बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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२५० नारदीयपुराणम्
भ्रातराश्रय गोविन्दं मां विलं वं कुरु प्रिय । आसन्नमेव नगरं कृतांतस्य हि दृश्यते ॥५७॥ नारायणं जगद्योनिं सर्वकारणकारणम् । समर्च्चयस्व विप्रेन्द्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥५८॥ सर्वाधारं सर्वयोनिं सर्वान्तर्यामिणं विभुम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्ते कृतार्था न संशयः ॥५६॥ ते वंद्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्कार्या विशेषतः । येऽर्चयंति महाविष्णुं प्रणतार्तिप्रणाशनम् ॥६०॥ ये विष्णुभक्ता निष्कामा यजन्ति परमेश्वरम् । त्रिःसप्तकुलसंयुक्तास्ते यांति हरिमंदिरम् ॥६१॥ विष्णुभक्ताय यो दद्यान्निष्कामाय महात्मने । पानीयं वा फलं वापि स एव भगवत्प्रियः ॥६२॥ विष्णुभक्तिपराणां तु शुश्रूषां कुर्वते तु ये । ते यांति विष्णुभुवनं यावदाभूतसंप्लवम् ॥६३॥ ये यजंति स्पृहाशून्या हरिभक्तान् हरिं तथा । त एव भुवनं सर्वं पुनंति स्वांघ्रिपांशुना ॥६४॥ देवपूजापरो यस्य गृहे वसति सर्वदा । तत्रैव सर्वदेवाश्च तिष्ठन्ति श्रीहरिस्तथा ॥६५॥ पूज्यमाना च तुलसी यस्य तिष्ठति वेश्मनि । तत्र सर्वाणि श्रेयांसि वर्द्धन्त्यहरहर्द्विज ॥६६॥ शालग्रामशिलारूपी यत्र तिष्ठति केशवः । न बाधंते ग्रहास्तत्र भूतवेतालकादयः ॥६७॥ शालग्रामशिला यत्र तत्तीर्थं तत्तपोवनम् । यतः संनिहितस्तत्र भगवान्मधुसूदनः ॥६८॥ यद्गृहे नास्ति देवर्षे शालग्रामशिलार्चनम् । श्मशानसदृशं विद्यात्तद् गृहं शुभवजितम् ॥६६॥ पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राणि च द्विज । सांगा वेदास्तथा सर्वे विष्णोरूपं प्रकीर्तितम् ॥७०॥ भक्त्या कुर्वन्ति ये विष्णोः प्रदक्षिणचतुष्टयम् । तेऽपि यांति परं स्थानं सर्वकर्मनिवर्हणम् ॥७१॥ इति बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥३६॥
की शरण में जाओ, विलम्ब मत करो। प्रिय ! देखो, यमराज का नगर सामने समीप ही दिखाई दे रहा है (मृत्यु समीप है) ॥५७॥ इसलिए यदि मुक्ति चाहते हो तो जगत् के आदि कारण, सब कारणों के कारण नारायण की अर्चना करो ॥५८॥ सर्वाधार, सर्वयोनि, सब के अन्तर की बात जानने वाले, विभु की शरण में जो जाते हैं उनका जन्म सफल है, वे महात्मा हैं इसमें संशय नहीं है ॥५६॥ वे वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं और विशेष रूप से नमस्कार के योग्य हैं। जो भक्त जनों के कष्ट को दूर करने वाले महाविष्णु की पूजा करते हैं, जो विष्णुभक्त निष्काम भाव से परमेश्वर की सेवा करते हैं वे अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु लोक को जाते हैं ॥६०-६१॥ जो निष्काम महात्मा विष्णु भक्त को जल और फल देते हैं वे ही भगवान् के प्रिय पात्र हैं ॥६२॥ जो विष्णुभक्ति में लीन रहने वाले भक्तों की शुश्रूषा करते हैं वे कल्पान्त तक विष्णुलोक में निवास करते हैं ॥६३॥ जो निःस्पृह होकर हरि भक्तों और हरि की सेवा करते हैं वे ही अपनी चरणरेणु से समस्त भुवन को पवित्र करते हैं ॥६४॥ जिसके घर में एक भी सदा देव-पूजा-परायण व्यक्ति रहता है, उस घर में ही स्वयं भगवान्, लक्ष्मी और सब देवता सदा निवास करते हैं ॥६५॥ जिसके घर तुलसी की नित्यप्रति पूजा होती है, द्विज, उसके घर नित्य प्रति सब श्रेय बढ़ते रहते हैं ॥६६॥ जहाँ विष्णु शालग्राम शिला के रूप में रहते हैं, वहाँ ग्रहों से कोई कष्ट नहीं होता और न तो भूत-वेताल ही कोई बाधा पहुँचा सकते हैं ॥६७॥ जहाँ शालग्रामशिला रहती है वह स्थान तीर्थ है, तपोवन है, क्योंकि वहाँ भगवान् मधुसूदन सदा सन्निहित रहते हैं ॥६८॥ देवर्षि- नारद ! जिस घर में शालग्राम का पूजन नहीं होता उस घर को अमंगलमय श्मशान समझना चाहिए ॥६९॥ द्विज ! पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और सब सांगोपांग वेद ये विष्णु के ही रूप हैं ॥७०॥ जो भक्ति पूर्वक विष्णु की चार बार प्रदक्षिणा करते हैं, वे भी सब कामों से मुक्त करने वाले उत्तम स्थान को जाते हैं ॥७१॥ श्री नारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥