखता था ॥११॥ किसी समय उसने विचित्र फूलों से सुशोभित नर्मदा के मनोहर तट पर एक विष्णु- मन्दिर बनवाया ॥१२॥ वह हरिभक्त नृपशार्दूल सदा उस देव मन्दिर की सफाई किया करता और भगवान् को दीपक दिखाया करता था ॥१३॥ इस प्रकार वह अपनी साधना से भगवान् का परम प्रिय भक्त हो गया । वह नित्य हरि-नाम का जप करता, हरि का ही ध्यान करता और भगवान् की स्तुति किया करता था ॥१४॥ उस हरिभक्त-प्रेमो राजा का वीतिहोत्र नामक एक पुरोहित था । वह जयध्वज का चरित्र देखकर आश्चर्यचकित था । एक दिन वेद-वेदांग के पारगामी उस पुरोहित ने विष्णु- सेवा में लगे हुए उस राजा से पूछा ॥१५-१६॥ वीतिहोत्र बोले-परमधर्म के ज्ञाता, हरि-भक्ति में निष्ठा रखने वाले हे राजन् ! तुम विष्णु- भक्तों में श्रेष्ठ हो, प्रतिदिन मन्दिर की सफाई में लगे रहते हो और दीपक भी दिखाते हो ॥१७॥ इसलिए इस दीर्घ साधना से क्या फल मिला, यह मुझे बताओ ॥१७-१८॥ भद्र ! तुम सदा बत्तियां बनाने, तेल जुटाने और मन्दिर में झाडू लगाने में लगे रहते हो ॥१९॥ महाभाग ! हरि-सेवा तो और प्रकार से भी की जा सकती है तथापि तुम क्यों इन्हीं कार्यों में सदा लगे रहते हो ॥२०॥ यदि तुम्हारा मेरे प्रति कुछ प्रेम है तो नरेश ! अपने अब तक के अनुभव से जो कुछ अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्य जान पाये हो उसको कहो ॥२१॥ पुरोहित की उपर्युक्त बातों को सुनकर जयध्वज हँस पड़ा और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से बोला ॥२२॥ जयध्वज बोले- प्राचीन काल में मैंने जो कुछ किया है उसको सुनो । जातिस्मर के कारण मैं पूर्व जन्म की उन बातों को जानता हूँ जिनको सुनकर पाठकों को आश्चर्य होगा॥२३॥ ब्रह्मन् ! स्वारोचिष मन्वन्तर में कृतयुग में वेद-वेदांगों का ज्ञाता रैवत नामक एक विप्र था । वह सदा अपात्रों से यज्ञ कराता