भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

चत्वारिंशोऽध्यायः २५५ ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णांघ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च । ते वै पुनंति च जगंति शरीरसंगात् संभाषणार्द्वापि ततो हरिरेव पूज्यः ॥५३॥ हरिपूजापरा यत्र महांन्तः शुद्धबुद्धयः । तत्रैव सकलं भद्रं यथा निम्ने जलं द्विज ॥५४॥ हरिरेव परो बन्धुर्हरिरेव परा गतिः । हरिरेव ततः पूज्यो यतश्चैतन्यकारणम् ॥५५॥ स्वर्गापवर्गफलदं सदानंदं निरामयम् । पूजयस्व मुनिश्रेष्ठ परं श्रेयो भविष्यति ॥५६॥ पूजयन्ति हरिं ये तु निष्कामाः शुद्धमानसाः । तेषां विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान् प्रयच्छति ॥५७॥ यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वा सुसमाहितः । स प्राप्नोत्यश्वमेधस्य फलं मुनिवरोत्तम ॥५८॥ इत्येतत्ते समाख्यातं हरिपूजाफलं द्विज । संकोचविस्तराभ्यां तु किमन्यत्कथयामि ते ॥५९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये चत्वारिंशोध्यायः ॥४०॥


ग्रहण नहीं करते ॥५२॥ जिन मनुष्यों के सारे पाप हरिकथा के सुनने से दूर हो गए हैं, जो सदा कृष्ण के चरण- कमल के ध्यान में लगे रहते हैं; वे अपने शरीर के स्पर्श और वाणी से समस्त संसार को पवित्र कर देते हैं, इसलिए हरि की ही पूजा करनी चाहिए ॥५३॥ द्विज! जहाँ हरि-पूजापरायण, शुद्धबुद्धि महात्मा रहते हैं वहाँ सारे कल्याण उसी प्रकार इकट्ठे हो जाते हैं जिस प्रकार नीची भूमि में जल ॥५४॥ हरि ही सत्य-बन्धु और हरि ही एकमात्र परम गति हैं। वही सब के पूज्य हैं। क्योंकि चैतन्य कारण वही हैं ॥५५॥ मुनिवर्य ! स्वर्ग और मोक्ष को देने वाले, सदानन्द, निरामय भगवान् की पूजा करो, तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥५६॥ जो शुद्ध हृदय व्यक्ति निष्काम भाव से हरि की पूजा करते हैं, उन पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सारी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं ॥५७॥ मुनिवरोत्तम ! जो ध्यान पूर्वक इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है उसको अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है ॥५८॥ द्विज ! इस प्रकार तुमको हरिपूजा का फल संक्षेप और विस्तार से कह सुनाया । अब तुमको और क्या सुनाऊँ? ॥५९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक चालीसवां अध्याय समाप्त ॥४०॥