बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१२ नारदीयपुराणम् तपः पूजाध्यानपरो यस्त्वसूयारतो भवेत् । तत्तपः सा च पूजा च तद्ध्यानं हि निरर्थकम् ॥४०॥ तस्मात्सर्वात्मकं विष्णुं शमादिगुणतत्परः । मुक्त्यर्थमर्चयेत्सम्यक् क्रियायोगपरो नरः ॥४१॥ कर्मणा मनसा वाचा सर्वलोकहिते रतः । समर्चयति देवेशं क्रियायोगः स उच्यते ॥४२॥ नारायणं जगद्योनिं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । स्तोत्राद्यैः स्तौति यो विष्णुं कर्मयोगी स उच्यते ॥४३॥ उपवासादिभिश्चैव पुराणश्रवणादिभिः । पुष्पाद्यैश्चार्चनं विष्णोः क्रियायोग उदाहृतः ॥४४॥ एवं भक्तिमतां विष्णौ क्रियायोगरतात्मनाम् । सर्वपापानि नश्यंति पूर्वजन्मार्जितानि वै ॥४५॥ पापक्षयाच्छुद्धमतिर्वाञ्छति ज्ञानमुत्तमम् । ज्ञानं हि मोक्षदं ज्ञेयं तदुपायं वदामि ते ॥४६॥ चराचरात्मके लोके नित्यं चानित्यमेव च । सम्यग् विचारयेद्धीमात्सद्भिः शास्त्रार्थकोविदैः ॥४७॥ अनित्यास्तु पदार्था वै नित्यमेको हरिः स्मृतः । अनित्यानि परित्यज्य नित्यमेव समाश्रयेत् ॥४८॥ इहामुत्र च भोगेषु विरक्तश्च तथा भवेत् । अविरक्तो भवेद्यस्तु स संसारे प्रवर्तते ॥४९॥ अनित्येषु पदार्थेषु यस्तु रागी भवेन्नरः । तस्य संसारविच्छित्तिः कदाचिन्नैव जायते ॥५०॥ शमादिगुणसम्पन्नो मुमुक्षुर्ज्ञानमभ्यसेत् । शमादिगुणहीनस्य ज्ञानं नैव च सिध्यति ॥५१॥ रागद्वेषविहीनो यः शमादिगुणसंयुतः । हरिध्यानपरो नित्यं मुमुक्षुरभिधीयते ॥५२॥ चतुर्भिः साधनैरेभिर्विशुद्धमतिरुच्यते । सर्वगं भावयेद्विष्णुं सर्वभूतदयापरः ॥५३॥ क्षराक्षरात्मकं विश्वं व्याप्य नारायणः स्थितः । इति जानाति यो विप्र तज्ज्ञानं योगजं विदुः ॥५४॥ योगोपायमतो वक्ष्ये संसारविनिवर्त्तकम् । योगं ज्ञानं विशुद्धं स्यात्तज्ज्ञानं मोक्षदं विदुः ॥५५॥ [ और वह सब प्रकार के पापियों के बराबर है ॥३६॥ जो तप, ध्यान और पूजा करता हुआ भी असूया का त्याग नहीं करता है, उसकी वह तपस्या, पूजा और ध्यान निरर्थक है ॥४०॥ इसलिए कर्मयोगी विधिपूर्वक शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर सर्वात्मक विष्णु की मुक्ति के लिए पूजा करे ॥४१॥ मन, वचन और कर्म से जो लोक- कल्याण में लीन रहता है; वह मानो देवेश की भली भाँति अर्चा करता है और उसी को क्रिया-योग कहते हैं ॥४२॥ जो जगत् के आदि कारण, सर्वान्तर्यामी, हरि, विष्णु की स्तोत्र आदि से स्तुति करता है, वह कर्मयोगी कहा जाता है ॥४३॥ उपवास आदि व्रत, पुराण-श्रवण और पुष्प, धूप आदि से विष्णु का अर्चन हो क्रियायोग कहा गया है ॥४४॥ इस प्रकार भक्ति पूर्वक क्रिया योग में रत रहने वाले भक्तों के पूर्व जन्माजित सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४५॥ पाप-क्षय से शुद्ध बुद्धि वाले व्यक्ति उत्तम ज्ञान की ही कामना करते हैं । ज्ञान मोक्ष देने वाला है । इसलिए ज्ञान प्राप्ति का उपाय तुमको बतला रहा हूँ ॥४६॥ धीमान् व्यक्ति शास्त्र-तत्त्व जानने वाले सज्जनों से उपदेश प्राप्त कर इस चराचरात्मक लोक में नित्य, अनित्य को पहचाने ॥४७॥ संसार के सब पदार्थ अनित्य हैं, केवल एक हरि ही नित्य हैं। अनित्य को छोड़कर नित्य को ही अपनाना चाहिए ॥४८॥ लौकिक और स्वर्गीय भोगों से सदा विरक्त रहना चाहिए । जो भोगों से विरक्त नहीं रहता, वह संसार में जन्म लेता है ॥४९॥ जो मनुष्य अनित्य पदार्थों से अनुराग करता है, उसका संसार के माया- बन्धन से वियोग नहीं होता । वह उसी से बँधा रहता है ॥५०॥ मुक्ति के इच्छुक शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर ज्ञान का अवश्य अभ्यास करें । शम, दम आदि गुणों से हीन व्यक्ति को ज्ञान-प्राप्ति कभी नहीं होती ॥५१॥ राग-द्वेष से हीन, शम आदि गुणों से युक्त और नित्य प्रति भगवान् का चिन्तन करने वाला व्यक्ति ही मुमुक्षु कहा जाता है ॥५२॥ इन चार साधनों से ही विमल बुद्धि होती है, ऐसा शास्त्रीय कथन है । सब प्राणियों के प्रति दया भाव रखकर सर्वत्र व्यापक विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥५३॥ विप्र ! भगवान् नारायण क्षराक्षरात्मक (जड चेतनमय) संसार में व्याप्त होकर रहते हैं ऐसा जिसको ज्ञान हो जाता है, उसको योगज ज्ञान कहते हैं ॥५४॥ इसके आगे अब संसार से मुक्ति दिलाने वाले योगोपाय को बतला रहा हूँ । विशुद्ध ज्ञान ही योग