बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१६ अणोरणीयान्महतो महीयान्सनातनारमाखिलविश्वहेतुः । पश्यन्ति यज्ज्ञानविदां वरिष्ठाः परात्परस्मात्परमं पवित्रम् ॥१४८॥ अकारादिक्षकारांतवर्णभेदव्यवस्थितः । पुराणपुरुषोऽनादिः शब्दब्रह्मेति गीयते ॥१५०॥ विशुद्धमक्षरं नित्यं पूर्णमाकाशमध्यगम् । आनन्दं निर्मलं शांतं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५१॥ योगिनो हृदि पश्यन्ति परात्मानं सनातनम् । अविकारमजं शुद्धं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५२॥ ध्यानमन्यत्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनि सत्तम । संसारतापतप्तानां सुधावृष्टिसमं नृणाम् ॥१५३॥ नारायणं परानन्दं स्मरेत्प्रणवसंस्थितम् । नादरूपमनौपम्यमर्द्ध मात्रोपरिस्थितम् ॥१५४॥ अकारं ब्रह्मणो रूपमुकारं विष्णुरूपवत् । मकारं रुद्ररूपं स्यादर्द्धमात्रं परात्मकम् ॥१५५॥ मात्रास्तिस्रः समाख्याता ब्रह्मविष्णुशिवाधिपाः । तेषां समुच्चयं विप्र परब्रह्मप्रबोधकम् ॥१५६॥ वाच्यं तु परमं ब्रह्म वाचकः प्रणवः स्मृतः । वाच्यवाचकसंबन्धो ह्युपचारात्तयोर्द्विज ॥१५७॥ जपन्तः प्रणवं नित्यं मुच्यन्ते सर्वपातकैः । तदभ्यासेन संयुक्ताः परं मोक्षं लभन्ति च ॥१५८॥ जपंश्च प्रणवं मन्त्रं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । कोटिसूर्यसमं तेजो ध्यायेदात्मनि निर्मलम् ॥१५९॥ शालग्रामशिलारूपं प्रतिमारूपमेव वा । यद्यत्पापहरं वस्तुतत्तद्वा चिन्तयेद्धृदि ॥१६०॥ यदेतद्वैष्णवं ज्ञानं कथितं ते मुनीश्वर । एतद्विदित्वा योगीन्द्रो लभते मोक्षमुत्तमम् ॥१६१॥ यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वापि समाहितः । स सर्वपापनिर्मुक्तो हरिसालोक्यमाप्नुयात् ॥१६२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे योगनिरूपणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥ है ॥१४८॥ वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम और महान् से भी महत्तर है। सनातनात्मा और अखिलविश्व का एक मात्र कारण है, जिसको तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ महात्मा परात्पर से भी परम पवित्र समझते हैं ॥१४९॥ वह पुराण पुरुष अनादि है और अकार के लेकर क्षकार तक वर्ण भेद के रूप में व्यवस्थित रह कर शब्द ब्रह्म के नाम से वर्णित होता है ॥१५०॥ उसको विशुद्ध, अक्षर, नित्य, पूर्ण, आकाशमध्यगामी, आनन्दमय, निर्मल, शान्त और परब्रह्म कहते हैं ॥१५१॥ उस परात्मा सनातन को योगी जन अपने हृदय में देखते हैं और उस पर ब्रह्म को अविकार, अज और शुद्ध कहते हैं ॥१५२॥ मुनिवर्य ! अब मैं दूसरे प्रकार के ध्यान को कह रहा हूँ सुनो, जो इस संसार की ज्वाला में दग्ध मानवों के लिए अमृत वर्षा के समान है ॥१५३॥ परानन्द नारायण की अनुपम नाद रूप में, अर्द्ध मात्रा के ऊपर स्थित तथा प्रणव में स्थित रूप में स्मरण करना चाहिए ॥१५४॥ अकार ब्रह्मा का रूप है, उकार विष्णु का, मकार रुद्र का और अर्द्धमात्रा परब्रह्म का रूप है। ये तीनों मात्रायें ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवता वाली कही जाती हैं। विप्र ! इन तीनों का समुच्चय पर ब्रह्म का वाचक है ॥१५५-१५६॥ परब्रह्म वाच्य (अर्थ) और प्रणव वाचक (शब्द) है। द्विज ! उनका यह वाच्य-वाचक संबन्ध केवल उपचार (आरोपित) मात्र है। वस्तुतः इन दोनों में अभेद संबन्ध है। नित्य प्रति प्रणव का जप करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और प्रणव साधना में लीन रहने वाले तो पर मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥१५७-१५८॥ ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक प्रणव मंत्र का जप करते समय कोटि सूर्य के समान प्रभावशाली तेज पुंज का ध्यान करना चाहिए। शालिग्राम शिला रूप, अथवा प्रतिमारूप अथवा जो जो पापों को दूर करने वाली वस्तुएँ हैं उनका हृदय में ध्यान करना चाहिए ॥१५९-१६०॥ मुनीश्वर ! यह जो वैष्णव ज्ञान तुमसे मैंने कहा है, इसको जानकर योगीन्द्र उत्तम मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो व्यक्ति एकाग्र होकर इस ज्ञान को सुनता है या स्वयं पढ़ता है, वह अपने सब पापों से मुक्त होकर हरि-सालोक्य मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१६१-१६२॥ श्रीनारदीयमहापुराण में योग निरूपण नामक तैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३३॥