बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २११ नारद उवाच कर्मणा केन योगस्य सिद्धिर्भवति योगिनाम् । तदुपायं यथातत्त्वं ब्रूहि मे वदतां वर ॥२६॥ सनक उवाच ज्ञानलभ्यं परं मोक्षं प्राहुस्तत्त्वार्थचिंतकाः । यज्ज्ञानं भक्तिमूलं च भवितः कर्मवतां तथा ॥२७॥ दानानि यज्ञा विविधास्तीर्थयात्रादयः कृताः । येन जन्मसहस्रेषु तस्य भक्तिर्भवेद्धरौ ॥२८॥ अक्षयः परमो धर्मो भक्तिलेशेन जायते । श्रद्धया परया चैव सर्वं पापं प्रणश्यति ॥२९॥ सर्वपापेषु नष्टेषु बुद्धिर्भवति निर्मला । सैव बुद्धिः समाख्याता ज्ञानशब्देन सूरिभिः ॥३०॥ ज्ञानं च मोक्षदं प्राहुस्तज्ज्ञानं योगिनां भवेत् । योगस्तु द्विविधः प्रोक्तः कर्मज्ञानप्रभेदतः ॥३१॥ क्रियायोगं विना नृणां ज्ञानयोगो न सिध्यति । क्रियायोगरतस्तस्माच्छ्रद्धया हरिमर्चयेत् ॥३२॥ द्विजभूम्यग्निसूर्याम्बुधातुहृच्चित्रसंज्ञिताः । प्रतिमाः केशवस्यैता पूज्य एतासु भक्तितः ॥३३॥ कर्मणा मनसा वाचा परपीडापराङ्मुखः । तस्मात्सर्वगतं विष्णुं पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥३४॥ अहिंसा सत्यमक्रोधो ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अनीर्ष्या च दया चैव योगयोर्ह्वयोः समाः ॥३५॥ चराचरात्मकं विश्वं विष्णुरेव सनातनः । इति निश्चित्य मनसा योगद्वितयमभ्यसेत् ॥३६॥ आत्मवत्सर्वभूतानि ये मन्यंते मनीषिणः । ते जानंति परं भावं देवदेवस्य चक्रिणः ॥३७॥ यदि क्रोधादिदुष्टात्मा पूजाध्यानपरो भवेत् । न तस्य तुष्यते विष्णूर्यतो धर्मपतिः स्मृतः ॥३८॥ यदि कामादिदुष्टात्मा देवपूजापरो भवेत् । दंभाचारः स विज्ञेयः सर्वपातकैभिः समः ॥३६॥ नारद बोले--हे वक्ताओं में श्रेष्ठ ! योगियों को किस कर्म से योग-सिद्धि प्राप्त होती है ? उसका उपाय तत्त्वतः बताइए ॥२६॥ सनक बोले--तत्त्वार्थ चिन्तकों ने पर मोक्ष को ज्ञानलभ्य कहा है । उस ज्ञान का मूल भक्ति है, जो कर्मशील व्यक्ति को ही प्राप्त होती है । ॥२७॥ जिसने सहस्रों जन्म में दान यज्ञ और विविध तीर्थ- यात्रायें की हैं, उसकी हरि चरणों में भक्ति होती है ।।२८।। भक्ति के लेश मात्र से भी अक्षय परम धर्म प्राप्त होता है और अति उत्तम श्रद्धा से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२९॥ सब पापों के नष्ट हो जाने पर बुद्धि निर्मल हो जाती है । विद्वानों ने उसी निर्मल बुद्धि को ज्ञान नाम से कहा है ।।३०।। ज्ञान को मोक्ष देने वाला कहा गया है । वह ज्ञान योगियों को प्राप्त होता है । कर्म और ज्ञान भेद से योग दो प्रकार का कहा गया है ।।३१।। मनुष्यों को कर्म योग के बिना ज्ञान योग सिद्ध नहीं होता । इसलिए कर्म योग में लीन रह कर श्रद्धापूर्वक हरि की उपासना करनी चाहिए ।।३२।। ब्राह्मण, भूमि, अग्नि, सूर्य, जल, धातु की बनी मूर्ति, हृदय और केशव का चित्र इतनी केशव की प्रतिमायें हैं । इन प्रतिमाओं में केशव की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ।।३३।। इसलिए मन, कर्म और वचन से किसी को पीड़ा न देते हुए भक्तिपूर्वक, सर्वव्यापक विष्णु की पूजा करे ॥३४॥ अहिंसा, सत्य, अक्रोध, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनीर्ष्या (सहानुभूति) और दया दोनों योगों में समानरूप से आवश्यक है ।।३५।। यह सारा चराचरात्मक विश्व विष्णु का ही रूप है, ऐसा मन में निश्चय कर दोनों योगों का अभ्यास करना चाहिए ।।३६।। जो मनीषी सब प्राणियों को आत्मवत् समझते हैं वे देवाधिदेव चक्रधर विष्णु के परम रहस्य को जानते हैं ।।३७।। यदि क्रोध आदि से मलिन आत्मा वाला व्यक्ति पूजा और ध्यान करता है उस पर विष्णु कभी प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि वे धर्मपति कहे जाते हैं ।।३८।। यदि कोई कामादि दोषों से दूषित अन्तः करण वाला व्यक्ति देवपूजा करता है, उसको दम्भी समझना चाहिए