भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

त्रयस्त्रिंंशोऽध्यायः २१७ अगर्भश्च सगर्भश्च द्वितीयस्तु तयोर्वरः। जपध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वितः ॥११६॥ रेचकः पूरकश्चैव कुंभकः शून्यकस्तथा। एवं चतुर्विधः प्रोक्तः प्राणायामो मनीषिभिः ॥१२०॥ जंतूनां दक्षिणा नाडी पिंगला परिकीर्तिता। सूर्यदेवतका चैव पितृयोनिरिति श्रुता ॥१२१॥ देवयोनिरिति ख्याता इडा नाडी त्वदक्षिणा। तत्राधिदैवतं चंद्रं जानीहि मुनिसत्तम ॥१२२॥ एतयोरुभयोर्मध्ये सुषुम्णा नाडिका स्मृता। अतिसूक्ष्मा गुह्यतमा ज्ञेया सा ब्रह्मदैवता ॥१२३॥ वामेन रेचयेद्वायुं रेचनाद्रेचकः स्मृतः। पूरयेद्दक्षिणेनैव पूरणात्पूरकः स्मृता ॥१२४॥ स्वदेहपूरितं वायुं निगृह्य न विमुंचति। संपूर्णकुं भवत्तिष्ठेत्कुम्भकः स हि विश्रुतः ॥१२५॥ न गृह्णाति न त्यजति वायुमंतर्बहिःस्थितम्। विद्धि तच्छून्यकं नाम प्राणायामं यथास्थितम् ॥१२६॥ शनैःशनैर्विजेतव्यः प्राणो मत्तगजेन्द्रवत्। अन्यथा खलु जायन्ते महारोगा भयंकराः ॥१२७॥ क्रमेण योजयेद्वायुं योगी विगतकल्मषः। स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणः पदमाप्नुयात् ॥१२८॥ विषयेषु प्रसक्तानि चेन्द्रियाणि मुनीश्वरः। समाहृत्य निगृह्णाति प्रत्याहारस्तु स स्मृतः ॥१२६॥ जितेन्द्रिया महात्मानो ध्यानशून्या अपि द्विज। प्रयान्ति परमं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१३०॥ अनिजितेन्द्रियग्रामं यस्तु ध्यानपरो भवेत्। मूढात्मानं च तं विद्याद्ध्यानं चास्य न सिध्यति ॥१३१॥ यद्यत्पश्यति तत्सर्वं पश्येदात्मवदात्मनि। प्रत्याहृतानीन्द्रियाणि धारयेत्सा तु धारणा ॥१३२॥ योगाज्जितेन्द्रियग्रामस्तानि हृत्वा दृढं हृदि। आत्मानं परमं ध्यायेत्सर्वधातारमच्युतम् ॥१३३॥ दूसरा श्रेष्ठ है। जप-ध्यान के बिना किया हुआ प्राणायाम अगर्भ और जप के सहित सगर्भ है ॥११८-११६॥ मनीषियों ने प्राणायाम के रेचक, पूरक, कुंभक और शून्यक ये चार भेद बताये हैं ॥१२०॥ जीवों की दक्षिणनाड़ी पिंगला कही गई है। सूर्य इसका देवता और पितर योनि है। मुनिसत्तम ! वामनाड़ी इड़ा नाम से प्रसिद्ध है। चन्द्रमा इसका देवता और देव योनि है ॥१२१-१२२॥ इन दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी है। यह अति सूक्ष्म, गुह्यतम ओर ब्रह्मदैवत है। वाम नाड़ी से वायु को छोड़े। रेचन के कारण ही प्राणायाम की तीसरी क्रिया को रेचक कहा गया है, दक्षिणा से वायु को खींचे। उसी क्रिया में वायु द्वारा शरीर को पूरण किया जाता है इसलिए उसको पूरक कहा जाता है ॥१२३-१२४॥ अपनी देह में वायु को भरकर उसको छोड़ा न जाय और भरे हुए कुंभ (घड़े) के समान स्थिर रखा जाय तो इस क्रिया को कुंभक कहते हैं ॥१२५॥ शरीर के भीतर की वायु को न निकाला जाय और बाहर की वायु को न भीतर खींचा जाय ऐसी स्थिति वाली क्रिया को शून्यक नामक प्राणायाम कहते हैं ॥१२६॥ धीरे-धीरे मतवाले हाथी की भाँति प्राण को वश में करना चाहिए, अन्यथा महान् भयंकर रोग हो जाते हैं ॥१२७॥ शुद्धहृदय योगी क्रमशः वायु को वश में करे। ऐसा करने से वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है ॥१२८॥ विषयों की ओर झुकी हुई इन्द्रियों को उधर से हटाकर अपने वश में करना प्रत्याहार कहा जाता है ॥१२९॥ द्विज ! जितेन्द्रिय महात्मा ध्यानशून्य रहने पर भी परम ब्रह्म पद को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरा- गमन नहीं होता ॥१३०॥ जो इन्द्रियों पर बिना अधिकार किये ध्यान परायण होता है उसको मूढात्मा (पाखण्डी) समझना चाहिए और उसका ध्यान कभी भी सफल नहीं होता ॥१३१॥ जो जो वस्तुयें दिखाई देती हैं उनको आत्मवत् देखे। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अन्तःकरण में ही धारण करने को धारणा कहते हैं ॥१३२॥ योग के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर हृदय में अच्युत, विश्वरूप, सब लोकों के एक कारण, सबके प्रतिपालक, परम आत्मा विष्णु का ध्यान करे। विकसित कमल के समान नेत्र २८ ना० पु०