बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअथैकचत्वारिंशोऽध्यायः नारद उवाच आख्यातं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । इदानीं श्रोतुमिच्छामि युगानां स्थितिलक्षणम् ॥१॥ सनक उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ मुने लोकोपकारक । युगधर्मान्प्रवक्ष्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥२॥ धर्मो विवृद्धिमायाति काले कस्मिंश्चिदुत्तम । तथा विनाशमायाति धर्म्म एव महीतले ॥३॥ कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्ज्ञेयं वत्सरेस्तव सत्तम् ॥४॥ संध्यासंध्यांशयुक्तानि युगानि सदृशानि वै । कालतो वेदितव्यानि इत्युक्तं तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥ आद्ये कृतयुगं प्राहुस्ततस्त्रेताविधानकम् । ततश्च द्वापरं प्राहुः कलिमंत्यं विदुः क्रमात् ॥६॥ देवदानवगंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । नासन्कृतयुगे विप्र सर्वे देवसमाः स्मृताः ॥७॥ सर्वे हृष्टाश्च धर्मिष्ठा न तत्र क्रयविक्रयौ । वेदानां च विभागश्च न युगे कृतसंज्ञके ॥८॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः स्वाचारतत्पराः । सदा नारायणपरास्तपोध्यानपरायणाः ॥९॥ कामादिदोषनिर्मुक्ताः शमादिगुणतत्पराः । धर्मसाधनचित्ताश्च गतासूया अदंभिकाः ॥१०॥ सत्यवाक्यरताः सर्वे चतुराश्रमधर्मिणः । वेदाध्ययनसंपन्नाः सर्वशास्त्रविचक्षणाः ॥११॥ अध्याय ४१ नारद बोले-मुने ! तत्त्वार्थविज्ञ ! आपने सब कुछ कह दिया, अब युगों की स्थिति और धर्म के विषय में सुनना चाहता हूँ ॥१॥ सनक ने कहा- मुने ! लोकोपकारक ! महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो। मैं सब लोक का उपकार करने वाले युग धर्म को कह रहा हूँ ॥२॥ उत्तम ! किसी समय धर्म की वृद्धि होती तो कभी इस पृथ्वी तल पर उसका ह्रास हो जाता है ॥३॥ कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग हैं । सज्जनश्रेष्ठ ! दिव्य बारह वर्षों तक ये चार युग स्थित रहते हैं ॥४॥ तत्त्वदर्शियों ने कहा है कि चारों युगों में सन्ध्या और सन्ध्यांश काल नियमपूर्वक होते हैं और समय के अनुसार ये जाने जाते हैं। सब से पहले कृतयुग तब त्रेता और इसके बाद द्वापर युग आता है । क्रम में कलि अन्तिम युग है ॥५-६॥ विप्र ! कृतयुग में देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि नहीं थे । सब देव कोटि के ही माने जाते थे । सब प्रसन्न और बलवान् थे । क्रय-विक्रय का व्यवहार न था । उस कृत नामक युग में वेदों का विभाग नहीं हुआ था ॥७-८॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र सब अपने आचार-पालन में तत्पर रहते थे । वे सदा नारायण की पूजा करते और तप, ध्यान में लगे रहते थे ॥६॥ वे काम आदि दोषों से मुक्त, शम आदि गुणों में तत्पर, धर्म-साधन के प्रेमी, असूया और दम्भ से सदा दूर रहने वाले होते थे ॥१०॥ सब सत्य बोलने वाले, आश्रम-धर्म का पालन करने वाले, वेदाध्ययनपरायण और सब शास्त्रों के ज्ञाता होते थे ॥११॥