भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४६ तेन पुण्यप्रभावेण यदूनां वंशसंभवः । तेनैवैतन्मेऽच्युता संपत्तथा राज्यमकंटकम् ॥४२॥ ब्रह्मन्कृत्त्वोपभोगार्थमेव श्रेयो ह्यवाप्तवान् । भक्त्या कुर्वंति ये संतस्तेषां पुण्यं न वेद्म्यहम् ॥४३॥ तस्मात्संमार्जने नित्यं दीपदाने च सत्तम । यतिष्ये परया भक्त्या ह्यहं जातिस्मरो यतः ॥४४॥ यः पूजयेज्जगन्नाथमेकाकी विगतस्पृहः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥४५॥ अवशेनापि यत्कर्म कृतवेमां श्रियमागतः । भक्तिमद्भिः प्रशांतैश्च किं पुनः सम्यगर्च॑नात् ॥४६॥ इति भूपवचः श्रुत्वा वीतिहोत्रो द्विजोत्तमः । अनंततुष्टिमापन्नो हरिपूजापरोऽभवत् ॥४७॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र देवो नारायणोऽव्ययः । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पुजकानां विमुक्तिदः ॥४८॥ अनित्या बांधवाः सर्वे विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४९॥ अज्ञो लोको वृथा गर्वं करिष्यति महोद्धतः । कायः संनिहितापायो धनादीनां किमुच्यते ॥५०॥ जन्मकोटिसहस्रेषु पुण्यं यैः समुपार्जितम् । तेषां भक्तिर्भवेच्छुद्धा देवदेवे जनार्दने ॥५१॥ सुलभं जाह्नवीस्नानं तथैवातिथिपूजनम् । सुलभाः सर्वयज्ञाश्च विष्णुभक्तिः सुदुर्लभा ॥५२॥ दुर्लभा तुलसीसेवा दुर्लभः संगमः सताम् । सर्वभूतदया वापि सुलभा यस्य कस्यचित् ॥५३॥ सत्संगस्तुलसीसेवा हरिभक्तिश्च दुर्लभा । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं न तथा गमयेद् बुधः ॥५४॥ अर्चयेद्धि जगन्नाथं सारमेतद्विजोत्तम ॥५५॥ तत्तुं यदीच्छति जनो दुस्तरं भवसागरम् । हरिभक्तिपरो भूयादेतदेव रसायनम् ॥५६॥

के प्रभाव से मुझे यह सम्पत्ति और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ ॥४०-४२॥ ब्रह्मन् ! इतनी सुख-सामग्री के साथ श्रेयःप्राप्ति उसी पुण्य के प्रभाव से हुई है। जो भक्त भक्तिपूर्वक भगवान् की उपासना करते हैं उनके पुण्य को मैं नहीं जानता ॥४३॥ इसलिए मैं नित्यप्रति मंदिर के संमार्जन और दीप-दर्शन में परम निष्ठा के साथ लगा रहता हूँ क्योंकि मुझे पूर्वजन्म की बातों का ज्ञान है ॥४४॥ जो एकान्त भाव से निःस्पृह होकर जगन्नाथ की पूजा करता है वह सब पापों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त करता है ॥४५॥ जब इच्छा के बिना भी भगवदर्चन करने से इस प्रकार की श्री प्राप्त होती है तो भक्ति पूर्वक शान्त भाव से भगवान् की अर्चना करने से कितना पुण्य होगा, उसके विषय में क्या कहा जाय ॥४६॥ राजा की इतनी बातें सुनकर द्विजोत्तम वीतिहोत्र अत्यन्त प्रसन्न हो गया और भगवदाराधना में लग गया ॥४७॥ विप्रेन्द्र ! सुनो, कहने का सार यह है कि भगवान् नारायण जान-बूझकर या अनजाने किसी प्रकार से भी पूजा करने पर अपने भक्तों को अवश्य मुक्ति प्रदान करते हैं ॥४८॥ सारे बंधुबांधव अनित्य हैं, ऐश्वर्य भी नित्य नहीं, तिस पर मृत्यु सदा शिर पर सवार रहती है, ऐसी अवस्था में धर्मसंग्रह अवश्य करना चाहिए ॥४९॥ व्यर्थ ही मूर्ख लोग मदमत्त होकर गर्व करते हैं। जब शरीर ही क्षण-भंगुर और बाधाओं से पूर्ण है, तब धन-ऐश्वर्य के विषय में निश्चित रूप से क्या कहा जा सकता है ॥५०॥ जो हजार करोड़ जन्मों तक पुण्य संचय करते हैं उनकी देव-देव जनार्दन में शुद्ध भक्ति होती है ॥५१॥ गंगास्नान सुलभ है, अतिथि पूजन भी सुलभ है, सब यज्ञ भी सुलभ हैं, परन्तु हरिभक्ति अत्यन्त दुर्लभ है ॥५२॥ तुलसी की सेवा दुर्लभ है, सत्संगति भी दुर्लभ ही है और सब प्राणियों पर दया करना भी जिस किसी के लिए सुलभ नहीं है ॥५३॥ जब तुलसी-सेवा, हरि-भक्ति और सत्संग दुर्लभ है तब विद्वान् का यह कर्त्तव्य है कि दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसको व्यर्थ न गँवायें । द्विजोत्तम ! सब का सार यह है कि यदि मनुष्य इस दुस्तर भवसागर को पार करना चाहता है तो वह अवश्य भगवान् की पूजा करे । मनुष्य हरिभक्तिपरायण हो, यही एक रसायन है ॥५४-५६॥ भाई ! गोविन्द

३२ ना० पु०