भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२५४ नारदीयपुराणम् मया कृतं पुरा कर्म वक्ष्यामि तव सुव्रत । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥४१॥ अहमासं पुरा शक्र गृध्रः पापो विशेषतः । स्थितश्च भूमिभागे वै अमेध्यामिषभोजनः ॥४२॥ एकदाहं विष्णोगृहे प्राकारे संस्थितः प्रभो । पतितो व्याधशस्त्रेण सायं विष्णोगृहांगणे ॥४३॥ मयि कंठगतप्राणे श्वगणो मांसलोलुपः । जग्राह मां स्ववक्त्रेण श्वभिरन्यैश्चरन्द्रुतः ॥४४॥ वहन्मां स्वमुखेनैव भीतोऽन्यैर्भषणैस्तथा । गतः प्रदक्षिणाकारं विष्णोस्तन्मंदिरं प्रभो ॥४५॥ तेनैव तुष्टिमापन्नो ह्यापरात्मा जगन्मयः । मम चापि शुनश्चापि दत्तावन्परमं पदम् ॥४६॥ प्रदक्षिणाकारतया गतस्यापीदृशं फलम् । संप्राप्तं विबुधश्रेष्ठ किं पुनः सम्यगर्चनातू ॥४७॥ इत्युक्तो देवराजस्तु सुधर्मेण महात्मना । मनसा प्रीतिमापन्नो हरिपूजारतोऽभवत् ॥४८॥ तथापि निर्जराः सर्वे भारते जन्मलिप्सवः । समर्पयंति देवेशं नारायणमनामयम् । तानर्चयन्ति सततं ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥४९॥ नारायणानुस्मरणोद्यतानां महात्मनां त्यक्तपरिग्रहाणाम् । कथं भवत्युग्रभवस्य बंधस्तत्सङ्गलुब्धा यदि मुक्तिभाजः ॥५०॥ ये मानवाः प्रतिदिनं परिमुक्तसङ्गा नारायणं गरुडवाहनमर्चयन्ति । ते सर्वपापनिकरैः परितो विमुक्ता विष्णोः पदं शुभतरं प्रतियान्ति हृष्टाः ॥५१॥ ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरंति । ध्यानेन तेन हतकिल्विषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति ॥५२॥ सुव्रत ! मैंने पहले जो कुछ कर्म किये हैं उनको कह रहा हूँ, जिसके श्रवण और पठन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४१॥ शक्र ! पहले मैं एक विशेष रूप से पाप करने वाला गिद्ध था। सर्वदा पृथ्वी पर रहता और गन्दा मांस खाता था ॥४२॥ प्रभो ! एक दिन विष्णु मन्दिर की चहारदीवारी पर बैठा था। सायं काल किसी बहेलिये के वाण से घायल होकर उस मन्दिर के आँगन में गिर पड़ा ॥४३॥ अभी मेरे प्राण कण्ठ में ही थे कि एक मांस लो- लुप कुत्ता आया और अपने मुंह में मुझको दबा लिया। यह देखकर और भी कुत्ते आगये और उसका पीछा करने लगे ॥४४॥ प्रभो ! उन कुत्तों के भय से वह मुझको मुंह में दबाये ही मन्दिर के चारों ओर घूमने लगा जिससे कि मन्दिर की प्रदक्षिणा हो गयी ॥४५॥ केवल इतने से ही जगन्मय परात्मा सन्तुष्ट हो गये और मुझको तथा उस कुत्ते को भी परमगति दे दी ॥४६॥ जब केवल प्रदक्षिणा करने से इतना फल मिला तब भगवान् की भली-भाँति पूजा करने से कितना फल मिलेगा ॥४७॥ महात्मा सुधर्म की इतनी बातें सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गये और हरिपूजा करने लगे ॥४८॥ उस स्वर्ग लोक में रहकर भी सब देवता भारतवर्ष में जन्म पाने की इच्छा से निर्विकार देवेश नारायण की पूजा करते हैं। ब्रह्मा आदि देवगण उन भक्त देवों की पूजा करते हैं ॥४९॥ नारायण के ध्यान में लोन रहने वाले, किसी का परिग्रह (दान) न लेने वाले भक्तों को इस संसार का कठोर बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है, जबकि उनकी संगति में रहने वाले मनुष्य भी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५०॥ जो मनुष्य प्रति दिन विषयों में अनासक्त रहकर गरुड़ध्वज नारायण की पूजा करते हैं, वे सब पाप-समूहों से सर्वथा मुक्त होकर बड़ी प्रसन्नता से विष्णु के शुभलोक को जाते हैं ॥५१॥ जो ब्रह्मज्ञानी वीतराग होकर सुर-गुरुनारायण का सर्वदा स्मरण करते हैं, वे अपने ध्यान के प्रभाव से निष्पाप और विमल बुद्धि हो जाते हैं एवं पुनः माता का दूध नहीं पीते अर्थात् जन्म