भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

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२१० नारदीयपुराणम् अविकारमजं शुद्धं स्वप्रकाशं निरंजनम् । ज्ञानरूपं सदानन्दं प्राहुर्वै मोक्षसाधनम् ॥११॥ यस्यावताररूपाणि ब्रह्माद्या देवतागणाः । समर्चयंति तं विद्याच्छाश्वतस्थानदं हरिम् ॥१२॥ जितप्राणा जिताहाराः सदा ध्यानपरायणाः । हृदि पश्यंति यं सत्यं तं जानीहि सुखावहम् ॥१३॥ निर्गुणोऽपि गुणाधारो लोकानुग्रहरूपधृक् । आकाशमध्यगः पूर्णस्तं प्राहुर्मोक्षदं नृणाम् ॥१४॥ अध्यक्षः सर्वकार्याणां देहिनो हृदये स्थितः । अनूपमोऽखिलाधारस्तं देवं शरणं व्रजेत् ॥१५॥ सर्वं संगृह्य कल्पांते शेते यस्तु जले स्वयम् । तं प्राहुर्मोक्षदं विष्णुं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥१६॥ वेदार्थविद्भिः कर्मज्ञैरिज्यते विविधैर्मखैः । स एव कर्मफलदो मोक्षदोऽकामकर्मणाम् ॥१७॥ हव्यकव्यादिदानेषु देवतापितृरूपधृक् । भुंक्ते य ईश्वरोऽव्यक्तस्तं प्राहुर्मोक्षदं प्रभुम् ॥१८॥ ध्यातःप्रणमितो वापि पूजितो वापि भक्तितः । ददाति शाश्वतं स्थानं तं दयालुं समर्चयेत् ॥१९॥ आधारः सर्वभूतानामेको यः पुरुषः परः । जरामरणनिर्मुक्तो मोक्षदः सोऽव्ययो हरिः ॥२०॥ संपूज्य यस्य पादाब्जं देहिनोऽपि मुनीश्वर । अमृतत्वं भजंत्याशु तं विदुः पुरुषोत्तमम् ॥२१॥ आनन्दमजरं ब्रह्म परं ज्योतिः सनातनम् । परात्परतरं यच्च तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२२॥ अद्वयं निर्गुणं नित्यमद्वितीयमनौपमम् । परिपूर्णं ज्ञानमयं विदुर्मोक्षप्रसाधकम् ॥२३॥ एवंभूतं परं वस्तु योगमार्गविधानतः । य उपास्ते सदा योगी स याति परमं पदम् ॥२४॥ सर्वसंगपरित्यागी शमादिगुणसंयुतः । कामाद्यैर्वर्जितो योगी लभते परमं पदम् ॥२५॥


अज, शुद्ध, स्वप्रकाश निरंजन, ज्ञानरूप और सदानन्द को ही मोक्ष-साधन कहा जाता है ॥११॥ जिसके अवतार रूपों की ब्रह्मा आदि देवतागण अर्चा करते हैं उसी हरि को शाश्वत मोक्षदाता जानना चाहिए ॥१२॥ जितप्राण, जिताहार और सदा ध्यानपरायण साधुजन ही जिस ब्रह्म को हृदय में दर्शन कर लेते हैं उसी सुखदायक सत्य को मुक्तिप्रद जानो ॥१३॥ जो निर्गुण होता हुआ भी गुणाधार है जो लोकानुग्रह के लिए अवतार रूप धारण करने वाला, पूर्ण और आकाशमध्यचारी है वही मनुष्यों का मोक्षदाता कहा जाता है ॥१४॥ वह सब कार्यों का अध्यक्ष, प्राणियों के हृदय में स्थित रहने वाला, अनुपम और निखिल विश्व का आधार है, उस देव के ही शरण में जाना चाहिए ॥१५॥ जो कल्पान्त में सारी सृष्टि को अपने में लीन कर जल में शयन करता है, तत्त्वदर्शी मुनि उसी विष्णु को मोक्षप्रद कहते हैं ॥१६॥ कर्म और वेद के तत्त्वज्ञाता लोग विविध यज्ञों से जिसकी उपासना करते हैं, वही निष्काम कर्म करने वाले मनुष्यों को कर्मफल प्रदान करता है ॥१७॥ जो अव्यक्त ईश्वर हव्य कव्य आदि दान में देवता और पितरों का रूप धारण कर दिये हुये पदार्थों को भोग करता है, उसी प्रभु को मोक्षद कहते हैं ॥१८॥ जो भक्ति पूर्वक ध्यान, प्रणाम, पूजा करने से शाश्वत स्थान प्रदान करता है, उस दयालु की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥१९॥ जो सब भूतों का एक मात्र आधार है, जो श्रेष्ठ पुरुष, जरा- मरण से रहित अव्यय हरि है वह मोक्ष देने वाला है ॥२०॥ मुनीश्वर, जिसके चरण कमल की पूजा कर मरण- शील मानव भी अमर बन जाता है उसको पुरुषोत्तम समझते हैं ॥२१॥ जो आनन्द, अजर, परब्रह्म सनातन ज्योति और पर से भी पर है वह विष्णु का परम पद है ॥२२॥ अद्वैत, निर्गुण, नित्य, अद्वितीय, अनुपम, परिपूर्ण, ज्ञानमय ब्रह्म ही मोक्ष के देने वाले हैं ॥२३॥ जो योगी सदा ऐसे पर वस्तु की योग विधि से उपासना करता है वह परमपद को प्राप्त करता है ॥२४॥ सब प्रकार की आसक्ति से रहित, शम आदि गुणों से युक्त और काम आदि गुणों से मुक्त रहने वाला योगी परम पद को प्राप्त करता है ॥२५॥