बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ नारदीयपुराणम् सर्वविश्वात्मकं विष्णुं सर्वलोकैककारणम् । विकसत्पद्मपत्राक्षं चारुकुण्डलभूषितम् ॥१३४॥ दीर्घबाहुमुदाराङ्गं सर्वालङ्कारभूषितम् । पीताम्बरधरं देवं हेमयज्ञोपवीतिनम् ॥१३५॥ बिभ्रतं तुलसीमालां कौस्तुभेन विराजितम् । श्रीवत्सवक्षसं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥१३६॥ अष्टारे हृत्सरोजे तु द्वादशांगुलविस्तृते । ध्यायेदात्मानमव्यक्तं परात्परतरं विभुम् ॥१३७॥ ध्यानं सद्भिर्निगदितं प्रत्ययस्यैकतानता । ध्यानं कृत्वा मुहूर्त्तं वा परं मोक्षं लभेन्नरः ॥१३८॥ ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विंदति । ध्यानात्प्रसीदति हरिर्द्ध्यानात्सर्वार्थसाधनम् ॥१३६॥ यद्यद्रूपं महाविष्णोस्तत्तद्ध्यायेत्समाहितम् । तेन ध्यानेन तुष्टात्मा हरिर्मोक्षं ददाति वै ॥१४०॥ अचञ्चलं मनः कुर्याद्ध्येयवस्तुनि सत्तम । ध्यानं ध्येयं ध्यातृभावं यथा नश्यति निर्भरम् ॥१४१॥ ततोऽमृतत्वं भवति ज्ञानामृतनिषेवणात् । भवेन्निरन्तरं ध्यानादभेदप्रतिपादनम् ॥१४२॥ सुषुप्तिवत्परानन्दयुक्तश्चोपरतेन्द्रियः । निर्वातदीपवत्संस्थः समाधिरभिधीयते ॥१४३॥ योगी समाध्यवस्थायां न शृणोति न पश्यति । न जिघ्रति न स्पृशति न किंचद्वक्ति सत्तम ॥१४४॥ आत्मा तु निर्मलः शुद्धः सच्चिदानन्दविग्रहः । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो योगिनां भात्यचञ्चलः ॥१४५॥ निर्गुणोऽपि परो देवो ह्यज्ञानाद्गुणवानिव । विभात्यज्ञाननाशे तु यथापूर्वं व्यवस्थितम् ॥१४६॥ परं ज्योतिरमेयात्मा मायावानिव मायिनाम् । तन्नाशे निर्मलं ब्रह्म प्रकाशयति पंडित ॥१४७॥ एकमेवाद्वितीयं च परं ज्योतिर्निरंजनम् । सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामितया स्थितम् ॥१४८॥ वाले, मनोहर कुण्डलों से विभूषित, दीर्घ भुजा वाले, उदार अंगों वाले, सब अलंकारों से अलंकृत, पीताम्बर- धारी सुवर्ण का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, तुलसी माला को धारण किए हुए कौस्तुभमणि और श्रीवत्स से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, सुर और असुरों से पूजित, अव्यक्त, परात्पर विभु विष्णु का बारह अंगुल विस्तृत और आठ पंखुड़ियों वाले हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिए ॥१३३-१३७॥ सज्जनों ने प्रत्यय की एकतानता (ईश्वर में एकनिष्ठ हो जाने के भाव) को ही ध्यान कहा है। मनुष्य क्षण भर के ध्यान से भी पर मोक्ष को पा जाता है ॥१३८॥ ध्यान से पाप नष्ट होते और ध्यान से ही मोक्ष मिलता है । ध्यान से भगवान् प्रसन्न होते और ध्यान से सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं । महाविष्णु के जो जो रूप हैं उन उन रूपों को एकाग्र होकर ध्यान करना चाहिए । हरि इस प्रकार के ध्यान से प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करते हैं ॥१३६-१४०॥ मुनिवर्य ! ध्येय वस्तु में अपने मन को स्थिर करना चाहिए । जब ध्यान, ध्येय और ध्यातृ-भाव का सर्वथा नाश हो जाता है तब उसके बाद ज्ञान रूपी अमृत के निरन्तर पान करने से अमृतत्व की प्राप्ति होती है । निरन्तर ध्यान से अभेद ज्ञान होता है ॥१४१-१४२॥ जब मनुष्य सुषुप्ति अवस्था के समान परानन्द युक्त हो इन्द्रिय व्यापारों से स्वतः विमुख हो जाता है और उसका मन निर्वात दीप के समान स्थिर हो जाता है तो उसकी उस अवस्था को समाधि कहते है ॥१४३॥ योगी समाधि अवस्था में कुछ भी सुनता नहीं है, देखता और सूंघता भी नहीं है, उसे स्पर्श ज्ञान भी नहीं रह जाता और न तो कुछ बोलता ही है । योगियों का अन्तः करण निर्मल और शुद्ध रहता है वे स्वयं सच्चिदानन्द स्वरूप और सर्वोपाधि से मुक्त हो पर्वत की भाँति अचल रहते हैं ॥१४४-१४५॥ अज्ञानावस्था में पर देव निर्गुण होता हुआ भी गुणवान् के समान जान पड़ता है । वही अज्ञान नष्ट हो जाने पर अपने पूर्व रूप में ही दिखाई पड़ने लगता है ॥१४६॥ पंडित ! मायाबद्ध जीवों को अमेयात्मा परज्योति माया- बद्ध सा जान पड़ता है और वही मायामुक्त हो जाने पर निर्गुण पर ब्रह्म के रूप में दिखलाई पड़ने लगता है ॥१४७॥ परब्रह्म एक, अद्वितीय, परज्योति और निरंजन स्वरूप है जो कि सब प्राणियों का अन्तर्यामी