बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ नारदीयपुराणम् निषिद्धकर्माचरणात्परित्यक्तः स बन्धुभिः । दरिद्रो दुःखितश्चैव शीर्णाङ्गो व्याधितोऽभवत् ॥२६॥ स कदाचिद्धनार्थं तु पृथिव्यां पर्यटन् द्विजः । ममार नर्मदातीरे श्वासकासप्रपीडितः ॥२७॥ तस्मिन्मृते तस्य भार्या नाम्ना बन्धुमती मुने । कामचारपरा सा तु परित्यक्ता च बन्धुभिः ॥२८॥ तस्यां जातोऽस्मि चण्डालो दण्डकेतुरिति श्रुतः । महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषपरायणः ॥२९॥ परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः । गावश्च विप्रा बहवो निहता मृगपक्षिणः ॥३०॥ मेरुतुल्यसुवर्णानि बहून्यपहृतानि च । मद्यपानरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत् ॥३१॥ पशुपक्षिमृगादीनां जन्तूनामन्तकोपमः । कदाचित्कामसंतप्तो गंतुकामो रतिस्त्रियः ॥३२॥ शून्यं विष्णुगृहं दृष्ट्वा प्रविष्टश्च स्त्रिया सह । निशि रामोपभोगार्थं शयितं तत्र कामिना ॥३३॥ ब्रह्मन्स्ववस्त्रप्रांतेन कियद्देशः प्रमाजितः । यावंत्यः पांशुकणिकास्तत्र संमार्जिता द्विज ॥३४॥ तावज्जन्मकृतं पापं तदैव क्षयमागतम् । प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थं द्विजोत्तम ॥३५॥ तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् । एवं स्थिते विष्णुगृहे ह्यागताः पुरपालकाः ॥३६॥ जारोऽयमिति मां तां च हतवंतः प्रसह्म वै । आवां निहत्य ते सर्वे निवृत्ताः पुररक्षकाः ॥३७॥ यदा तदैव संप्राप्ता विष्णुदूताश्चतुर्भुजाः । किरीटकुंडलधरा वनमालाविभूषिताः ॥३८॥ तैस्तु संप्रेरितावावां विष्णुदूतैरकल्मषैः । दिव्यं विमानमारुह्य सर्वभोगसमन्वितम् ॥३९॥ दिव्यदेहधरौ भूत्वा विष्णूलोकमूपागतौ । तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पशतं साग्रं द्विजोत्तम ॥४०॥ दिव्यभोगसमायुक्तौ तावत्कालं दिवि स्थितौ । ततश्च भूमिभागेषु देवयोगेषु वै क्रमात् ॥४१॥ निषिद्ध वस्तुओं को बेचता तथा ग्राम याजक का कार्य करता था, वह बहुत बड़ा चुगलखोर और क्रूर था ॥२४-२५॥ निषिद्ध आचरण से उसके भाइयों ने उसको निकाल दिया जिससे थोड़ी ही दिनों में वह दरिद्र, दुःखी और रोगग्रस्त हो गया । उसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गईं ॥२६॥ किसी समय वह धन की खोज में इधर-उधर भटकता हुआ नर्मदा तट पर पहुँचा । वहाँ दमे से पीड़ित होकर मर गया ॥२७॥ मुने ! उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्त्री बन्धुमती भी स्वेच्छा- चारिणी हो गई जिससे तंग आकर परिवार वालों ने उसको भी घर से निकाल दिया ॥२८॥ उसी के गर्भ से चाण्डाल- कुल में दण्डकेतु नाम से मैं उत्पन्न हुआ । चाण्डाल होकर मैं सदा महापाप करता और ब्राह्मणों से द्वेष करता था ॥२९॥ परायी स्त्रियों और पराये धन का लोलुप रहता और जीवहिंसा करता था । मैंने बहुत से ब्राह्मणों, गायों, मृगों, और पक्षियों का वध किया । सुमेरु के समान बहुत से स्वर्ण का अपहरण किया । नित्य प्रति मदिरा पीना, लोगों के मार्ग में अनेक प्रकार से बाधा उपस्थित करना मेरा काम था ॥३०-३१॥ पशु-पक्षी और जीवों के लिए तो यमराज के समान था । एक दिन काम से सन्तप्त होकर भोग की इच्छा से पुंश्चली स्त्री के निकट गया ॥३२॥ एक शून्य विष्णु मन्दिर को देखकर स्त्री के साथ उस मन्दिर में घुस गया । रात में कामान्ध मैं स्त्री से भोग करने के लिए उसी मन्दिर में सोया ॥३३॥ ब्रह्मन् ! अपने वस्त्र के छोर से थोड़ी सी भूमि झाड़ दी । द्विज ! जितने धूलिकण (मैंने झाडू या सफाई करते समय जितने धूलिकण) हटाये उसी समय तत्काल उतने जन्म के पाप नष्ट हो गए । द्विजवर्य ! रतिकाल में जो सुरत-दीप जलाया उस से भी मेरे शेष पाप भी नष्ट हो गए ॥३४-३५॥ ऐसा करने के बाद वहाँ नगर-रक्षक घूमते हुए आए । मुझको जार समझ कर उन लोगों ने मुझको और मेरी जार पत्नी को हठात् मार डाला । हम दोनों को मार कर जब वे पुररक्षक चले गए, तब तत्काल चार भुजा-वाले, किरीट, कुण्डल और वनमाला से सुशोभित विष्णु के दूत आए ॥३६-३८॥ उन निष्पाप विष्णुदूतों की प्रेरणा से सब भोग-सामग्रियों से सुसज्जित दिव्य विमान पर चढ़कर हम दोनों देवरूप होकर विष्णु लोक को गए ॥३९॥ वहाँ पर सौ कल्प तक रह कर दिव्य भोगों को भोगते हुए उतने ही समय तक देवलोक में रहे । इसके बाद क्रमशः देवोपयुक्त लोकों में सुख भोगकर उसी पुण्य के प्रभाव से पुनः यदुवंश में जन्म हुआ । उसी पुण्य